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लोकतंत्र में प्रवासियों की भागीदारी

&raquo;&nbsp;प्रवासी भारतीयों को अब अपना मत डालने के लिए भारत नहीं आना पड़ेगा। वे अब देश से बाहर रहकर भी अपने मतदान के अधिकार का इस्तेमाल कर सकेंगे। सुप्रीमकोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिए हैं कि जल्दी ही प्रवासी भारतीयों को ई-वोटिंग का अधिकार दिया जाए। देश में पोस्टल वोटिंग का प्रावधान शुरू से ही रहा है। जो लोग सेना में हैं अथवा विदेशों में भारतीय दूतावास में काम करते हैं, वे इस अधिकार का उपयोग करते भी हैं।<br /> <br/>&raquo;&nbsp;इसी का विस्तार है एनआरआई को ई-वोटिंग के माध्यम से मतदान का अधिकार देना। पोस्टल वोटिंग और ई-वोटिंग में अंतर यह है कि पोस्टल वोटिंग में चुनाव तिथि के सात दिन के पूर्व तक वोट भेजने की अनुमति होती है जबकि ई-वोटिंग में उसी दिन, उसी समय वोटिंग संभव हो जाती है।<br /> <br/>&raquo;&nbsp;अनुमान है कि एक करोड़ से भी अधिक आबादी एनआरआई लोगों की है। इसलिए ई-वोटिंग इन सबको भारत से सीधे जुड़ने का मौका देगी। चुनाव आयोग के इतने सार्थक उपायों के बावजूद लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में औसत वोटिंग 60-65 फीसदी ही रहती है। बाकी के 40 प्रतिशत लोग अपना कीमती वोट नहीं दे पाते। अनिवासी भारतीय हों या देश के भीतर ही विस्थापित, इन 40 प्रतिशत लोगों के लिए चुनाव आयोग को क्या गंभीर नहीं होना चाहिए?<br /> <br/>&raquo;&nbsp; इंटरनेट या मोबाइल से वोटिंग करने के लिए सबसे पहले वोटरों का रजिस्ट्रेशन किया जाएगा। उसी वक्त वोटर का फोटो को साथ रजिस्ट्रेशन किया जाएगा। जो भी मतदाता ई-वोटर के तौर पर रजिस्टर्ड होगा, उसका नाम सामान्य मतदाता सूची से निकाल दिया जाएगा। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होगा कि मतदान के वक्त मतदाता की पहचान नहीं हो पाएगी। दूसरे इंटरनेट के जरिए वोटिंग करते वक्त यह सुनिश्चित नहीं हो पाएगा कि वोटिंग के वक्त वोटर के पास उसे प्रभावित करने वाला कोई तत्व है और यह संविधान की गुप्त मतदान की अवधारणा के विपरीत है।<br /> मोबाइल के जरिए मतदान करने से बोगस वोटिंग की संभावना बढ़ जाएगी। अगर किसी ने कई लोगों के नाम पर मोबाइल वोटिंग का रजिस्ट्रेशन करवा लिया और मतदान के दिन उनका उपयोग किया तो इससे बोगस मतदान बढ़ेगा। दूसरे इंटरनेट वोटिंग के लिए यह जरूरी है कि जिस कंप्यूटर की मार्फत रजिस्ट्रेशन कराया गया है, वोटिंग भी उसी कंप्यूटर से की जाए। यानी एक कंप्यूटर से एक ही वोटर मतदान कर सकेगा। ऐसे में अगर एक घर में छह वोटर होंगे तो सभी के लिए अलग-अलग कंप्यूटर की जरूरत होगी। जिनके पास खुद के कंप्यूटर नहीं हैं, उनके लिए ई-पोलिंग बूथ की व्यवस्था करनी पड़ेगी जो कि एक हास्यास्पद स्िथति होगी क्योंकि जो वोटर ई पोलिंग बूथ पर जाकर मतदान कर सकता है, वह सामान्य पोलिंग बूथ पर भी जा सकता है।<br /> <br/>&raquo;&nbsp; चुनाव आयोग ई-वोटिंग की पहल कर भी चुका है लेकिन अभी तक यह योजना विधानसभा और लोकसभा चुनाव में लागू नहीं हो पायी है। चुनाव आयोग के अनुसार गुजरात नगरपालिका में 2010 और 2011 में ई-वोटिंग के माध्यम से मतदान कराया गया था। लेकिन इसके बाद यह योजना बहुत आगे नहीं बढ़ पाई। आस्ट्रेलिया, नार्वे और कनाडा जैसे कुछ देशों में आनलाइन वोटिंग के प्रयोग शुरू भी हो चुके हैं। अमेरिका में भी आनलाइन वोटिंग की सुविधा की मांग की जा रही है।<br /> <br/>&raquo;&nbsp; इससे चुनाव में युवाओं की हिस्सेदारी बढ़ेगी और मतदान का प्रतिशत भी बढ़ेगा। लेकिन इसके दुरुपयोग की आशंका भी है। विशेषज्ञों के अनुसार राजनीतिक पार्टियां हैकरों की मदद से इस सिस्टम का दुरुपयोग कर सकती हैं। आनलाइन वोटिंग से सम्बंधित और भी कई तकनीकी समस्याएं हैं, जिनके माकूल समाधान के बिना फिलहाल ये संभव नहीं लगती। आनलाइन वोटिंग में वोटर की आइडेंटिफिकेशन के लिए आधार कार्ड और एनपीआर के डेटा को प्रयोग करके उसे आनलाइन लिंक किया जा सकता है। इससे आइडेंटिटी के फर्जीवाड़े से काफी हद तक बचा जा सकता है। आधार केंद्र सरकार की ओर से हर नागरिक को जारी की जाने वाली एक विशिष्ट पहचान संख्या है। इस पर 12 अंकों का उस नागरिक का एक यूनिक नंबर लिखा होता है। इससे वेरिफिकेशन की प्रक्रिया भी आसान हो जाएगी।<br /> <br/>&raquo;&nbsp;नेशनल पापुलेशन रजिस्टर में देश के हर नागरिक की जानकारी दर्ज होती है। इसमें रजिस्टर करने के बाद 18 साल से ऊपर के सभी लोगों को स्मार्ट नेशनल आइडेंटिटी दिया जाता है।<br /> <br/>&raquo;&nbsp; आनलाइन हैकिंग और तकनीकी गड़बड़ी दूर करने के लिए चुनाव आयोग देश के 543 लोकसभा के विभिन्न केन्द्रों में अपने ही केन्द्रों में आनलाइन वोटिंग की सुविधा प्रदान कर सकता है, जिससे घर से दूर बैठे लोग वोट कर सकें।<br />

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