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जघन्य अपराध में नाबालिगों की बढ़ती संलिप्तता पर बहस को विराम

&raquo;&nbsp; बलात्कार सरीखे जघन्य अपराध में नाबालिगों की बढ़ती संलिप्तता की वजह से किशोर न्याय कानून में संशोधन कर नाबालिग की आयु सीमा 18 साल से घटाकर 16 साल करने की लंबे समय से उठ रही मांग पर अब विराम लग गया है। संसद की स्थाई समिति ने किशोर न्याय(बच्चों की देखभाल और संरक्षण) विधेयक 2014 में किशोर की परिभाषा में संशोधन कर उनकी आयु सीमा 18 साल से घटाकर 16 साल करने का सरकार का प्रस्ताव ठुकरा दिया है।<br /> <br/>&raquo;&nbsp; निर्भया सामूहिक बलात्कार कांड के बाद से यह मांग जोर पकड़ रही थी कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में 16 से 18 साल के किशोरों की संलिप्तता की बढ़ती घटनाओं के मद्देनजर ही ऐसे आरोपियों पर भी भारतीय दंड संहिता के तहत ही वयस्क आरोपी के रूप में मुकदमा चलना चाहिए।<br /> <br/>&raquo;&nbsp;किशोर न्याय कानून के तहत किशोर की परिभाषा में बदलाव और उनकी आयु सीमा घटाकर 16 साल करने की मांग के बावजूद राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग जघन्य अपराधों में किशोरों की संलिप्तता की स्थिति में उन पर भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों के तहत मुकदमा चलाने का पक्षधर कभी नहीं रहा। इसके विपरीत, बलात्कार जैसे घृणित अपराध में ऐसे किशोरों की सक्रिय भूमिका को देखते हुए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय जघन्य अपराध करने वाले किशोरों पर भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों के तहत मुकदमा चलाने का पक्षधर था।<br /> <br/>&raquo;&nbsp;संसद की स्थाई समिति ने बलात्कार जैसे जघन्य अपराध में संलिप्त 16 से 18 साल के किशोरों पर भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों के तहत वयस्क आरोपी की तरह ही मुकदमा चलाने का प्रावधान करने संबंधी किशोर न्याय कानून में संशोधन का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया है।<br /> <br/>&raquo;&nbsp;संसदीय समिति का मत है कि 18 वर्ष की आयु से नीचे के सभी व्यक्तियों को किशोर ही माना जाना चाहिए। समिति की यह राय भी है कि ऐसा करना अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुरूप नहीं होगा। इसलिए सरकार को सारी कवायद पर नये सिरे से विचार करना चाहिए।<br /> <br/>&raquo;&nbsp;सरकार ने इस संबंध में पिछले साल अगस्त में लोकसभा में किशोर न्याय(बच्चों की देखभाल और संरक्षण) विधेयक 2014 पेश किया था। इस विधेयक को विचार के लिये संसद की स्थाई समिति के पास भेज दिया गया था। हाल ही में महिला एवं बाल कल्याण मंत्री मेनका गांधी ने संसद को सूचित किया था कि महिलाओं के प्रति अपराधों में किशोरों या कहंे कि नाबालिगों की संलिप्तता में 132 फीसदी की वृद्धि हुई है।<br /> <br/>&raquo;&nbsp;हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कुछ सालों में बलात्कार, हत्या, युवतियों पर तेजाब फेंकने या महिलाओं के प्रति यौन हिंसा जैसे दूसरे संगीन अपराधों में किशोरवय युवकों की आपराधिक गतिविधियों में वृद्धि हुई है लेकिन कानूनी प्रावधानों की वजह से इस आयु वर्ग के किशोर जेल जाने या भारतीय दंड संहिता के तहत मुकदमे की कार्यवाही से बच जाते हैं।<br /> <br/>&raquo;&nbsp;इस आयु वर्ग के किशोरों पर किशोर न्याय कानून के प्रावधानों के तहत कार्यवाही होती है और उन्हें बाल सुधार गृह भेज दिया जाता है। किशोर न्याय कानून के तहत किशोरों को बाल सुधार गृहों में रखने का प्रावधान है लेकिन अकसर इन सुधार गृहों से किशोरों के भाग निकलने या उनमें हंगामा करने की घटनायें सामने आ रही हैं।<br /> <br/>&raquo;&nbsp;निर्भया सामूहिक बलात्कार मामले में किशोर आरोपी के कठोर सजा से बच निकलने का मामला और ऐसे अपराधों में संलिप्त किशोरों पर वयस्क आरोपी की तरह ही मुकदमा चलाने का मामला शीर्ष अदालत में लंबित है। इस संदर्भ में अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने भी न्यायालय को सूचित किया था कि किशोर न्याय कानून से जुड़े विभिन्न पहलू सरकार के विचाराधीन हैं। यह सुझाव भी दिया जा रहा था कि किशोर न्याय कानून के तहत इस तरह के जघन्य अपराधों में शामिल किशोर की उम्र की बजाय उसकी मानसिक और शारीरिक परिपक्वता को ध्यान में रखा जाये।<br /> <br/>&raquo;&nbsp;जहां तक किशोर न्याय कानून में परिभाषित किशोर की आयु को कम करने का सवाल है तो उच्चतम न्यायालय पहले ही जुलाई, 2013 में ऐसा करने से इनकार कर चुका है। न्यायालय ने तर्कों को सिरे से अस्वीकार कर दिया था कि जघन्य अपराधों में 16 से 18 वर्ष की आयु के व्यक्तियों की बढ़ती भागीदारी के मद्देनजर किशोर की उम्र सीमा घटाकर 16 साल की जाये।<br /> <br/>&raquo;&nbsp;संसदीय समिति ने हालांकि जघन्य अपराधों में संलिप्त 16 से 18 साल की आयु के किशोरों को वयस्क किशोर मानने का प्रावधान करने संबंधी संशोधन अस्वीकार कर दिया है, लेकिन ऐसे अपराधों में किशोरों की भागीदारी को देखते हुए किशोर की परिभाषा के दायरे से 16 से 18 वर्ष के किशोरों को बाहर निकालने के सवाल पर बहस जारी है।<br /> <br/>&raquo;&nbsp;उम्मीद की जानी चाहिए कि संसदीय समिति की रिपोर्ट के बाद अब किशोर की परिभाषा में बदलाव करके उनकी आयु सीमा 18 साल से घटाकर 16 साल करने या फिर जघन्य अपराधों में 16 साल से 18 साल की आयु के किशोरों पर वयस्कों की तरह ही मुकदमा चलाने की मांग पर फिलहाल कुछ समय के लिये विराम लग जायेगा।<br />

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