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सामाजिक आर्थिक जनगणना की यथास्थिति रिपोर्ट (उद्देश्य और मानक)

- गरीबों की गणना / आर्थिक-सामाजिक जनगणना चार साल बाद भी पूरी नहीं हो पाई है। देश के सबसे गरीब राज्यों में शुमार उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा जैसे 13 राज्यों में जनगणना का बुरा हाल है।

- सामाजिक आर्थिक जनगणना का काम दिसंबर 2011 में पूरा किए जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। 
- लेकिन जनगणना में चार साल से भी अधिक की देरी से खाद्य सुरक्षा जैसी महत्वाकांक्षी योजना का लाभ गरीबों को नहीं मिल पाएगा।

- राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली, उड़ीसा, तमिलनाडु और दादरा नगर हवेली में कुछ दस्तावेजी प्रक्रियाओं को छोड़ दें तो जनगणना शुरू तक नहीं हो पाई है। 
- इसी तरह गरीबों के गढ़ उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ झारखंड में आधा-अधूरा काम ही हो पाया है।

- हिमाचल और अरुणाचल प्रदेश में भी जनगणना का हाल कमोबेश यही है। देश के साढ़े छह सौ जिलों में केवल 97 जिलों में अंतिम सूची प्रकाशित की जा सकी है। प्रारूप सूची का प्रकाशन 454 जिलों में किया गया है।

- स्वतंत्र भारत में पहली बार जाति, धर्म के आधार पर जनगणना और गरीबी रेखा से नीचे गुजर करने वालों की व्यापक गणना शुरू की गई। पहली बार शहरी गरीबों का भी आकलन किया जा रहा है। 
- लेकिन यह जनगणना लगातार पिछड़ती गई, जो अब तक पूरी नहीं हो सकी है।

=>" सामाजिक आर्थिक जनगणना के मानक"
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गरीबों की जनगणना की सूची वर्ष 2002 के बाद अपडेट होनी है। 
- इसमें शहरी गरीबों की गिनती में घर (पक्का या कच्चा) की स्थिति, पेयजल शौचालय के प्रावधान, परिवार के किसी सदस्य में जटिल पुरानी बीमारी, शिक्षा स्तर, रोजगार के स्थायित्व जैसे पैमानों को दर्ज किया जा रहा है।

=>"सामाजिक आर्थिक जनगणना का उद्देश्य"
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सबको भोजन का हक देने जैसी योजना खाद्य सुरक्षा के

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