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तेल पर निर्भरता घटाने का वक्त

संदर्भ :
  • भारत ने देर से ही सही, तेल निर्यातक देशों के संगठन ओपेक पर कच्चे तेल की कीमतों में कटौती के लिए दबाव डालते हुए उचित कदम उठाया है। यद्यपि 1 जुलाई 2018 से ओपेक ने कच्चे तेल के उत्पादन में लगभग 10 लाख बैरल प्रतिदिन (बीपीडी) की बढ़ोतरी की है, लेकिन हकीकत यह है कि कीमतें अब भी कम नहीं हो पाई हैं। नि:संदेह बीते कुछ वक्त से तेल की लगातार बढ़ती कीमतें भारत के लिए चिंता का सबब बनी हुई हैं। 
  • भारत अपनी जरूरत का अस्सी फीसदी कच्चा तेल आयात करता है। जाहिर है, तेल की बढ़ती कीमतों से देश का आयात बिल भी बढ़ रहा है। 
  • इससे देश में डॉलर की मांग बढ़ गई है और इस कारण विदेशी मुद्रा कोष में तेजी से गिरावट आ रही है।
  •  गौरतलब है कि 11 जुलाई को देश के विदेशी मुद्रा कोष का स्तर 405 अरब डॉलर रह गया, जो एक माह पहले 425 अरब डॉलर के स्तर पर था। डॉलर की मांग बढ़ने से भारतीय रुपए के मूल्य में भी गिरावट आ रही है  
प्रमुख पहलू :
  • हाल ही में दुनिया की ख्यात क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज ने कहा है कि अमेरिका और चीन के बीच छिड़े ट्रेड वार, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के बढ़ती कीमतों और रुपए की कीमत में ऐतिहासिक गिरावट से अब पेट्रोल और डीजल में आ रही तेजी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा है। 
  • दुनिया के मशहूर निवेश बैंकों- बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच, मार्गन स्टेनले और ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म सीएलएसए द्वारा भी कुछ ऐसी ही आशंकाएं जाहिर की गई हैं। 
  • अर्थ विशेषज्ञों का कहना है कि कोई एक-दो दशक पहले मानसून का बिगड़ना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए आर्थिक-सामाजिक चिंता का कारण बन जाया करता था, लेकिन अब मानसून के धोखा देने पर भी अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को काफी हद तक नियंत्रित कर लिया जाता है।
  •  जबकि कच्चे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्र्रीय हलचलों और तेल उत्पादक देशों की नीतियों से प्रभावित होती हैं, जिस पर भारत का नियंत्रण नहीं है।
 चिंता का मुख्य विषय :
  • यहां पर तेल आयात को लेकर भारत के समक्ष एक और बड़ी चिंता सामने है। 
  • पिछले दिनों अमेरिका ने भारत और चीन सहित सभी देशों को ईरान से कच्चे तेल का आयात 4 नवंबर 2018 तक बंद करने के लिए कहा है। 
  • उसका यह फरमान न मानने वाले देशों पर उसने सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगाने की धमकी दी है।
  •  जाहिर है, इससेे भारत के समक्ष एक तरह की विकट स्थिति पैदा हो गई है। भारत में इराक और सऊदी अरब के बाद सबसे ज्यादा कच्चा तेल ईरान से मंगाया जाता है।
  •  ईरान को भारत के द्वारा यूरोपीय बैंकों के माध्यम से यूरो में भुगतान किया जाता है। डॉलर की तुलना में यूरो में भुगतान भारत के लिए लाभप्रद है। 
  • इसके अलावा ईरान से किया जाने वाला कच्चे तेल का आयात सस्ते परिवहन के चलते भी भारत के लिए फायदेमंद है।
  •  इतना ही नहीं, ईरान भारत को भुगतान के लिए 60 दिनों की क्रेडिट देता है, जबकि दूसरे देश सिर्फ 30 दिन की ही क्रेडिट देते हैं। 
  • यद्यपि भारत के लिए कच्चे तेल के आयात हेतु ईरान का विकल्प तलाशना मुश्किल नहीं होगा, लेकिन उस नए विकल्प के साथ हमें ऐसी तमाम सहूलियतें शायद न मिलें, जो फिलहाल ईरान हमें देता है।

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