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बढ़ता जलसंकट : कारण , प्रभाव और उपाय

- आज पूरी दुनिया जलसंकट से जूझ रही है। प्राकृतिक संसाधनों पर शोध करने वाले अमेरिकी संस्थान 'वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट" के ताजा आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि दुनिया के 37% लोग पानी की किल्लत का सामना कर रहे हैं।
- इनमें सिंगापुर, कतर, जमैका, बहरीन, सऊदी अरब और कुवैत समेत 19 देश्ा ऐसे हैं, जहां पानी की आपूर्ति मांग से बेहद कम है।
- हमारा देश इन देशों से सिर्फ एक पायदान पीछे है।
- आज दुनिया की तकरीबन 500 नदियां घोर प्रदूषण के चलते विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई हैं।
- विकासशील देशों में हर साल लगभग 22 लाख लोग अशुद्ध पानी से होने वाली बीमारियों के कारण मौत के मुंह में चले जाते हैं। इनमें बच्चों की तादाद सबसे ज्यादा है।
- एक कड़वा सच यह भी है कि अफ्रीका और एशिया के कुछ देशों में महिलाओं को पानी लाने के लिए औसतन छह किलोमीटर की दूरी तय करना पड़ती है।
- हम 70 फीसद पानी का उपयोग कृषि कार्यों में करते हैं। लेकिन 2020 तक हमें इसके लिए भी 17 फीसद अतिरिक्त पानी की जरूरत पड़ेगी।
- जहां तक भारत का सवाल है, तो यहां जलसंकट के पीछे असली कारण उपलब्धता के मुकाबले मांग का बहुत अधिक होना है। इसके पीछे बढ़ती आबादी की अहम भूमिका है।
- फिर पानी की बेतहाशा बर्बादी को भी नकारा नहीं जा सकता। कहीं रखरखाव में लापरवाही के चलते पाइप लाइनों के टूटने से पानी बह जाता है और कहीं भ्ाूजल माफिया द्वारा पानी की चोरी व वाहनों की सफाई में अंधाधुध बेकार मेें बहा दिया जाता है।
- एक अनुमान के अनुसार अकेले हमारे यहां बस, कार, टैक्सी और दुपहिया वाहनों की सफाई में तकरीबन 5 करोड़ लीटर से अधिक पानी बर्बाद कर दिया जाता है।
- सिर्फ दिल्ली में पाइप लाइनों के टूटने से इतना पानी बर्बाद हो जाता है, जिससे तकरीबन 40 लाख लोगों की प्यास बुझाई जा सकती है।

***उपाय :-
- इसलिए जरूरी है कि पानी की चोरी और बर्बादी पर अंकुश लगाने के लिए कड़े कानून बनाए जाएं, साथ ही भूजल माफिया द्वारा पानी की चोरी और इसके अंधाधुंध दोहन पर अंकुश लगाया जाए।
- पानी का कारोबार करने वाली कंपनियां कारोबार करें, लेकिन उन्हें पानी का अत्यधिक दोहन कर बड़े पैमाने पर मुनाफा कमाने की इजाजत न दी जाए।
- वाटर हार्वेस्टिंग वाली जगहों पर बहुमंजिला अपार्टमेंट्स, रिसॉर्ट्स आदि बनाने की इजाजत न दी जाए।
- पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में, चाहे वह पहाड़ी राज्य ही क्यों न हों, ऐसे निर्माण की इजाजत न दी जाए और पानी का उचित प्रबंध्ान किया जाए।
- इसके लिए समुचित निगरानी तंत्र विकसित करने के अलावा जन-जागृति लाने की भी दरकार है।
- पानी के संकट से निजात पाने के लिए जरूरी है कि बड़ी-बड़ी योजनाओं के बजाय क्षेत्रवार छोटी-छोटी योजनाएं बनाई जाएं और उन पर पूरा ध्यान केंद्रित करें।
- छोटी-छोटी योजनाएं ज्यादा प्रभ्ाावी होंगी और इनका पर्यावरण पर भी दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा।
- कोशिश यह की जाना चाहिए कि विकास के दौरान पर्यावरण को कम से कम क्षति पहुंचे। - - यह काम विकास और पर्यावरण के बीच समुचित तालमेल बिठाए बगैर नामुमकिन है।
- जरूरी है कि औद्योगिक प्रतिष्ठानों, ऑटोमोबाइल उद्योग द्वारा किए जा रहे भ्ाूजल व सतही जल प्रदूषण को नियंत्रित किया जाए।
- होटल उद्योगों पर अंकुश हेतु नीति निर्धारित करें एवं घ्ारेलू कार्यों में किए जाने वाले जल के अपव्यय को रोकने हेतु प्रति व्यक्ति जल उपयोग की सीमा निर्धारित की जाए।
- व्यर्थ बह जाने वाले वर्षा जल के समुचित उपयोग की व्यवस्था भी की जाना चाहिए।
- इसके अलावा सबसे पहले भ्ाूजल को भ्ाारत के संविधान में स्थान दिलाने हेतु देश के राजनेताओं, जलनीति नियामकों और जल प्रबंधकों को सहमत कराया जाए।
- ग्लोबल वॉर्मिंग के परिप्रेक्ष्य में हमारी सोच, दृष्टिबोध और कार्यक्रमों की दिशा में बदलाव लाया जाए।
- सरकार को सतही और भूजल को समान महत्व देने हेतु राजी किया जाए। सतही और भूजल रिचार्ज परियोजनाओं की नए सिरे से योजना बनाई जाए।
- पर्यावरणीय एवं टिकाऊ जल व्यवस्था के आधार पर कामों की योजना बनाई जाए और उसे जलनीति में शामिल किया जाए।
- सारा बरसाती जल, जो सतही सिंचाई योजनाओं के निर्माण में उपयोग में लाया जाता है, उसके कुछ हिस्से को ग्राउंड वाटर रिचार्ज योजनाओं के निर्माण हेतु आवंटित किया जाए। -
- जब तक पानी की एक-एक बूंद का हिसाब नहीं रखा जाएगा, समाज को उसके महत्व के बारे में जागरूक किया जाए,
- पानी के अपव्यय के मामले में दंड हेतु कानून बनाया जाए,
- सच तो यह है कि जलसंकट का सही मायने में समाधान तभी संभव है, जब सरकारों का सोच इसके निदान का हो और वे ईमानदारी से इस पर ध्यान देते हुए गंभीरतापूर्वक काम करें।
- साथ ही हम सब जल के मूल्य को समझें और अपनी जल-अपव्यय की जीवन शैली पर अंकुश लगाएं।

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