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मानसून पर निर्भरता कम हो

बताया जा रहा है कि इस साल बारिश की संभावना को चौपट करने वाले अल नीनो का कोई विशेष प्रभाव नहीं दिखेगा, जिससे मानसून के दौरान देश में सामान्य वर्षा होगी। मौसम का पूर्वानुमान लगाने वाली अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के मुताबिक इस बार अल नीनो के विकसित होने की आशंका नहीं के बराबर है।&nbsp;<br/><br/> अल नीनो की अड़चन के इस बार दूर रहने की संभावना का अनुमान एक निजी संस्था- स्काईमेट वेदर सर्विसेज ने पेश किया है, जिसके अनुसार यह साल मानसून के लिहाज से अच्छा रहने वाला है। इसकी पुष्टि अमेरिकी नेशनल ओसनिक एंड एटमॉस्फियरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) ने भी की है।&nbsp;<br/><br/> पिछले साल अल नीनो के कारण मानसून सीजन में 12 फीसद कम बारिश हुई थी, जिसने देश के फसल उत्पादन पर असर डाला है। एक खराब मानसून दो फसली सीजन को प्रभावित करता है, इसलिए यह आशंका बदस्तूर जारी है कि रबी फसलों की भरपूर पैदावार नहीं हो सके। लेकिन लगातार दो साल तक खराब मानसून देश की अर्थव्यवस्था को चौपट करने की क्षमता रखता है।<br/><br/> मौसम की बेढब पहेली को आज का इनसान पढ़ने की कोशिश करता है, पर कंप्यूटर, इंटरनेट, मौसमी बदलावों पर नजर रखने वाले दर्जनों उपग्रहों की सतत चौकसी के बावजूद बाढ़, सूखे अथवा उत्तराखंड व जम्मू-कश्मीर जैसी प्राकृतिक आपदाओं पर कोई विशेष अंकुश लग पाया है। इस सवाल का सटीक हल नहीं खोजा जा सका है कि आखिर क्यों मौसम अचानक गर्म से सर्द हो उठता है और कैसे चक्रवात पैदा होकर भारी तबाही का कारण बन जाते हैं। यह जानना बेहद मुश्किल है। दो साल पहले केदारनाथ त्रासदी ने अचानक बेइंतहा बारिश को वक्त रहते नहीं समझ पाने की हमारी मजबूरी को साबित किया था। पिछले साल भी जम्मू-कश्मीर की बाढ़ की घटना में हुए भारी विनाश ने आपदाओं से निपटने की हमारी तैयारियों और विकास को बौना साबित कर दिया है। प्राकृतिक आपदाएं जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में ही नहीं, दुनिया में बढ़ रही हैं। और इसमें पेच यह है कि कोई भी मौसमी भविष्यवाणी हमेशा कसौटी पर सौ फीसदी खरी नहीं उतरती।<br/><br/> देखा जा रहा है कि देश ने विभिन्न मौसमी उपग्रहों और उनसे प्राप्त आंकड़ों के विश्लेषण के लिए सुपर कंप्यूटरों का जो विशाल नेटवर्क तैयार किया है, उसकी मदद से अब मौसम की भविष्यवाणी पहले के मुकाबले काफी सटीक हो गई है। लेकिन देश के पर्वतीय इलाकों में मौसम के रुख में अचानक आने वाले बदलाव मौसम पर नजर रखने वाले तंत्र के लिए अब भी चुनौती बने हुए हैं। इस समस्या के दो ऐसे बिंदु हैं जिन पर कार्य करके मौसम के ये ज्योतिषी यानी वेदर फॉरकॉस्ट करने वाली एजेंसियां अपनी भविष्यवाणी को दुरुस्त कर सकती हैं। जैसे, अभी मौसम के पूर्वानुमान के लिए किसी इलाके के 35 वर्ग किलोमीटर के दायरे में तापमान और बादलों-हवा की चाल से संबंधित तथ्यों- आंकड़ों का विश्लेषण किया जाता है, यदि उसे घटाकर 10 या 20 वर्ग किलोमीटर के दायरे में ले आया जाए तो शायद मौसम की अधिक सटीक जानकारी दी जा सकती है। ऐसी तबदीलियां हमारे देश को काफी राहत दे सकती हैं क्योंकि आज भी ज्यादातर इलाकों में रहने वाले हजारों लोगों को अपने जीवन सबसे ज्यादा संघर्ष मौसम की प्रतिकूल स्थितियों से निपटने के लिए करना पड़ता है।<br/><br/> एक जरूरी तबदीली बारिश के बदलते पैटर्न के हिसाब से फसल उत्पादन का चक्र सुधारने और अन्य व्यवस्थाएं बनाने के संबंध में है। आजादी के साढ़े छह दशक बाद भी हमारे योजनाकारों ने मानसून के पैटर्न में बदलाव की घटनाओं से भी कोई सबक नहीं लिया है। यही वजह है कि किसी साल सूखे के बाद भारी वर्षा होने से शुष्क क्षेत्रों में बाढ़ आ जाती है तो किसी साल पूरा मॉनसून सीजन बारिश की आस में ही बीत जाता है।<br/><br/> आज भी हमारे पास इसकी कोई ठोस योजना नहीं है कि देश के किसी एक इलाके में आई बाढ़ से जमा हुए पानी का क्या किया जाए, कैसे उसे उन इलाकों में पहुंचाया जाए जहां उसकी जरूरत है। हालांकि सरकार के योजनाकारों के सामने कुछ किसानों और जमीन से जुड़े लोगों ने मानसूनी वर्षा में कमी से निपटने के अच्छे तरीके विकसित किए हैं। जैसे पंजाब के कुछ किसानों ने भयंकर सूखे से सबक लेते हुए बासमती चावल की ऐसी किस्मों को अपनाया है, जिन्हें देर से बोया जाता है और जो कम पानी मांगती हैं।<br/><br/> ऐसे ही अन्य उपायों में जल संग्रहण और नदियों को परस्पर जोड़ने वाली उस महत्वाकांक्षी परियोजना का उल्लेख किया जा सकता है जिसका जिक्र एनडीए सरकार ने तो छेड़ा था, लेकिन उसके बाद किसी ने उसकी सुध तक नहीं ली है। विडंबना यह है कि 2009 को छोड़कर पिछले एक-डेढ़ दशक में जब लगातार अच्छा मॉनसून रहा, वर्षा आधारित फसलों पर से अपनी निर्भरता कम करने के प्रयास देश में नहीं के बराबर ही किए गए।<br/><br/> यह एक तथ्य है कि असामान्य सूखे की स्थिति में भी राजस्थान और गुजरात के कुछ इलाकों को छोड़कर 100 से 200 मिलीमीटर बारिश तो होती ही है। खराब मॉनसून के दौरान पहाड़ों में भी 400-500 मिलीमीटर बारिश हो ही जाती है, जो अच्छे मॉनसून के दौरान बढ़कर 2,000 मिलीमीटर के आंकड़े तक पहुंच जाती है। इस तरह वर्षा से मिलने वाले पानी की मात्रा सिंचाई और पेयजल की हमारी कुल जरूरतों के मुकाबले कई गुना ज्यादा होती है। जैसे, गांवों में जितनी वर्षा होती है, यदि उसका महज 14-15 फीसदी हिस्सा संगृहीत कर लिया जाए तो वहां सिंचाई से लेकर पेयजल तक की सारी जरूरतें पूरी हो सकती हैं।

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