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पीपीपी में बदलाव से होगा बुनियादी ढांचे का विस्तार

- हमारी राजनीतिक अर्थव्यवस्था का एक मूलभूत चरित्र है सामाजिक संरक्षण की मांग। देश में कोई भी सरकार हो लेकिन उसे निवेश खर्च की गुंजाइश बनानी होगी और बुनियादी ढांचागत क्षेत्र के लिए बजट आवंटन करना होगा। 
- ऐसे में निजी क्षेत्र को बुनियादी ढांचागत विकास में शामिल करना अनिवार्य हो गया है। हालांकि बुनियादी ढांचागत क्षेत्र में निजी निवेश पिछले 15 साल में नाटकीय ढंग से बढ़ा है लेकिन इसका अनुभव मिलाजुला रहा है। 
- बुनियादी ढांचा वास्तव में आम जनता से जुड़ा क्षेत्र है। ऐसे में आम जनता के हितों और निजी डेवलपर के मुनाफे के बीच संतुलन कायम करना कतई आसान नहीं है।

- इन सेवाओं की प्रकृति ऐसी है कि व्यापक जनहित का ख्याल रखते हुए इसमें नियमन आवश्यक प्रतीत होता है। ऐसा करना आसान नहीं है। निजी सार्वजनिक भागीदारी या पीपीपी में बेहतर डिजाइन और प्रभावी विवाद निस्तारण आवश्यक है। जबकि भारत में इस क्षेत्र में बहुत जल्दी बहुत अधिक हड़बड़ी की गई प्रतीत होती है। गत तीन सालों में निजी बुनियादी विकास को झटका लगा है।

- नीतिगत अनिश्चितता, नौकरशाही के स्तर पर होने वाली देरी और भ्रष्टाचार के आरोप बढ़े हैं। इस क्षेत्र में होने वाला निवेश नाटकीय रूप से गिरा है। लेकिन भारत को आज भी अगले पांच साल में बुनियादी ढांचागत क्षेत्र में 10 खरब डॉलर का अतिरिक्त निवेश चाहिए। जब तक सही कदम नहीं उठाए जाते हैं तब तक स्थिति भ्रामक बनी रहेगी। इससे पहले कि बुनियादी ढांचागत क्षेत्र में संपत्ति निर्माण की नई लहर की शुरुआत हो, हमें अतीत की घटनाओं से सबक लेना चाहिए।

- पहली बात, भूमि अधिग्रहण करना अनुमान से कहीं अधिक कठिन साबित हुआ है। इसमें नए भूमि अधिग्रहण विधेयक 2013 की अहम भूमिका रही है। इससे जुड़ी कठिनाइयों ने सड़क विकास परियोजनाओं को प्रभावित किया। सरकार की ओर से प्रगति दिखाने का दबाव था और बैंकों ने उन परियोजनाओं को भी धन मुहैया करा दिया जहां पूरी जमीन उपलब्ध नहीं थी। चूंकि समय पर जमीन नहीं मिली इसलिए परियोजनाओं में देरी हुई। इसकी वजह से लागत बढ़ती गई और कई अधूरी परियोजनाएं अव्यवहार्य हो गईं।
- दूसरी बात नियामकीय मंजूरी के धीमेपन और अनिश्चितता, खासतौर पर पर्यावरण क्षेत्र की मंजूरी में देरी ने भी परियोजनाओं की लागत बढ़ाने में मदद की। 
- तीसरी बात, इन जोखिमों के चलते निजी डेवलपरों ने भी लागत को बढ़ाचढ़ाकर पेश करना शुरू किया और अपनी अन्य परियोजनाओं में इसका लाभ लिया।

- चौथा, सरकार कई वादे पूरे नहीं कर पाई। इसका सबसे अहम उदाहरण है कोयले की आपूर्ति, करीब 40,000 मेगावॉट बिजली उत्पादन क्षमता पहले ही निर्मित की जा चुकी है या फिर वह कोल इंडिया के वादे के चलते निर्माणाधीन है। उसका वादा था कि वह इन परियोजनाओं को पर्याप्त कोयला उपलब्ध कराएगी। लेकिन वह अपना वादा नहीं निभा सकी। नतीजतन अनेक संयंत्र या तो अव्यवहार्य हो गए या फिर लंबे कर्ज में फंस गए।

- पांचवां, प्रतिस्पर्धात्मक बोली अनुबंध आवंटन का सर्वश्रेष्ठï तरीका है, यह सिद्घांत भारतीय अनुभवों पर खरा नहीं उतर सका। बोली प्रक्रिया का डिजाइन सही ढंग से नहीं बनाया जाता और उसमें छेड़छाड़ की संभावना रहती है। बोली लगाने वाले भी गैर जिम्मेदारी से पेश आते हैं। इस बात ने निष्क्रिय बोलियों की भरमार कर दी। खासतौर पर बिजली क्षेत्र में हां बिजली उत्पादन के अनुबंध न्यूनतम उल्लिखित टैरिफ पर आधारित होते है। ये परियोजनाएं कानूनी पचड़ों में फंस गईं और पूरी तरह अव्यावहारिक हो गईं।

- छठा, न्यायपालिका ने इसमें बहुत सख्ती से हस्तक्षेप की कोशिश की। दूरसंचार लाइसेंस रद्द करना और कोयला खान आवंटन को अतीत की तिथि से रद्द करना कानूनन सही हो सकता है लेकिन उसने निवेशकों की भावना को भारी नुकसान पहुंचाया। 
- सातवां, कौशल की कमी तथा सरकार के स्तर पर अनुशासन और नैतिकता की कमी ने बैंकों की ओर से अनैतिक फंडिंग को जन्म दिया। इस बात ने बैंकों के फंसे हुए कर्ज में और अधिक इजाफा किया। आखिर में बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं को की जाने वाली फंडिंग में विसंगति ने बैंकिंग व्यवस्था पर जबरदस्त बोझ डाला क्योंकि वह जोखिम से निपटने के लिए तैयार ही नहीं था। इस तरह बुनियादी परियोजनाओं को लंबे समय के लिए होने वाली फंडिंग की राह बंद हो गई।

- हकीकत यह है कि निजी क्षेत्र ने बुनियादी खर्च में हुई बढ़ोतरी में अहम भूमिका जरूर निभाई लेकिन संपत्ति निर्माण की अगली लहर सरकार को पैदा करनी होगी।

 

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