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अमेरिका और ब्रिटेन की तर्ज पर चीफ-ऑफ-डिफेंस स्टाफ की भारत में नियुक्ति

<p> एक अच्छी खबर न सिर्फ भारतीय सेना के लिए है बल्कि उन सबके लिए भी है जो मुल्क की सुरक्षा व्यवस्था में रुचि रखते हैं। अब यह लगभग तय है कि अमेरिका और ब्रिटेन की तर्ज पर चीफ-ऑफ-डिफेंस स्टाफ यानी सेना के तीनों अंगों का एक संयुक्त अध्यक्ष होगा।</p> <p> &nbsp;</p> <p> यह कोई राज की बात नहीं है कि आजादी के बाद के पहले सालों में और खासकर 1958 के बाद देश की सरकार को यह डर सताता था कि कहीं ऐसा न हो कि पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष अयूब खान द्वारा किए गए तख्ता पलट की तरह हमारे यहां पर भी चुनी हुई सरकार को हटा दिया जाए। इस सोच को तब और भी बल मिला जब इस घटना के दो साल बाद बर्मा (अब म्यांमार) में भी यह उदाहरण देखने को मिला। लेकिन किसी भी सूरत में यह डर सही नहीं था क्योंकि लोकतंत्र ने हमारे देश में करवाए गए पहले आम चुनाव से ही जड़ पकड़ ली थी।</p> <p> &nbsp;</p> <p> &nbsp;जो भी अंदर की जानकारी रखते थे, वे कहा करते थे कि अगर कहीं सेना प्रमुख, उप-सेना प्रमुख और आक्रमण करने वाली सैनिक कमांड के मुखियाओं को एक कमरे में बंद कर दिया जाए तो वे सब आपस में जरा-सी दिखने वाली इस मामूली बात पर भी एकमत नहीं होंगे कि उस वक्त सही में दिन का कौन सा समय है! फिर भी संयुक्त कमान अध्यक्ष वाला यह विषय देश के शीर्ष प्रशासकों के दिमाग में इतना कुलबुलाहट भरा रहा है कि नब्बे के दशक के मध्य में रक्षा मंत्रालय के एक सचिव जिन्हें काफी समझदार माना जाता था, ने एक ऐसा अनर्गल वक्तव्य दे डाला कि सुरक्षा सेनाओं के प्रमुखों के संयुक्त अध्यक्ष (ज्वांइट-चीफ-ऑफ स्टाफ या सीडीएस) की जरूरत केवल उन्हीं देशों में है जिनकी सामरिक अभिरुचि विश्वव्यापी होती है! उनके मुताबिक भारतीय सेना का काम सिर्फ देश की सीमाओं और तटों की रक्षा करना ही है।</p> <p> &nbsp;</p> <p> आगे कहीं जाकर सिर्फ कारगिल युद्ध के बाद ही एक सीडीएस होने की जरूरत पर देश की नींद खुली। इसका श्रेय उस कारगिल समीक्षा समिति को जाता है, जिसमें भारत के सामरिक और सुरक्षा मामलों के शीर्ष गुरु शामिल थे। जैसे कि इसमें अन्यों के अलावा मशहूर पत्रकार जॉर्ज वर्गीस, ले. जनरल के.के हजारी (सेनानिवृत्त) इस समिति के सदस्य थे और भारतीय विदेश सेवा के सतीश चंद्रा इसके मैंबर-सेक्रेट्री थे। इस समिति की सिफारिश थी कि तीनों सेनाओं का रक्षा मंत्रालय से एकीकरण कर दिया जाना चाहिए-फिलहाल वे केवल रक्षा मंत्रालय से संबद्ध विभाग&Oacute; हैं-और सेना के तीनों अंगों के प्रमुखों को सरकार का हिस्सा बना देना चाहिए और उनकी भूमिका केवल अपने अंतर्गत आती फौज का कमांडर होने तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए। यह एक सशक्त और ठोस सुझाव था।</p> <p> <br /> इसके बाद दस साल बीत गए और यूपीए-2 की सरकार ने एक कार्यबल का गठन किया जिसके अध्यक्ष पूर्व कैबिनेट सचिव और अमेरिका में भारत के राजदूत रह चुके एन. चंद्रा थे। तमाम मंत्रालयों और अन्य संबंधित विभागों द्वारा मुहैया करवाए गए साक्ष्यों के आधार पर इस कार्यबल ने यह निष्कर्ष निकाला कि सीडीएस नियुक्त करने वाला विचार अभी भी आदर्शक स्थिति पर खरा नहीं उतरता। इसलिए इसका सुझाव था कि सयुंक्त सेना प्रमुख समिति का एक स्थाई अध्यक्ष होना चाहिए जिसका कार्यकाल दो साल का हो।</p> <p> <br /> फिलहाल इस समिति के अध्यक्ष पद पर सेना के तीनों अंगों के प्रमुख बारी-बारी से बैठते हैं और इनमें भी सबसे वरिष्ठ को यह मिलता है। इसका नतीजा यह होता है कि अध्यक्ष का कार्यकाल कम ही होता है, एक मामले में तो यह केवल तीस दिनों का ही हो पाया था क्योंकि तत्कालीन अध्यक्ष को अपने अंतर्गत आती फौज का काम भी संभालना था जिसके चलते उसके पास अंतर-सैन्य समन्वय और सहयोग पर काम करने का समय कम पड़ता था।</p> <p> <br /> परंतु समीक्षा-कार्यबल ने इस बात पर ध्यान जरूर दिया था कि एक स्थाई संयुक्त अंतर-सेना अध्यक्ष होने से तीनों अंगों के प्रमुखों को अपने-अपने विभागों की कार्यप्रणाली को सुचारु बनाए रखने के लिए ज्यादा समय मिल पाएगा। इसके अतिरिक्त ऐसा होने पर वे नए हथियार और उपकरण खरीदने समेत सुरक्षा से जुड़े उन तमाम अंतर-सेना मामलों पर भी ध्यान केंद्रित करने में सक्षम हो पाएंगे।</p> <p> <br /> इससे भी ज्यादा अहम है सामरिक कमान की निगरानी। कई पूर्व संयुक्त सेना प्रमुख समिति के अध्यक्षों ने यह माना है कि उनके पास इस कमान का अध्यक्ष पद होने के बावजूद इस पर यथेष्ठ ध्यान देने का समय कम ही मिलता था।<br /> &nbsp;</p>

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