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खाड़ी क्षेत्र के घटनाक्रम का भारत पर प्रभाव

&bull;&nbsp;फारस की खाड़ी से लेकर भूमध्य सागरीय तट तक फैले मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में नए गठबंधन और गुट बन रहे हैं। उनसे जो नई चुनौतियां उभरने लगी हैं, उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस इलाके में साठ लाख प्रवासी भारतीय रहते हैं। वे हर साल लगभग 40 खरब अमेरिकी डॉलर भारत में कमाकर भेजते हैं।<br /><br/> &bull;&nbsp;यहीं से हमारी ऊर्जा जरूरतों के लिए तेल और प्राकृतिक गैस की 75 फीसदी से ज्यादा आपूर्ति होती है।<br /><br/> &bull;&nbsp;इन घटनाओं में पहला है आईएसआईएस का उद्भव, दूसरा है फारस-अरब क्षेत्र के बीच पनपता तनाव एवं शिया-सुन्नी वर्गों के बीच संघर्ष और तीसरा है ईरान परमाणु कार्यक्रम पर बने गतिरोध का हल जल्द निकलने की संभावना। यह सब उस वक्त पर घटित हो रहे हैं जब तेल और गैस की कीमतों में वैश्विक स्तर पर गिरावट चल रही है।<br /><br/> &bull;&nbsp;पाक से तुर्की तक फैले वृहद् मध्य पूर्व क्षेत्र की राजनीति इसलिए भी अस्थिर हो गई है क्योंकि अव्वल तो अमेरिका ने सीरिया, इराक और लीबिया की अपेक्षाकृत धर्म निरपेक्ष लेकिन तानाशाही सरकारों को गिराने के मनोरथ से विद्रोह को भड़काने के अलावा सैन्य कार्रवाई भी की, दूसरे उसके पास इनकी जगह पर किसी कारगर वैकल्िपक व्यवस्था स्थापित करने का कोई इंतजाम नहीं था। सीरिया में तो अमेरिका की शह पर चल रहे विद्रोही आंदोलन की वजह से लाखों लोगों को अपना घरबार छोड़कर भागना पड़ा है और वहां पर विपरीत विचारधारा वाले अनेक गुट उठ खड़े हुए हैं।<br /><br/> &bull;&nbsp;अमेरिका द्वारा इराक पर हमला किए जाने के बाद पैदा हुए हालातों ने शिया-सुन्नी के बीच रक्तरंजित लड़ाइयों को जन्म दिया है, जो अब इस पूरे इलाके में फैल गई हैं। लीबिया में भी इसी तरह की अमेरिकी दखलअंदाजी के बाद वहां के लोगों में विभिन्न गुट बन गए हैं और यह क्षेत्र शिया-सुन्नी संघर्ष का एक और नया केंद्र बनकर उभरा है। सीरिया में अमेरिकी टांग अड़ाने का नतीजा और भी भयंकर हुआ है क्योंकि सीरिया-इराक के सम्मिलित इलाकों पर एक नए देश का निर्माण हो गया है, जिसे इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड लेवांत यानी आईएसआईएस के नाम से जाना जा रहा है। आईएसआईएस ने लीबिया में भी अपनी अच्छी-खासी पैठ बना ली है।<br /><br/> &bull;&nbsp; संसार ने अपने इतिहास में शायद ही कभी इतना कट्टर, नवजागरणवादी और निर्दयी समूह देखा होगा, जितना कि आईएसआईएस है। जिसमें न सिर्फ अरब और इस्लामिक देशों बल्कि यूरोप से भी हजारों की संख्या मेें स्वयंसेवक खिंचे चले आ रहे हैं। इसके आचरण में गैर-मुस्लिमों और शियाओं को कत्ल करना शामिल है। इसने बलपूर्वक गैर-मुस्लिमों की औरतों को छीन कर उन्हें गुलाम बना लिया है। यह गैर-मुस्लिमों से जजिया नामक कर वसूलता है। आईएसआईएस और तालिबान दोनों ही पुरातत्व महत्व के प्राचीन पूजा स्थलों, कलाकृतियों, मूर्तियों और कलात्मकता को मिटाने में यकीन रखते हैं।<br /><br/> &bull;&nbsp;वृहद् मध्य-पूर्व में तेजी से बढ़ रहे तनाव के चलते जहां सऊदी अरब और मिस्र के नेतृत्व में सुन्नी-अरब गठबंधन को जन्म दिया है और वहीं इसका मुकाबला करने के लिए ईरान की सरपरस्ती में शिया गुट भी एकजुट होने लगे हैं, जिसमें इराक और सीरिया के शिया भी शामिल हैं।<br /><br/> &bull;&nbsp;ईरान में एक अनोखी परिस्थिति देखने को मिल रही है,जहां इसके और अमेरिका के हित एक जैसे बन रहे हैं क्योंकि दोनों ही इराकी सेना की सहायता इसलिए कर रहेे हैं ताकि वह सुन्नी बहुल इलाकों जैसे कि मोसूल, तिकरित और अनबर घाटी में काबिज हुई आईएसआईएस को खदेड़ सके। एक तरफ अमेरिका वहां पर हवाई हमलों की मार्फत मदद मुहैया करवा रहा है तो दूसरी ओर जमीन पर ईरान की क्रांतिकारी सेना इराक के शिया लड़ाकों को हथियार, प्रशिक्षण, उपकरणों की सप्लाई के अलावा उनके साथ मिलकर हमले भी कर रही है।