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औद्योगिक क्रांति के दौर और रोजगार का सदृश्य

&bull;&nbsp;अठारहवीं सदी के उत्तराद्र्ध में ब्रिटेन में कतिपय अभूतपूर्व परिवर्तन हुए जिन्होंने आधुनिक आर्थिक संवृद्धि की शुरुआत की। वर्षों बाद इसे &#39;औद्योगिक क्रांति&#39; का नाम दिया गया। यह नाम आर्नल्ड टॉयनबी (1852-83) ने किया। उनके मरणोपरांत 1884 में &#39;लेक्चर्स ऑन दी इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन ऑफ द एटींथ सेंचुरी इन इंग्लैंड&#39; छपी जिसने &#39;औद्योगिक क्रांति&#39; शब्द को लोकप्रिय बनाया। <br/><br/> &bull;&nbsp;औद्योगिक क्रांति परस्पर संबद्ध प्रौद्योगिक परिवर्तनों का परिणाम थी। ये परिवर्तन मूलत: तीन क्षेत्रों में देखे गए।&nbsp;<br/><br/> &bull;&nbsp;सर्वप्रथम मानवीय कौशल के बदले यांत्रिक उपाय काम में लाए गए।<br/><br/> &bull;&nbsp;द्वितीय मनुष्य और जानवरों की शक्ति के स्थान पर भाप, कोयले आदि का इस्तेमाल अधिकाधिक होने लगा।&nbsp;<br/><br/> &bull;&nbsp;अंत में, इनके परिणामस्वरूप धातु एवं रसायन से जुड़े उद्योगों में कच्चे मालों को प्राप्त करने तथा उनसे होने वाले उत्पादन में अभूतपूर्व परिवर्तन देखे गए।<br/><br/> &bull;&nbsp;प्रथम औद्योगिक क्रांति ने युगों से चली आ रही उत्पादन व्यवस्था में भारी उलटफेर कर दिया। पहली बार कारखाने की व्यवस्था अस्तित्व में आई और उसके कारण शहर का चरित्र बदला और गांवों से सामंती व्यवस्था के अवसान के कारण भारी संख्या में मजदूर शहरों की ओर ढकेले गए। गांवों के हथकरघों को कारखानों के कार्टराइट के पॉवर लूम ने अपदस्थ कर दिया।<br/><br/> &bull;&nbsp;प्रथम औद्योगिक क्रांति के लगभग सौ साल बाद बिजली आई जिसने प्रकाश ही नहीं दिया, बल्कि कारखानों के संचालन के लिए नई ऊर्जा दी और उत्पादन में भारी वृद्धि हुई। मोटर गाडिय़ां अस्तित्व में आईं जिन्होंंने बग्घियों को काफी कुछ बाहर कर दिया। इस्पात का उत्पादन बड़े पैमाने पर होने लगा। हवाई जहाज अस्तित्व में आए और टेलीफोन ने संचार क्रांति को बढ़ावा दिया और इसके पहले टेलीग्राफ ने दुनिया के विभिन्न हिस्सों को परस्पर जोड़ दिया।<br/><br/> &bull;&nbsp;तत्काल औद्योगिक क्रांति ने तीसरे दौर में प्रवेश किया है। बीसवीं सदी के आखिरी दशकों के दौरान कम्प्यूटर एवं सूचना और संचार क्रांति से जुड़ी प्रौद्योगिकियों में तेजी से हो रहे परिवर्तनों ने काफी कुछ बदल दिया है। टेलीग्राफ के साथ ही पुराने टाइपराइटर्स तथा छापाखाने अतीत के गर्भ में समाहित हो गए हैं। लैंडलाइन फोन की जगह मोबाइल आ गए हैं। तत्काल बिना ड्राइवरों की गाडिय़ों, चालकरहित ड्रोन, मशीनें जो सैकड़ों भाषाओं का अविलंब दूसरी भाषाओं में अनुवाद की क्षमता रखती हंै और नई मोबाईल प्रौद्योगिकियों के आने से मरीज और डॉक्टर तथा छात्रों एवं शिक्षक के बीच दूरी समाप्त करने को लेकर जोर-शोर से चर्चाएं चल रही हैं।