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"भ्रष्टाचार : देश के विकास में बड़ी बाधा"

- विश्व भर में विकास को मापने के लिए दो महत्वपूर्ण सूचकांक का उपयोग किया जाता है। वे हैं- संयुक्त राष्ट्र का मानव विकास सूचकांक और ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल (टीआइ) का करप्शन परसेप्शन इंडेक्स (सीपीआइ)। टीआइ 1993 में स्थापित एक गैरसरकारी समाजसेवी संस्था है और उसका पहला सूचकांक 1995 में प्रकाशित हुआ था।

- सीपीआइ स्कोर देशों को भ्रष्टाचार के आधार पर रैंकिंग देता है। यह एक तरीके से विश्व की प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा किए गए सर्वे का एक संयोजन है। 
- इंपीरियल डाटा की कमी के कारण किसी और रूप में देशों में भ्रष्टाचार का आकलन करना असंभव सा है। इसलिए सीपीआइ लोगों की सोच पर निर्भर है। यह मूलतया सरकारी क्षेत्र में भ्रष्टाचार को मापता है और ये विभिन्न क्षेत्र के विशेषज्ञों की राय पर निर्भर होता है।
- 2014 का डाटा पिछले 24 महीनों में एकत्रित किया गया है और ये सारे देशों को शून्य से 100 के बीच में व्यवस्थित करता है। शून्य स्कोर का मतलब अत्यधिक भ्रष्ट और 100 का मतलब पूरी तरीके से भ्रष्टाचार मुक्त देश है।
- अभी तक किसी भी राष्ट्र को 100 स्कोर नहीं मिला है। सीपीआइ निजी क्षेत्र के भ्रष्टाचार को नहीं मापता है। उसके लिए टीआइ के और दूसरे सूचकांक है जैसे कि ग्लोबल करप्शन बैरोमीटर, ब्राईब पेयर इंडेक्स, ग्लोबल करप्शन रिपोर्ट। सीपीआइ 2014 में 175 देशों को स्थान दिया गया है जिसमें उत्तर कोरिया और सोमालिया ने सिर्फ आठ का स्कोर प्राप्त किया और वो नीचे पायदान पर रहे। इसके विपरीत डेनमार्क 92 के स्कोर के साथ शीर्ष पर रहा। 
- भारत की रैंक में काफी सुधार हुआ जो पिछले साल की 94वीं रैंक से बढ़कर 85वें स्थान पर पहुंच गया। इसके साथ भारत के सीपीआइ स्कोर में भी सुधार हुआ जो 36 से बढ़कर 38 हो गया। 1996 के बाद पहली बार भारत ने चीन को सीपीआइ रैकिंग में पीछे छोड़ा है। भारत की रैंकिंग में यह सुधार मूलत: वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम और वल्र्ड जस्टिस प्रोजेक्ट इंडेक्स के सर्वे में सुधार के कारण हुआ है। ये दोनों सर्वे सार्वजनिक क्षेत्र में फैले भ्रष्टाचार के अलग-अलग आयामों का आकलन करते हैं। वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम का स्कोर मूलत: बिजनेस क्लास के सोच पर निर्भर होता है और ये आयात-निर्यात, टैक्स, कांट्रैक्ट, टेंडर, लाइसेंस और न्याय में फैले हुए भ्रष्टाचार का आकलन करता है। इस बार ऐसा लग रहा है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में एक अनुकूल माहौल देख रही हैं जो निवेश के लिए अच्छा है।
- इसके अलावा वल्र्ड जस्टिस प्रोजेक्ट इंडेक्स मूलत: विशेषज्ञों और आम आदमियों की अवधारणा का आकलन करता है और इसका मापदंड सरकारी अफसरों, जजों, पुलिस और नेताओं की सत्यनिष्ठा होती है।

- सीपीआइ सर्वे का डाटा नई सरकार के गठन से पहले एकत्रित किया गया है और ये किसी भी तरीके से नई सरकार के काम काज पर टिप्पणी नहीं करता है परंतु इस बात से इन्कार भी नहीं किया जा सकता कि सीपीआइ संभवत: उस भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की सफलता को दर्शाता है जो अन्ना के जनलोकपाल से शुरू हुआ था और इसका प्रभाव सभी क्षेत्रों में रहा।

- नई सरकार अपने सुशासन के एजेंडे के कारण सत्ता में आई है और इस बहुमत में सभी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों का योगदान रहा है। इस सरकार पर अपनी पूर्ववर्ती सरकारों से ज्यादा जिम्मेदारी है और लोगों की आशाएं जुड़ी हैं। लोगों में इस बात की उम्मीद है कि मोदी सरकार भ्रष्टाचार रोकने के लिए ठोस कदम उठाएगी। हालांकि सरकार ने कालेधन को लाने के लिए अपनी वचनबद्धता दोहराई है लेकिन अभी कोई सार्थक पहल नहीं की है जोकि काला धन वापस लाए। भारत में काला धन की उपज को रोकने वाले कई भ्रष्टाचार रोकथाम बिल संसद में अभी भी लंबित पड़े हैं। लोकपाल की नियुक्ति अभी भी नहीं हुई है। केंद्रीय सतर्कता आयुक्त का पद अभी भी खाली है।

- हमारे पास निजी क्षेत्रों में फैले हुए भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कोई कानून नहीं है जो व्हिसिल ब्लोअर बिल पास किए गये हैं वो भी आधे अधूरे है क्योकि इसमें निजी क्षेत्र को शामिल नहीं किया गया है। कई घोटालों की जांच उसी रफ्तार से चल रही है। समय आ गया है कि सरकार भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कुछ ठोस और सार्थक कदम उठाये वर्ना जो उत्साह और आकांक्षाएं नई सरकार से जुड़ी है वो सभी धूमिल हो जायेंगी। और ये देश की हित में नहीं होगा।

 

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