<br /><br/> &bull;&nbsp;दूसरी तरफ विरोधी रहे देशों के नेताओं यानी कि सुन्नी मुल्क सऊदी अरब एवं मिस्र और यहूदी देश इस्राइल के नेताओं की सोच एक जैसी देखने को मिल रही है। इस्राइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने उस संधि की भर्त्सना की है, जिसमें कहा गया है कि यह एक तरह से ईरान को राजी करने की गर्ज से की जा रही है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि संधि का मंतव्य ईरान पर लगे प्रतिबंधों को किसी तरह हटाना है। दीगर सुन्नी देशों ने भी इस प्रस्तावित संधि को रोकने की खातिर अमेरिका पर दबाव बनाने के लिए राजनयिक प्रयास तेज कर दिए हैं।<br /><br/> जाहिर है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम के नतीजे में बनने वाले शिया बम की संभावना से सावधान हुए सऊदी अरब और खाड़ी के अन्य सहयोगी अरब मुल्कों ने अमेरिका के विदेश मंत्री जॉन कैरी से 4 मार्च को मुलाकात की है और अमेरिका के नेतृत्व में प्रस्तावित ईरान परमाणु संधि के खिलाफ आवाज उठाई है।<br /> &bull;&nbsp;ठीक इसी वक्त सऊदी अरब को न सिर्फ यह डर सता रहा है कि अमेरिका-ईरान के बीच फिर से बनने वाली दोस्ती कहीं उसके लिए खतरा न बन जाए बल्कि इसके अलावा उसे अपनी और अरब देशों की सीमाओं पर मजबूत होते आईएसआईएस की मौजूदगी का भय भी सता रहा है।<br /><br/> यही कारण है कि इन घटनाक्रमों के आलोक में जब 3 मार्च को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ सऊदी अरब की राजधानी रियाद पंहुचे तो हवाई अड्डे पर उनकी अगवानी के लिए खुद सुल्तान सलमान बिन अब्दुल अजीज, गद्दी के अगले वारिस राजकुमार मुकरी और पूरा सऊदी मंत्रिमंडल मौजूद था। यह किसी राष्ट्राध्यक्ष को दिया गया बहुत दुर्लभ सम्मान है, खासकर उस देश को जो दिवालिया हो और लंबे समय से अमेरिका और सऊदी अरब की खैरात पर पल रहा हो।<br /> &bull;&nbsp;पाक-सऊदी परमाणु सहयोग 1990 के दशक में तब से चला आ रहा है जब डॉ. अब्दुल कादिर खान ने सऊदी अरब की यात्रा की थी, उनकी यह यात्रा सऊदी अरब के तत्कालीन रक्षा मंत्री और राजकुमार सलमान द्वारा पाकिस्तान के कठुआ स्थित परमाणु अस्त्र और मिसाइल निर्माण कारखाने की यात्रा किए जाने के बाद सपन्न हुई थी। यह जानना भी रोचक होगा कि नवाज शरीफ की सऊदी अरब यात्रा के ठीक बाद ही पाकिस्तान ने लंबी दूरी तक मार करने वाली और परमाणु अस्त्र ले जाने में सक्षम मिसाइल शाहीन-3 का परीक्षण किया है। 2750 कि.मी. तक मार करने वाली यह मिसाइल न सिर्फ भारत बल्कि उससे भी परे तक जा सकती है। यह मिसाइल सऊदी अरब के लिए एक वरदान सिद्ध हो सकती है क्योंकि इसके बूते पर वह ईरान तक हमला करने में सक्षम हो सकेगा।<br /><br/> &bull;&nbsp;यदि पाकिस्तान सऊदी अरब की सीमाओं की रखवाली के लिए या फिर इस रेतीले देश की राजशाही को ईरान से बचाने के लिए एक सुन्नी परमाणु रोधी कवच&Oacute; मुहैया करवाने में मान जाता है तो मध्य-पूर्व में पहले से ही जटिल बनी स्थितियां इससे और भी ज्यादा तनावग्रस्त हो जाएंगी।<br /><br/> &bull;&nbsp; भारत, अफगानिस्तान और ईरान से लगने वाली अपनी सीमाओं पर बने तनाव से जूझ रहा पाकिस्तान किस तरह सऊदी अरब की उस इल्तिजा को मानता है, जिसमें रवायती और परमाणु सैन्य सहायता की बात कही गई है।<br /><br/> हाल ही में भारत ने हिंद महासागर क्षेत्र में स्थित अपने पड़ोसी टापू देशों के साथ मिलकर एक व्यावहारिक सुरक्षा तंत्र बनाने के प्रयास किए हैं। अब जरूरत इस बात को सावधानीपूर्वक समझने की है कि इस्लामिक देशों में होने वाली हालिया घटनाओं का भारत की सुरक्षा और खाड़ी के अरब देशों में बसे प्रवासी भारतीयों के कल्याण पर क्या असर होगा।

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