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भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट

- भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट ऐसे अहम वक्त में आई है जब अर्थव्यवस्था से परस्पर विरोधाभासी संकेत देखने को मिल रहे हैं। जैसा कि खुद रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि वृहद आर्थिक मोर्चे पर चीजें अब पहले के मुकाबले अधिक सहज हैं मगर वैश्विक मोर्चे पर अभी भी तनाव के कुछ संकेत नजर आ रहे हैं। 
- यूरोप, जापान तथा कुछ अन्य बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं में में विकास की गति धीमी बनी हुई है। लेकिन मोटे तौर पर भारत के लिए हालात बेहतर बने हुए हैं। खासतौर पर ईंधन कीमतों में गिरावट के चलते ऐसा हुआ है। 
- पूंजी की आवक की बात की जाए तो उभरते बाजारों के बीच भारत के मजबूत पोर्टफोलियो के कारण उसे इस मोर्चे पर भी किसी दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ रहा है। कच्चे तेल की कमजोर कीमतों ने भारत के लिए तिहरा लाभ उत्पन्न किया है।
- इसकी बदौलत न केवल महंगाई कम हुई है बल्कि चालू खाते का घाटा और सब्सिडी का बोझ भी घटा है।

- लेकिन अच्छी खबरें केवल यहीं तक सीमित हैं। रिपोर्ट का बाकी हिस्सा वित्तीय क्षेत्र की समग्र तस्वीर को निराशाजनक ढंग से पेश करता है। उसके मुताबिक बैंकिंग व्यवस्था जमा और ऋण दोनों ही क्षेत्रों में अपनी गति खो रही है। ऋण में बढ़ोतरी की रफ्तार धीमी हुई है।
- यह बात इसलिए चिंताजनक है कि देर से ही सही लेकिन अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत नजर आ रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक वित्तीय जगत के अन्य स्त्रोतों ने हालांकि ऋण के मामले में बैंकों का स्थान लेना शुरू कर दिया है लेकिन अभी भी बैंक ही रोजमर्रा के उत्पादन और कारोबारी गतिविधियों के केंद्र में हैं। ऐसे में बैंकिंग की ओर से ऋण की अनुपलब्धता सुधार के लिए चुनौती पेश करती है। वित्तीय स्थिरता के लिए सबसे बड़ी चुनौती रिपोर्ट के उस हिस्से में है जिसमें उसने बैंकों के फंसे हुए कर्ज का आकलन पेश किया है। उसके मुताबिक सरकारी बैंक इससे सबसे अधिक प्रभावित हैं। एक बार फिर सरकारी बैंकों की ऋण देने की क्षमता बुरी तरह प्रभावित हुई है।
- बेसल-3 मानकों को पूरा करने के लिए जहां बैंकों को बड़ी संख्या में पूंजी की आवश्यकता है वहीं उपरोक्त कारकों ने सरकारी बैंकों और उनकी मालिक यानी सरकार के समक्ष बड़ी चुनौती पेश की है। मानो निजी तौर पर बैंकों की समस्या ही काफी नहीं थी क्योंकि रिपोर्ट में बड़े सरकारी बैंकों के आपसी रिश्तों को लेकर भी यह जोखिम दर्शाया गया है कि एक बैंक पर पडऩे वाला दबाव शीर्ष पांच बैंकों में से प्रत्येक को प्रभावित कर सकता है।

- बैंकिंग क्षेत्र को लेकर तमाम जोखिमों के जिक्र के बीच रिपोर्ट कुछ खास समस्याओं की ओर इंगित करती है। 
- उदाहरण के लिए ऋण पर देनदारी चूकने के मामलों और ऐसी चूक करने वाले डिफॉल्टरों के साथ ढिलाईपूर्ण व्यवहार काफी समय से आम चर्चा का विषय रहा है। 
- रिपोर्ट में इस मसले का जिक्र दोहरे लाभ के रूप में किया गया है। मिसाल के तौर पर कंपनियों के प्रवर्तक अपने पहले से चल रहे कारोबार में निवेश के लिए कर्ज लेते हैं। 
- रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि इसकी वजह से जल्दी ही अस्थिरता बढ़ सकती है जो अंतत: डिफॉल्ट का सबब बनेगी। व्यापक पैमाने पर देखा जाए तो डिफॉल्ट एक बड़ा जोखिम बन सकता है। रिपोर्ट का समापन नियामकों के कदमों से जुड़े आश्वासन के साथ होता है। लेकिन इन तमाम बातों के बीच रिपोर्ट का समग्र संदेश गंभीर है। 
- एक खस्ता वित्तीय व्यवस्था का व्यापक असर हम वर्ष 2008 के वित्तीय संकट के दौरान देख चुके हैं। भारत वैसा गंभीर झटका अपने यहां झेलने की स्थिति में नहीं है।

 

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