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निचले पायदान पर उच्च शिक्षा: उच्च शिक्षा की समस्याएं और सुधार के लिए कदम

लंदन से निकलने वाली पत्रिका &#39;टाइम्स हायर एजुकेशन&#39; उच्चतर शिक्षा के लिए विश्व की सर्वाधिक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में से है। यह पत्रिका दुनिया भर के विश्वविद्यालयों की रैंकिंग भी करती है और इसने 2014-15 के लिए अपनी रैंकिंग जारी कर दी है। हमेशा की तरह शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों में अमेरिकी विश्वविद्यालयों का दबदबा बना हुआ है। इसके बाद इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस और यूरोप के देशों का वर्चस्व है।<br /><br/> एशियाई देशों में जापान, चीन, हांगकांग, ताइवान, सिंगापुर और दक्षिण कोरिया आदि शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों में जगह बनाने में कामयाब हुए हैं। विकासशील मुल्कों में ब्राजील, मैक्सिको भी टॉप 100 में मौजूद हैं।<br /><br/> भारत का दुर्भाग्य है कि सारी प्रतिभा और परिश्रमी प्रवृति के बावजूद दुनिया के शैक्षणिक मानचित्र पर कहीं नहीं हैं। हालांकि &#39;टाइम्स हायर एजुकेशन&#39; की सर्वे पद्धति पर भारतीय विद्वानों ने सवाल भी खड़े किए हैं कि यह सर्वे भारतीय परिस्थितियों को अपने अध्ययन में समाहित नहीं करता। बात कहां तक सच है? क्या भारतीय विश्वविद्यालय संसार के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की कतार में खड़े हो सकते हैं? यदि नहीं तो क्यों? और क्या कोई समाधान भी है?<br /><br/> टाइम्स हायर एजुकेशन&#39; की सर्वे पद्धति में दुनिया भर के 10 हजार से ज्यादा प्रतिष्ठित प्रोफेसरों से 13 मानकों पर विश्वविद्यालयों की रैंकिंग करने को कहा गया। इन 13 मानकों को निम्नलिखित पांच वगरें में बांटा गया। शिक्षण, शोध, साइटेशन , उद्योगों से संबंध और अंतरराष्ट्रीय संभावना। इन मानकों में शिक्षण का माहौल, शिक्षण की उत्कृष्टता, शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात, शोध की गुणवत्ता, रिसर्च का आगामी ज्ञान-विज्ञान पर प्रभाव, शोध-ज्ञान का उद्योग-अर्थव्यवस्था के लिए व्यावहारिक उपयोग, अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों और शिक्षकों की उपस्थिति आदि शामिल हैं।<br /><br/> इसमें कोई शक नहीं कि किसी विश्वविद्यालय को श्रेष्ठ होने के लिए निश्चित रूप से उपरोक्त मानकों की कसौटी पर खरा उतरना ही होगा। कहा जा रहा है कि सर्वे भारतीय परिस्थितियों से जुड़े मानकों की अनदेखी करता है, जैसे कि शिक्षा में कमजोर वगरें का आरक्षण या कम आर्थिक संसाधनों के बावजूद विभिन्न विद्यार्थियों-शिक्षकों द्वारा उत्कृष्ट उपलब्धियां प्राप्त करना इत्यादि। नि:संदेह विश्वविद्यालयों की रैंकिंग करते समय उपरोक्त मानकों को भी शामिल किया जाना चाहिए।<br /><br/> भारत सरकार ने भारतीय परिवेश को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालयों की रैंकिंग करने के लिए एक कमेटी भी गठित कर रखी है, लेकिन इन सबके बावजूद यह स्वीकारने में हमें कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि विश्व के शीर्ष विश्वविद्यालयों से शिक्षण, शोध, गुणवत्ता आदि में हम सचमुच काफी पीछे हैं।<br /><br/> किसी समय विश्व में अपनी बौद्धिकता का परचम लहराने वाला नालंदा और तक्षशिला वाला हमारा भारत क्या उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र में निचली पायदान पर रहने के लिए अभिशप्त है?