Current Details

श्रम कानून में सुधार समय की मांग

- नए आर्थिक विश्व के कारण भारत में श्रम सुधार की आवश्यकता बढ़ गई है. 
- पिछले 23 वर्षो में भारतीय उद्योगों को विश्व भर में प्रतिस्पर्धात्मक बनाने के उद्देश्य से वित्तीय क्षेत्र, मुद्रा-बैंकिंग व्यवसाय, वाणिज्य, विनिमय दर और विदेशी निवेश क्षेत्र में नीतिगत बदलाव किए गए हैं. 
- इन बदलावों के कारण श्रम कानूनों में बदलाव भी जरूरी दिखाई दे रहे हैं. उल्लेखनीय है कि श्रम से संबंधित केन्द्र सरकार के पास करीब 50 और राज्य सरकारों के पास 150 कानून हैं. 
- कई शोध अध्ययनों में यह तथ्य उभरकर सामने आया है कि भारत में उदारीकरण की धीमी और जटिल प्रक्रिया के पीछे श्रम सुधारों की मंद गति एक प्रमुख कारण है.

- देश की नई आर्थिक एवं व्यावसायिक जरूरतों के संदर्भ में कुछ प्रमुख श्रम कानूनों जैसे-मजदूरी भुगतान अधिनियम 1936, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948, कर्मचारी भविष्य निधि एवं प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम 1952, कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम 1948, ठेका श्रम विनियमन एवं उत्पादन अधिनियम 1970, कारखाना अधिनियम 1948, खान अधिनियम 1952, कर्मकार प्रतिकर अधिनियम 1923, अंतर्राज्यिक प्रवासी कर्मचारी (रोजगार का विनियमन एवं सेवा शर्त) अधिनियम 1979 में ऐेसे संशोधनों की जरूरत अनुभव की जा रही है जिससे देश भूमंडलीकरण के परिदृश्य में प्रतिस्पर्धी बन सके.

- अब तक देश में श्रम सुधार के मद्देनजर दो श्रम आयोग गठित हो चुके हैं. प्रथम राष्ट्रीय श्रम आयोग का गठन 24 सितम्बर 1966 को हुआ था.
- सरकार ने नई औद्योगिक -व्यावसायिक जरूरतों के लिए व्यापक श्रम कानून बनाने के बारे में सिफारिश करने के लिए रविन्द्र वर्मा की अध्यक्षता में 15 अक्टूबर 1999 को दूसरे श्रम आयोग का गठन किया था.
- द्वितीय श्रम आयोग ने 29 जून, 2002 को 1500 पृष्ठों वाली श्रम संरक्षण और श्रम सुधार से जुड़ी सिफारिशों का मसौदा सरकार को सौंपा था. 
- इनमें से कई सिफारिशें नई श्रम कार्य जरूरतों को रेखांकित करती हैं, मसलन राष्ट्रीय छुट्टियों में कटौती, उद्योगों को बिना सरकार की इजाजत बंद करने और कर्मचारियों की छंटनी का अधिकार.

- इसके साथ-साथ द्वितीय श्रम आयोग ने चीन को मॉडल बनाकर श्रम कानूनों को उपयुक्त बनाने की भी सिफारिशें की हैं. चीन में श्रम कानूनों को अत्यधिक उदार और लचीला बनाकर कार्य संस्कृति विकसित की गई है. चीन में पुराने व बंद उद्योगों में कार्यरत श्रमिकों को नई जरूरतों के अनुरूप काम करने के लिए प्रशिक्षण देने की नीति भी अपनाई जा रही है.चीन सरकार घाटे में चलने वाले सार्वजनिक उपक्रमों को कोई सब्सिडी नहीं देती है और उन्हें बंद करने की नीति कार्यान्वित की जा रही है. 

- यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों इकानोमिस्ट इन्टेलीजेंस यूनिट (ईआईयू) ने विश्व व्यापार के संदर्भ में तैयार रिपोर्ट में विकासशील और विकसित देशों में व्यापार करने या उद्योग लगाने के लिए श्रम परिप्रेक्ष्य में अनुकूल माहौल की चर्चा की है. 
- इस रिपोर्ट में भारत को 46वां स्थान दिया गया है जबकि चीन, दक्षिण कोरिया, मेक्सिको और थाईलैंड की रैकिंग भारत से काफी ऊपर है. विकसित देशों ने श्रम कानून की कसौटियों पर भारत की आलोचना की है.

- विकसित देशों का मानना है कि भारत में उदारीकरण की प्रक्रिया काफी धीमी और जटिल है तथा श्रम सुधारों की गति मंद है. 
- निसंदेह अब श्रम सुरक्षा और श्रम सुधार के बीच समन्वय की आवश्यकता के इस दौर में सरकार को करोड़ों श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा और देश की आर्थिक विकास की जरूरत के बीच समन्वय स्थापित करना होगा. 
- असंगठित क्षेत्र के करोड़ों श्रमजीवी सामाजिक सुरक्षा की प्रतीक्षा में हैं.

- अब देश में आर्थिक सामाजिक सुरक्षा की विशाल आवश्यकता के लिए बहुआयामी कार्यनीति जरूरी है. ग्रामीण श्रमिकों के सभी वगरे की सामाजिक सुरक्षा योजना पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए. 
- इसी तरह वैीकरण के परिप्रेक्ष्य में श्रम कानूनों और नियमों को अधिक लचीला बनाया जाना जरूरी है. श्रम संबंधी हमारी नीतियों और अन्य मुद्दों पर पुनर्विचार की तत्काल आवश्यकता है ताकि भारत को विश्व अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धी और प्रमुख देश बनाया जा सके.
- वस्तुत: श्रम सुधार समय की मांग है. ऐसे सुधारों से विकास के नए रास्ते खोले जा सकते हैं. इससे देश का निर्यात नई ऊंचाई पर पहुंच सकता है और काम के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं. 
- वैश्विक स्तर पर यह माना जा रहा है कि भारत की श्रमशक्ति ही भारत को विश्व शक्ति बनाएगी. 
- हम आशा करें कि श्रम सुधारों के बाद हमारी श्रम शक्ति चीन की तरह उत्पादन के प्रमुख साधन के रूप में आर्थिक युग के नए दायित्वों को स्वीकार करते हुए देश की मिट्टी को सोना बनाते हुए दिखाई देगी.
- समय की जरूरत के मुताबिक अब श्रम कानूनों में लचीलापन लाने और इंस्पेक्टर राज समाप्त करने के लिए श्रम नियमों को सरलतापूर्वक लागू करना होगा. श्रम कानूनों की भरमार कम करनी होगी और ऐसी नीतियां और कार्यक्रम बनाने होंगे, जिनसे उत्पादन बढ़े और उपयुक्त सुरक्षा ढांचे के साथ श्रमिकों का भी भला हो.

Back to Top