Current Details

धारा 66ए की समाप्ति: अभिव्यक्ति की आजादी (क्या और कैसे)

&bull;&nbsp; सर्वोच्च न्यायालय के दो सदस्यीय पीठ ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की विवादास्पद धारा 66ए को खत्म करने का जो आदेश दिया, वहीं एक अन्य विवादित धारा 79 के प्रावधानों को थोड़ा शिथिल किया गया।<br /> <br/>&bull;&nbsp; जबकि वेबसाइटों पर गोपनीय ढंग से सेंसरशिप रखने की अनुमति देने वाली धारा 69 को वैध करार दिया गया। इस फैसले ने इस बात को पुष्ट&iuml; किया कि साइबर क्षेत्र में लागू कानून भी अभिव्यक्ति की आजादी के मूल अधिकार का हनन नहीं कर सकते।<br /> <br/>&bull;&nbsp;न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर और रोहिंटन एफ नरीमन ने कहा कि धारा 66ए असंवैधानिक है और वह अभिव्यक्ति की आजादी और ज्ञान की आजादी का हनन करती है।<br /> <br/>&bull;&nbsp;पीठ ने कहा कि 66 ए का एक बहुत व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। इसके तहत कोई भी व्यक्ति अगर इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों की मदद से किसी को परेशान करने वाले या नुकसान पहुंचाने वाले संदेश भेजता है तो उसे तीन साल की जेल हो सकती है। कई घटनाओं में इसका इस्तेमाल उन लोगों को जेल भेजने में किया गया जिन्होंने राजनेताओं की आलोचना की थी या उनका मखौल उड़ाया था।<br /> <br/>&bull;&nbsp;हालिया घटना में एक किशोर ने उत्तर प्रदेश के राजनेता आजम खां के बारे में एक अपमानजनक विचार को सोशल मीडिया पर साझा किया था। इससे पहले महाराष्ट&iuml;्र में दो किशोरियों को इसलिए जेल भेज दिया गया था क्योंकि उन्होंने शिवसेना द्वारा बाला साहेब ठाकरे के निधन के अवसर पर आयोजित बंद के प्रति अपना विरोध जताया था।<br /> <br/>&bull;&nbsp;सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि धारा 66ए असंवैधानिक है क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के तहत अभिव्यक्ति की आजादी पर उचित प्रतिबंध के मानक को पूरा नहीं करती। अदालत का यह फैसला लगातार दो सरकारों द्वारा इसे बरकरार रखने के अनुरोध के बाद आया है। अदालत ने कहा कि सरकारें बदल सकती हैं लेकिन कानून तो बरकरार रहते हैं इसलिए इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि भविष्य की सरकारें इस धारा का जिम्मेदारीपूर्वक इस्तेमाल करेंगी।<br /> <br/>&bull;&nbsp;ऊपरी अदालत ने दो अन्य ऐसी धाराओं को बरकरार रखा जिनके बारे में कहा गया था कि वे अभिव्यक्ति की आजादी और ज्ञान के अधिकार का हनन करती हैं। पीठ ने कहा कि धारा 69, जो सरकार को यह अधिकार प्रदान करती है कि वह वेबसाइटों को गोपनीय रूप से सेंसर कर सके और आवश्यकता पडऩे पर ब्लॉक भी, वह एक वैध धारा है।<br /> <br/>&bull;&nbsp;ऐसे में सरकार आधार होने पर वेबसाइटों को ब्लॉक करना जारी रख सकती है। ऐसी कोई समीक्षा व्यवस्था भी नहीं है जिसके आधार पर ब्लॉक की गई सामग्री के मालिक को सूचित किया जाए, ब्लॉक के विरुद्घ अपील के अधिकार की तो बात ही छोड़ दीजिए। इसके व्यावसायिक निहितार्थ भी हैं। आईटी अधिनियम की धारा 79 के प्रावधानों को नरम बनाया गया है। इससे पहले इंटरनेट सेवा प्रदाताओं अथवा वेबसाइटों को कोई भी नकारात्मक सामग्री संबंधित नोटिस प्राप्त होने के 36 घंटे के भीतर हटानी होती थी या फिर उनकी जवाबदेही बनती थी।<br /> <br/>&bull;&nbsp;वास्तव में कोई भी मनमाने ढंग से ऐसा नोटिस भेज सकता था। अब देश की सबसे बड़ी अदालत ने कहा है कि कोई भी सामग्री हटाना तभी जरूरी होगा जबकि अदालत इसका आदेश दे या फिर सक्षम सरकारी विभाग की ओर से ऐसा करने को कहा जाए।<br />

Back to Top