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राजनीति का अपराधीकरण और न्यायिक सक्रियता

कहा जाता है कि- &#39;भगवान के यहां देर है, अंधेर नहीं।&quot; इसी तरह अदालती न्याय के लिए एक यूनिवर्सल मुहावरा है- &#39;जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड&quot;, अर्थात विलंबित न्याय, न्याय का हनन है। ईश्वर के यहां से होने वाले न्याय में देरी का याची के पास कोई इलाज नहीं है, सिवाय अच्छे दिनों की प्रतीक्षा करने के। तब मानवीय न्याय में होने वाली देर से लोग आखिर इतने विचलित क्यों होते हैं? आम आदमी तो खैर आम होता है, मगर खास आदमी जब विलंबित न्याय से पीड़ित होने लगे तो लगता है कि व्यवस्था या तंत्र में कहीं ना कहीं कोई दोष अवश्य है।<br /> <br/>कुछ माह पहले प्रधानमंत्री ने इच्छा व्यक्त की थी कि जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध चल रहे आपराधिक मामलों का सालभर में निपटारा हो जाए। प्रधानमंत्री मोदी की भावना यही रही कि लाखों नागरिकों का प्रतिनिधित्व करने वाला नेता अगर दोषी है तो सजा भुगते, ताकि जनता को ऐसे दुर्व्यसनी से मुक्ति मिले।<br /> <br/>वहीं अगर वह निर्दोष है तो निष्कलंक निकलने का सम्मान उसे शीघ्र से शीघ्र प्राप्त हो। उस समय शीर्ष न्यायालय ने मोदी की मनोकामना पर पूर्ण नहीं, अल्प-विराम यह टिप्पणी करते हुए लगाया था कि सिर्फ सांसदों या महिलाओं या बुजुर्गों के मामलों की फास्ट ट्रैक सुनवाई करने से ही न्याय प्रक्रिया की रफ्तार में तेजी नहीं आएगी।<br /> <br/>तथ्यों की दृष्टि से लोकसभा के 186 और राज्यसभा के 41 सांसद गंभीर अपराधों के आरोपों में विचारण का सामना कर रहे हैं। स्वयं मोदी सरकार के 14 मंत्रियों पर भी आपराधिक मामले चल रहे हैं। देश की विधानसभाओं में 31 फीसद विधायकों के विरुद्ध आपराधिक मामले चल रहे हैं। क्या मामलों की यह संख्या उन आंकड़ों पर भारी है, जो बताते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय में 60 हजार, उच्च न्यायालयों में 44 लाख और निचली अदालतों में 2 करोड़ 68 लाख मामले विचाराधीन हैं। निश्चय ही नहीं।<br /> <br/>परंतु न्यायपालिका, विशेषत: निचली न्यायपालिका का अनुभव यही है कि जब भी कोई संगठित आवाज या जन-आंदोलन या मीडिया का अनवरत प्रचार किसी वर्ग विशेष के पीड़ित होने को लेकर उठता है, सरकारें फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन की घोषणा कर देती हैं और मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। जब अदालतें उतनी ही हैं, जज उतने ही हों, अमला उतना ही हो, संसाधन भी उतने ही हों जितने कि हैं, तो क्या घोषणा मात्र से किसी वर्ग विशेष के मामलों में त्वरित न्याय संभव हो सकता है? जब वर्ग विशेष के मामलों को प्राथमिकता से निपटाना हो तो पायलट प्रोजेक्ट जैसे उपाय ही कारगर हो सकते हैं।<br /> <br/>एक शंका यह भी उठती है कि क्या दागी जनप्रतिनिधि अपने मामलों का शीघ्र निपटारा चाहते भी हैं या नहीं? जमानत मिलने तक रसूखदार यह कहते हैं कि उन्हें न्यायालयों पर पूरा विश्वास है और उनके साथ न्याय होगा। जमानत पर छूटते ही विरला आरोपी होगा, जो शीघ्र न्याय की कामना करेगा। वास्तविक अपराधी तो कतई नहीं। संविधान कानून के समक्ष समता का मौलिक अधिकार प्रदान करता है तो अपराधियों में आम और खास का भेदभाव कैसा? फिर त्रिस्तरीय न्यायप्रणाली में यह कैसे संभव है कि कोई मामला सालभर में अंतिम परिणति तक पहुंच जाए। निचली अदालत से सजा हो तो अपील हाई कोर्ट में। वहां अपील खारिज हो तो अपील सुप्रीम कोर्ट में। क्या उच्चतर न्यायालयों में भी फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाना संभव है? संभवत: ऐसे ही किन्ही कारणों से शीर्ष न्यायालय ने सरकार से चार सप्ताह में दंड न्याय व्यवस्था में तेजी लाने का उपाय प्रस्तावित करने की अपेक्षा की थी।<br /> <br/>अब सुप्रीम कोर्ट ने ही जनहित के मद्देनजर राजनीतिक सुधारों और स्वच्छता की दृष्टि से एक कदम बढ़ाते हुए उच्च न्यायालयों में एक विशेष पीठ बनाने का निर्देश दिया है। छत्तीसगढ़ की विगत विधानसभा के पराजित प्रत्याशी की याचिका पर न्यायमूर्ति जे. चेलामेश्वर और न्यायमूर्ति रोहिंटन एफ. नरीमन की खंडपीठ ने व्यक्त किया कि अवैध साधनों के सहारे निर्वाचन में सफल सांसद या विधायक को एक दिन भी अपने पद पर नहीं रहना चाहिए।<br /> <br/>अनुभव बताता है कि शायद ही किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि के विरुद्ध लाई गई याचिका का निर्णय उसके कार्यकाल की समाप्ति के पूर्व हो पाता है। कार्यकाल समाप्ति के बाद कदाचित अपराध में दोषी ठहराकर दंडित किया भी जाए तो क्या वह निर्दोष जनता का निष्कलंक जनप्रतिनिधि माना जाएगा?<br /> <br/>यही मॉकरी ऑफ जस्टिस है, न्याय का उपहास है।<br /> <br/>अब उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधिपति लोकतंत्र में &#39;लोक&quot; की सर्वोच्चता की रक्षा के लिए ऐसी विशेष खंडपीठ और विशेष अदालतें गठित करेंगे, ऐसी आशा की जानी चाहिए। प्रश्न यह नहीं है कि संसदीय लोकतंत्र में संसद सर्वोच्च है जो कानून बनाती है या सुप्रीम कोर्ट सर्वोच्च है, जो कानूनों की अंतिम व्यवस्था करता है।<br /> <br/>दोनों ही संस्थाएं भारतीय संविधान की आत्मा और कलेवर की रक्षा करने को कृतसंकल्प हैं। उनके अधिकार, उनकी शक्तियां और उनके कर्तव्यों की गीता, उपनिषद, पुराण, कुरान या बाइबिल, जो भी हो, भारत का संविधान ही है जिसे &#39;इस भारत के लोगों ने&quot; अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया है।<br />

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