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फेमा यानी फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट

&bull;&nbsp;यह इससे पहले के कानून फेरा(फॉरेन एक्सचेंज रेगुलेशन एक्ट, 1973) का नया रूप है।&nbsp;<br/> &bull;&nbsp;यह कानून 1999 में अस्तित्व में आया। फेमा कानून को नए रूप में लाने के पीछे मुख्य उद्देश्य विदेशी विनिमय बाजार और व्यापार को और अधिक सरल बनाना है।<br/> &bull;&nbsp;फेमा का मुख्यालय नई दिल्ली में है। इसे प्रवर्तन निदेशालय के नाम से भी जाना जाता है। इसके प्रमुख निदेशक कहलाते हैं।&nbsp;<br/> &bull;&nbsp;मुख्यालय के आलावा इनके पांच जोनल आफिस दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और जालंधर में हैं। हर जोन भी सात सब जोन में बंटे होते हैं, जिनकी जिम्मेदारी सहायक निदेशक पर होती है।&nbsp;<br/> &bull;&nbsp;फेमा एक्ट 1999 के सेक्शन 2(5) के अनुसार भूटान, बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, अफगानिस्तान, चीन और ईरान के निवासी किसी भी सूरत में भारत के किसी भी हिस्से में खेती के लिए या बगीचे के लिए जमीन को छोड़कर, कोई स्थायी संपत्ति या अचल संपत्ति का स्थानांतरण नहीं कर सकते।<br/> &bull;&nbsp;किसी संपत्ति को वह सिर्फ पांच सालों के लिए लीज पर ले सकते हैं। इसके लिए भी उसे पहले भारतीय रिजर्व बैंक से अनुमति लेनी पड़ती है। फेमा कानून में समय-समय पर संशोधन भी होते रहते हैं।<br/> &bull;&nbsp;फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (फेमा) विदेशी व्यापर एवं पेमेंट तथा भारत में फॉरेन एक्सचेंज मार्केट को प्रोत्साहन देने के मकसद से इसे पारित किया गया। इस एक्ट के तहत फॉरेन एक्सचेंज से संबंधित हर तरह के सिविल मामलों पर नजर रखी जाती है।<br/> &bull;&nbsp;संवैधानिक रूप से फेमा में लिखित प्रावधान के अनुसार भारत से बाहर रह रहा वो व्यक्ति जो कभी भारत का नागरिक था, वह भारत में अधिग्रहण व अचल संपत्ति में निवेश कर सकता है।<br/> &bull;&nbsp;जहां तक नियम के उल्लंघन की बात है तो फेमा कानून में नियम के उल्लंघन के बाद जेल की सजा नहीं होती। दंड स्वरूप जुर्माने का प्रावधान है।<br/> &bull;&nbsp;सिविल ऑफेंस के अंतर्गत केस दर्ज होता है

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