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स्त्री शक्ति: सृजनशील ताकत का साकार रूप

&raquo;&nbsp; भारत के इतिहास में कुछ महान महिलाओं की वीरोचित एवं अद्वितीय विरासत का स्मरण करते हुए, जो लगातार हमारी दृष्टि और देश में महिलाओं के अधिकारिता के प्रयासों को प्रेरित करती हैं।<br/><br /> &raquo;&nbsp;संस्कृत में &#39;शक्ति&#39; एक संकल्पना एवं स्त्रियोचित सृजनशील ताकत का साकार रूप है। &#39;स्त्री शक्ति&#39; महिलाओं की उस ताकत का परिचायक है जिसके बल पर वे अपने जीवन को नियंत्रित करती हैं और खुद को सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक लेहाज से नियमित करती हैं। इसका अर्थ यह है कि उनके पास समाज के बाहरी सतह से इसकी मुख्य धारा में चले जाने और इसके केंद्र बिंदु से प्रभाव को प्रबंधित करने की शक्ति है।<br/><br /> &raquo;&nbsp;महिलाओं की अधिकारिता एवं उनकी समानता, स्वतंत्रता तथा गरिमा कोई दूर का लक्ष्य नहीं है। यह उनके पवित्र अधिकारों में से एक है। यह कोई विशेषाधिकार नहीं है जिसकी वे मांग कर रही हैं। यह हमारे आचार संहिता का प्रमुख तत्व रहा है जिसे हमारी प्राचीन सभ्यताओं ने तीन हजार से भी अधिक वर्षों से भी अधिक समय से उनके लिए अनुशंसित कर रखी हैं।<br/><br /> &raquo;&nbsp;जब स्वतंत्र भारत के संस्थापकों ने हमारे संविधान की रूपरेखा तैयार की तो उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि इसके सिद्धांत एवं प्रावधान महिलाओं के अधिकारों एवं समानता पर उचित रूप से बल दें।<br/><br /> &raquo;&nbsp;ऐसी कई सामाजिक धारणाएं और बर्ताव हैं जो समाज और अर्थव्यवस्था में भारतीय महिलाओं की स्थिति और दशा में बेहतरी लाने की गति को बाधित करते रहे हैं। इसके लिए तत्काल व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से अंत:निरीक्षण करने की जरूरत है। हमें निश्चित रूप से इन कमजोरियों और उनके मूल कारणों की पहचान करनी चाहिए।<br/><br /> &raquo;&nbsp;हमें अनिवार्य रूप से उन संरचनात्मक एवं संस्थागत बाधाओं को दूर करने के लिए आवश्यक प्रयास करने चाहिए जो भारत में महिलाओं के आर्थिक एवं सामाजिक बदलाव और उनकी बेहतरी को रोकते हैं।<br/><br /> &raquo;&nbsp;उदाहरण के लिए, महिलाओं के खिलाफ हिंसा लगातार देश भर में महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा, कल्याण और क्षमता को आघात पहुंचाती रही है। यहां तक कि उनकी संबंधित दुर्बलताओं को लेकर उनकी पूर्वधारणा भी उनकी आवाजाही की स्वतंत्रता और शिक्षा, कार्य तथा अनिवार्य सेवाओं की सुविधाओं को बाधित करती रही है।<br /> &raquo;&nbsp; सच्ची अधिकारिता के लिए एक महिला के जीवन को प्रभावित करने वाले सभी पहलुओं के एक कारगर समन्वय-चाहे यह सामाजिक हो, आर्थिक या राजनीतिक हो-की जरुरत है।<br/><br/> &raquo;&nbsp;भारत में लैंगिक समानता एवं महिलाओं की अधिकारिता सुनिश्चित करने की अपनी प्रतिबद्धता का फिर से संकल्प करना आवश्यक है जिससे कि उन्हें उनकी पूर्ण क्षमता का उपयोग करने और देश के विकास के सभी पहलुओं में सार्थक रूप से भागीदार बनाने में उन्हें सक्षम बनाया जा सके।<br />

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