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भारत और चीन में आर्थिक विकास का तुलनात्मक अध्ययन

&bull;&nbsp;पिछले कुछ समय से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष सहित कई अन्य संस्थायें यह भविष्यवाणी कर रही थीं कि भारत की ग्रोथ दर चीन से अधिक हो जाएगी। यदि जीडीपी के मापन की नई विधि को मानें तो भारत ग्रोथ दर की दृष्टि से चीन से आगे निकल ही गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत वास्तव में चीन से आगे निकल सकता है?<br /><br/> &bull;&nbsp;हो सकता है कि भारत की जीडीपी की बढ़ने की दर चीन से ज्यादा हो जाए, लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था चीन की अर्थव्यवस्था से काफी कमतर है। गौरतलब है कि जहां क्रय शक्ति समता के आधार पर चीन की प्रति व्यक्ति आय 2012 में 9210 डालर थी, वहीं भारत की प्रति व्यक्ति आय क्रय शक्ति समता के आधार पर उससे कहीं कम मात्र 3840 डालर ही थी।<br /><br/> &bull;&nbsp;उसी आधार पर चीन की जीडीपी 12435 अरब डालर थी, जबकि भारत की जीडीपी मात्र 4749 अरब डालर ही थी। इसलिए यदि वर्तमान स्थिति जारी रहती है, यानी चीन की ग्रोथ दर भारत की ग्रोथ दर के आसपास या थोड़ी-बहुत कम भी हो तो भी जीडीपी की दृष्टि से भारत निकट भविष्य में चीन की अर्थव्यवस्था की बराबरी नहीं कर पाएगा।<br /><br/> &bull;&nbsp;चीन के कम्युनिस्ट शासक वहां उत्पादन बढ़ाने में तो कामयाब हुए हैं, लेकिन उस उत्पादन का पूरा लाभ चीन की जनता को शायद नसीब नहीं है। पिछले तीन दशकों में जीडीपी की ग्रोथ आमजन के चेहरे पर मुस्कान लाने में शायद सफल नहीं रही। प्रति परिवार एक बच्चे की नीति को लागू किया गया। वस्तुओं को किसी न किसी तरीके से सस्ता रखने के लिए मजदूरी की दर को कम से कम रखने की जिद ने आम चीनी जनता के लिए मुसीबतें खड़ी की हैं। जीडीपी बढ़ाने के लिए पूंजीपतियों को भी बढ़ावा दिया गया और उन्हें शासन की निर्णय प्रक्रिया में भी शामिल किया जाता है।<br /><br/> &bull;&nbsp;जहां चीन में एक भी अरबपति नहीं होता था, 2013 में चीन में 197 अरबपति थे। संभव है कि भारत में जीडीपी और प्रति व्यक्ति आय, चीन की जीडीपी और प्रति व्यक्ति आय से कहीं कम है, फिर भी भारत में ग्रोथ की संभावनाएं चीन से बेहतर हैं। पिछले कुछ समय से जीडीपी बढ़ाने की जिद के कारण चीन में मैन्यूफैक्चरिंग और इन्फ्रास्ट्रक्चर में तेजी से विकास किया गया है। ऐसी सड़कें बनाई गईं, जिनका कोई गंतव्य ही नहीं था। मैन्यूफैक्चरिंग की ग्रोथ की जिद ऐसी कि दुनिया के बाजार कब्जाने के लिए भारी सब्सिडी सरकार के द्वारा दी जाती रही। आज स्थिति यह है कि चीन की केन्द्रीय सरकार और प्रांतीय सरकारें भारी घाटे में होने के कारण अब और सब्सिडी देने में सक्षम नहीं, जिसके चलते अब चीनी माल दुनिया के बाजारों में उतना सस्ता नहीं रहा, जितना वह पहले था। दूसरे मुल्कों के साजोसमान से प्रतिस्पर्धा भी खासी है। चीन के निर्यात बढ़ने की गति तो थमी है, या कहीं-कहीं निर्यातों में कमी भी आ रही है।<br /><br/> &bull;&nbsp;इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में पहले से ही इतना इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार हो गया कि आगे की संभावनाएं ही समाप्त हो गईं। गौरतलब है कि चीन में निवेश थमने के कारण अब वह निवेश के लिए दूसरे मुल्कों की ओर रुख कर रहा है, जहां निवेश की संभावनायें ज्यादा हों। एक ओर तो सरकार के पास संसाधनों की कमी और दूसरी ओर निवेश का सही वातावरण न होने के कारण, भारत में पर्याप्त निवेश हो नहीं पा रहा था। लेकिन भारत में बिजली उत्पादन हो या मैन्यूफैक्चरिंग, या रेल और सड़क निर्माण अथवा एयरपोर्ट या समुद्री पोत, अभी खासी संभावनायें मौजूद हैं।<br /><br/> &bull;&nbsp;चीन अधिकतर उत्पादन निर्यात के लिए ही करता रहा है। यूरोप और अमेरिका में आर्थिक संकटों और मंदी के चलते चीन के निर्यातों में ठहराव आ गया है। 2012 में चीन के निर्यात कुल जीडीपी के 47 प्रतिशत थे, जबकि भारत के निर्यात, भारत की जीडीपी के मात्र 18 प्रतिशत ही थे। निर्यातों में ठहराव, चीन की अर्थव्यवस्था के ठहराव का सबब बन गया।<br /><br/> &bull;&nbsp;भारत में ग्रोथ को गति देने की दृष्टि से नई सरकार &lsquo;मेक इन इंडिया&rsquo; की नीति को अपना रही है। प्रधानमंत्री का कहना है कि इसके लिए देश में ही उद्यम को बढ़ावा देने के साथ-साथ विदेशियों को भी न्योता है कि वे भी भारत आकर उत्पादन करें। इसके अलावा सरकार का यह कहना कि अब हमारा देश इन वस्तुओं का निर्यात भी कर सकता है। निर्यात के लिए मेक इन इंडिया नीति की अपनी कठिनाइयां हैं।<br /><br/> &bull;&nbsp;हालांकि चीन के निर्यात के आधार पर मैन्यूफैक्चरिंग का विकास संभव हो पाया था। लेकिन अब चीन के निर्यातों में आ रहे ठहराव के चलते, निर्यात आधारित विकास की रणनीति पर सवालिया निशान लग रहा है। रिजर्व बैंक के गर्वनर रघुराजन का भी कहना है कि मेक इन इंडिया की रणनीति निर्यात के भरोसे नहीं चल सकती है। मूल रूप से देश की मांग के आधार पर ही हमें अपनी मैन्यूफैक्चरिंग के विकास की नीति बनानी होगी।<br /><br/> &bull;&nbsp; सही मायनो में यदि भारत को अपनी ग्रोथ को बढ़ाकर चीन के साथ बराबरी करनी हो तो चीन से सबक लेते हुए व्यवसाय में आने वाली बाधाओं को दरकिनार करवाना होगा। आसान ऋण, कानूनी जंजालों से छुटकारा, विपणन में सुविधायें, इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास, बिजली की उपलब्धता समेत उत्पादन के लिए सभी सुविधाओं को भी जुटाना होगा।

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