<br /><br/> भारत को जिन ऊंचाइयों पर ले जाना चाहते हैं उसके लिए भारत को श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की जरूरत है। ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था बनाने, देश में श्रेष्ठ प्रतिभा को बनाए रखने और प्रतिभा पलायन रोकने, निवेश को आकर्षित करने, भविष्य के लिए उच्च कुशल नेतृत्व को विकसित करने, नए ज्ञान और नवाचार विकसित करने, विदेशों में भारतीय शिक्षकों की सेवा देने जैसे उनके स्वप्नों को साकार करने के लिए उच्च शिक्षा के मंदिरों को परिपूर्ण बनाना होगा। इसके अतिरिक्त व्यवस्थापरक और ढांचागत अन्य समस्याएं भी हैं जिसको दुरुस्त करने की आवश्यकता है।<br /><br/> स्वाधीनता के कुछ समय बाद से ही सरकार और राजनेताओं ने जाने-अनजाने शिक्षा के समुचित और सवरंगीण विकास में सही भूमिका नहीं निभाई। कॉलेज, यूनिवर्सिटी से लेकर विभिन्न शिक्षा संस्थानों में राजनीतिक हस्तक्षेप कोई छिपी बात नहीं है। इसका एक बहुत अच्छा उदाहरण पश्चिम बंगाल का है। बंगाल के शैक्षणिक संस्थान वामपंथी राजनीति के दबाव के तले खत्म से हो गए। राजनीति दबाव का एक महत्वपूर्ण पहलू नियुक्तियों से जुड़ा हुआ है। कुछ मामलों और संस्थानों को छोड़ दिया जाए तो यह कोई छिपी बात नहीं कि शिक्षकों, प्राचायरें, निदेशकों, कुलपतियों आदि की नियुक्तियों में सत्तापक्ष के राजनेता आए दिन हस्तक्षेप करते रहते हैं।<br /><br/> निदेशकों, कुलपतियों आदि की नियुक्ति के लिए एक अखिल भारतीय पैनल बने, जिसमें देश के श्रेष्ठ प्रोफेसरों के नाम शामिल हों। इसके अतिरिक्त शिक्षा में नौकरशाही का हस्तक्षेप भी काफी है, जो एक ओर उच्च शिक्षा के लचीलेपन को खत्म करता है तो दूसरी ओर शैक्षणिक नीति-निर्माण में कई तरह की दिक्कतें पैदा करता है। इसका एक समाधान यह हो सकता है कि मानव संसाधन मंत्रालय में अनिवार्य रूप से सचिव या अपर सचिव स्तर के एक-दो पदों पर पांच-पांच सालों के लिए प्रोफेसरों की नियुक्ति की जाए।<br /><br/> भारतीय उच्च शिक्षा की एक अन्य बड़ी समस्या आर्थिक संसाधनों का अभाव भी है। इसके लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी सरकार की है। कोठारी आयोग की रिपोर्ट से लेकर बाद की लगभग सभी शिक्षा समितियों- आयोगों की रिपोर्ट में सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत शिक्षा पर व्यय करने की सिफारिश की गई है, लेकिन अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि शिक्षा खास तौर से उच्च शिक्षा पर किसी सरकार का ज्यादा ध्यान नहीं रहा है।<br /><br/> दुनिया के अधिकांश विकसित मुल्कों में सरकारें शिक्षा को लेकर खासी सजग हैं। इसके अतिरिक्त निजी क्षेत्रों को भी इस क्षेत्र में अपनी भागीदारी बढ़ानी पड़ेगी, हालांकि इसके लिए सरकार को अपने नियम दुरुस्त करने होंगे, क्योंकि अमेरिका या यूरोपीय अनुभवों के उलट भारत में निजी क्षेत्र मुनाफे के चक्कर में गुणवत्ता से हमेशा समझौता करते हुए नजर आता है।<br /><br/> इन सबके अतिरिक्त शिक्षा से संबंधित आधारभूत संरचनाओं का विकास, पर्याप्त संख्या में शिक्षकों की नियुक्ति एवं गुणवत्तापूर्ण नियुक्ति को सुनिश्चित किया जाना, शिक्षा के लिए अनुकूल माहौल के निर्माण केसाथ-साथ शिक्षकों की अपनी जिम्मेदारी तय करना कुछ ऐसे कदम हो सकते हैं जिस पर चलकर हमारे विश्वविद्यालय भी दुनिया के शीर्ष विश्वविद्यालयों में शुमार हो सकते हैं।<br /><br/>

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