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इस्राइल से भारतीय समबन्धों का भविष्य

&bull;&nbsp; जनवरी 1992 को भारत-इस्राइल के बीच पूर्ण कूटनीतिक संबंध स्थापित हुए।<br /><br/> &bull;&nbsp;प्रधानमंत्री मोदी जल्द इस्राइल जाएंगे। 2006 में जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब तेल अवीव में आहूत एग्रीटेक सम्मेलन में गये थेI मोदी सरकार के लिए कितना महत्वपूर्ण है, यह इससे स्पष्ट हो जाता है कि गृहमंत्री बनने के बाद राजनाथ सिंह ने अपनी पहली विदेश यात्रा तेल अवीव से शुरू की थी। यह संयोग नहीं था कि राजनाथ सिंह तेल अवीव में थे, और 6 नवंबर 2014 को इस्राइल के पूर्व राष्ट्रपति शिमोन पेरेज़ नई दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी से मिल रहे थे। इससे पहले जून 2000 में लाल कृष्ण आडवाणी जब गृहमंत्री थे, तब उन्होंने तेल अवीव की यात्रा की थी। सरकार के जो बड़े मंत्री अब तक इस्राइल जा चुके हैं, उनमें अरुण जेटली भी हैं, जो इंडो-इस्राइल ज्वाइंट ट्रेड कमेटी की बैठक को 2004 में संबोधित कर चुके<br /><br/> &bull;&nbsp;29 जनवरी 1992 को भारत-इस्राइल के बीच पूर्ण कूटनीतिक संबंध स्थापित हुए। उससे पहले 1953 से मुंबई में इस्राइल का कौंसिलावास काम कर रहा था। कोलकाता में इसके साथ-साथ आनरेरी कौंसुलेट की स्थापना की गई थी। 2003 में इस्राइल के तत्कालीन प्रधानमंत्री अरियल शेरोन की भारत यात्रा के बाद दिल से दोस्ती का दौर शुरू हुआ। तब अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे।<br /><br/> &bull;&nbsp;बेंजामिन नेतन्याहू चौथी बार इस्राइल के प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। नेतन्याहू को इस्राइल की अल्ट्रा राष्ट्रवादी विचारधारा का जनादेश मिला है, जो न तो फिलिस्तीनी अल्पसंख्यकों को इस्राइल में आशियाना या आबोदाना देने की पक्षधर है, न ही अधिकृत इलाकों में रहने वाले फिलिस्तीनियों को समान अधिकार देना स्वीकार करती है। इस समय प्रधानमंत्री नेतन्याहू, प्रतिरक्षा के क्षेत्र में मोदी के मेक इन इंडिया कार्यक्रम के सबसे बड़े हिमायती हैं।<br /><br/> &bull;&nbsp;येरुशलम सेंटर फॉर पब्लिक अफेयर्स और नई दिल्ली स्थित विवेकानंद फाउंडेशन ने मिलकर उन रणनीतियों को बनाना शुरू किया है, जिसमें यह तय होगा कि भारत और इस्राइल, पश्चिम एशिया, पाकिस्तान और ईरान में किस तरह से कूटनीति कर सकते हैं। विवेकानंद फाउंडेशन, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के कारण और भी महत्वपूर्ण हो गयी है।<br /><br/> &bull;&nbsp;नेतन्याहू ने दो जगहों पर मोर्चा खोल रखा है। एक मोर्चा ईरान का नागरिक परमाणु कार्यक्रम है, तो दूसरा फिलिस्तीन। तेल कूटनीति और पश्चिमी एशिया तक व्यापारिक मार्ग के कारण भारत, ईरान के विरुद्ध ऐसी रणनीति नहीं बना सकता, जो तेहरान को बुरी लगे। ईरान एकमात्र तेल सप्लायर देश रहा है, जिसे हम डॉलर के बजाय रुपये में कच्चे तेल का भुगतान करते रहे हैं।<br /><br/> &bull;&nbsp;ओबामा को नेतन्याहू से खुन्नस दो बातों को लेकर है। एक, वह ईरान के मामले में व्हाइट हाउस की सलाह नहीं सुन रहे हैं। दूसरा, ओबामा को बाईपास करते हुए अमेरिकी संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा के सभापति जॉन बोयनर का उन्होंने इस्तेमाल किया था। अमेरिकी संसद में ईरान के विरुद्ध प्रस्ताव, ओबामा की प्रतिद्वंद्वी रिपब्लिकन पार्टी ने रखा था। नेतन्याहू ने ईरान के विरुद्ध प्रस्ताव को वाशिंगटन स्थित अमेरिकन इस्राइल पब्लिक अफेयर्स कमेटी (एआईपीएसी) में भी भुनाया था।<br /><br/> &bull;&nbsp;एआईपीएसी यहूदियों की एक ताकतवर लॉबी है, जो अमेरिका से इस्राइल तक हथियार, परमाणु उद्योग और सत्ता के गलियारों को प्रभावित करती है। संभव है यहूदियों की यह लॉबी अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेट को नुकसान पहुंचाये। नेतन्याहू ने यूक्रेन में पुतिन के रोल की जिस तरह प्रशंसा की थी, उससे नये भू-सामरिक समीकरण बनने के संकेत मिल रहे हैं।<br /><br/> &bull;&nbsp; यह प्रधानमंत्री मोदी की रणनीतिक कुशलता पर निर्भर करेगा कि वह ओबामा-नेतन्याहू की अदावत से बचते हुुए देशहित में इस्राइल से किस तरह से फायदा लें। प्रतिरक्षा के क्षेत्र में इस्राइल की सहभागिता और तकनीकी सहयोग हमारे लिये आवश्यक है। अमेरिकी राष्ट्रपति की इच्छा के विरुद्ध हमने ईरान से तेल लिया था। अब ईरान अमेरिका का दोस्त है। इसलिए हमारी दोस्ती या दुश्मनी किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की इच्छा के अनुरूप नहीं होनी चाहिए। हमारा राष्ट्रहित सर्वोपरि है!<br /><br/>

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