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दहेज की खातिर उत्पीड़न से संरक्षण की धारा 498-ए का दुरुपयोग रोकने के लिए संशोधन

दहेज की खातिर ससुराल में स्त्री के उत्पीड़न से संबंधित कानूनी प्रावधान के बढ़ते दुरुपयोग चिंता की बात है। इसकी वजह से टूट रही वैवाहिक संस्था को बचाने के प्रयास में सरकार भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए में संशोधन की तैयारी कर रही है।<br /><br/> ससुराल में स्त्री को दहेज की खातिर उत्पीड़न से संरक्षण प्रदान करने के लिये 1983 में भारतीय दंड संहिता में धारा 498-ए शामिल की गयी थी। इस धारा में स्त्री के पति या पति के रिश्तेदारों द्वारा उसके प्रति क्रूरता को परिभाषित करते हुए दंड का प्रावधान किया गया था। इस धारा के तहत दर्ज मामला अभी संज्ञेय और गैर जमानती है। लेकिन देखा गया है कि इस धारा के तहत पति और सास-ससुर के साथ ही ससुराल पक्ष के अन्य सदस्यों के खिलाफ भी दर्ज होने वाले मामलोंं की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी होने लगी।<br /><br/> इस कानून के बढ़ते दुरुपयोग से चिंतित उच्चतम न्यायालय ने कई मामलों में धारा 498-ए में सुधार की हिमायत की ताकि वैवाहिक संस्था को टूटने से बचाया जा सके। न्यायालय ने एक फैसले में यहां तक कहा कि अपराध रिकार्ड के आंकड़ों के तहत 2012 में धारा 498-क के तहत दर्ज आरोप में 1,97,762 व्यक्ति गिरफ्तार किये गये। इनमें लगभग एक-चौथाई महिलायें थीं, जिनमें शिकायतकर्ता के पति की मां तथा बहन भी शामिल थीं। धारा 498-ए के दुरुपयोग को लेकर निरंतर उठ रही आवाज, इसकी वजह से टूटती वैवाहिक संस्था को लेकर सरकार को मिल रहे प्रतिवेदनों और उच्च न्यायालयों तथा उच्चतम न्यायालय की तमाम टिप्पणियों के बाद गृह मंत्रालय ने सितंबर 2009 में यह मसला विधि आयोग के पास भेजा था।<br /><br/> विधि आयोग ने धारा 498-ए से जुड़े तमाम मसलों पर विचार के बाद अगस्त 2012 में इससे जुड़े विभिन्न पहलुओं पर सरकार को अपनी 243वीं रिपोर्ट सौंपी थी। न्यायमूर्ति मलिमथ समिति ने भी धारा 498-ए को लेकर उठ रही आवाजों पर विचार किया था। विधि आयोग के अलावा दंड न्याय व्यवस्था में सुधार के लिये गठित मलिमथ समिति ने धारा 498-ए के तहत दंडनीय अपराध को अदालत की अनुमति से समझौते के दायरे में लाने और जमानती अपराध बनाने का सुझाव दिया था।<br /><br/> गृह मंत्रालय ने प्रस्तावित संशोधन का मसौदा विधि मंत्रालय के पास भेजा है ताकि इस संबंध में उचित विधेयक तैयार किया जा सके। इस मसौदे में धारा 498-ए का दुरुपयोग होने की स्थिति में लगाये जाने वाले जुर्माने की राशि एक हजार रुपए से बढ़ाकर 15000 रुपए करने का प्रस्ताव है।<br /><br/> उच्चतम न्यायालय ने कई फैसलों में कानून के इस प्रावधान के दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त की है I देश की शीर्ष अदालत ने भी कहा था कि महज प्राथमिकी में नाम होने के आधार पर रिश्तेदारों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। न्यायालय ने यह भी कहा था कि थाने में दर्ज करायी गयी रिपोर्ट में ससुराल के तमाम आरोपित सदस्यों की भूमिका के बारे में स्पष्ट आरोप जरूरी हैं और यदि ऐसा नहीं है तो ससुराल के तमाम सदस्यों को थाने या अदालत में घसीटना और उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही करना उचित नहीं है।<br /><br/> न्यायालय की इस तरह की चिंताओं के मद्देनजर ही गृह मंत्रालय ने वैवाहिक विवादों के मामले में धारा 498-ए के तहत मामला दर्ज करने में संयम बरतने की सलाह राज्य सरकारों को दी थी ताकि इस प्रावधान का इस्तेमाल हथियार के रूप में नहीं किया जा सके।<br /><br/> वैसे कई मामलों में यह भी देखा गया है कि ससुराल में होने वाली नोक-झोंक, टीका-टिप्पणियों और नये माहौल में तालमेल कायम करने में आ रही दिक्कतों से परेशान नवविवाहिता या उसके परिवार की ओर से थाने में इस तरह की शिकायत दर्ज करायी जाती है, जिससे पति और ससुराल के दूसरे सभी सदस्य उसकी चपेट में आ जायें। कई बार तो यह भी होता है कि इन शिकायतों में दूरदराज के उन रिश्तेदारों के नाम भी शामिल कर लिये जाते हैं जो ससुराल और उस शहर में ही नहीं रहते। आरोपों की वजह से पति, उसके भाई-बहन, माता-पिता तथा दूसरे नजदीकी रिश्तेदारों की गिरफ्तारी तक हो जाती है और फिर जमानत के लिये उन्हें काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है। ऐसे में वर और वधू पक्ष के बीच समझौते की कोई गुंजाइश नहीं रह पाती और ऐसी परिस्थितियों में वैवाहिक संस्था को बचाना लगभग असंभव हो जाता है। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद ससुराल पक्ष के सदस्य अदालत से बरी हो जाते हैं लेकिन इस कटु अनुभव के जख्म आसानी से नहीं भरते।<br /><br/> उम्मीद की जानी चाहिए कि निकट भविष्य में धारा 498-ए का दुरुपयोग रोकने के लिये इसमें संशोधन के प्रयासों को सफलता मिलेगी। साथ ही ससुराल पक्ष के खिलाफ दहेज उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराने के मामलों में कमी आयेगी।<br />

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