<br/><br/> &bull;&nbsp;प्रथम और द्वितीय औद्योगिक क्रांतियों की तरह ही इस बार लोगों का जीवन-स्तर ऊंचा उठेगा और मानव कल्याण बढ़ेगा परन्तु अंतरिम काल में समाज के बहुत सारे लोगों को नई परिस्थितियों के अनुकूल अपने को ढालने के क्रम में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के दो प्रमुख अर्थशास्त्रियों कार्ल बेनेडिक्ट फे्र और माइकल ऑसबॉर्न ने 700 से अधिक पेशों का विश्लेषण कर वे इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि अमेरिका में 47 प्रतिशत पेशे आने वाले समय में खतरे में पड़ सकते हैं क्योंकि वहां मशीनों का इस्तेमाल बढऩे से मजदूरों की मांग तेजी से घट सकती है। समाज के अंदर दक्ष और धनी मजदूरों और समाज के अन्य मजदूरों के बीच भारी अलगाव आ सकता है। पूंजीपतियों और श्रमजीवियों के बीच भारी विषमता आ सकती है। साथ ही क्षमता से कम रोजगार वालों की संख्या बढ़ सकती है जिससे निवेश पर बुरा असर पड़ सकता है।<br/><br/> &bull;&nbsp;प्रौद्योगिक परिवर्तनों का असर व्यापार पर भी देखा जा रहा है। अब तक माना जा रहा था कि विदेश व्यापार के जरिए गरीब देश अपना निर्यात बढ़ाकर विकास की दिशा में बढ़ सकते हैं किन्तु प्रौद्योगिकीय परिवर्तन के कारण विनिर्माण कार्य स्वचालित होते जा रहे हैं और श्रम की मांग घट रही है। कई अर्थशास्त्रियों ने इसे समय से पूर्व विऔद्योगिकीकरण कहा है। विकासशील देशों की सरकारें गांवों से शहरों की ओर पलायन कर रहे मजदूरों को विनिर्माण क्षेत्र में नहीं लगा सकतीं।<br/><br/> &bull;&nbsp;द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यूरोप और अमेरिका में तेज संवृद्धि का जो दौर शुरु हुआ वह 1970 के दशक के आते-आते रुक गया। 1990 के दशक के आरंभ में जापान में आर्थिक जड़ता का दौर आरंभ हुआ। अल्प यूरोपीय देश तथा अमेरिका में उतार-चढ़ाव देखे गए। विकसित देश वर्ष 2008 में आरंभ हुए वित्तीय अतिमंदी के दौर से छ: साल बाद भी नहीं उबर पाए हैं। ब्रिटेन और अमेरिका में मजदूर वर्ग पर भारी बोझ पड़ा है। वर्ष 1991 और 2012 के बीच ब्रिटेन में 1.5 प्रतिशत और अमेरिका में मात्र एक प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से वास्तविक मजदूरी बढ़ी है। आर्थिक संवृद्धि की दर की तुलना में मजदूरी में वृद्धि काफी कम रही है। जर्मनी में हालत काफी खराब है। वर्ष 1992 और 2012 के बीच वास्तविक मजदूरी में मात्र 0.6 प्रतिशत प्रतिवर्ष की वृद्धि रही है। इटली और जापान में तो कोई खास वृद्धि नहीं हुई है।&nbsp;<br/><br/> &bull;&nbsp;आर्थिक इतिहासकार बतलाते हैं कि प्रथम और द्वितीय औद्योगिक क्रांति के बाद भी मजदूर वर्ग पर सबसे अधिक बोझ पड़ा और उनके जीवन स्तर में कोई सुधार नहीं आया। यही चीज तृतीय औद्योगिक क्रांति के बाद भी दिख रही है। अमेरिका में विनिर्माण उद्योगों के अन्यत्र जाने तथा सेवा क्षेत्र की प्रमुखता बढऩे से अमेरिकी मजदूर वर्ग की स्थिति में कोई सुधार नहीं दिख रहा।<br/><br/> &bull;&nbsp;शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में परिवर्तन दिखने लगे हैं। ऑनलाइन कोर्स के क्षेत्र में काफी प्रगति दिखी है। एक प्रोफेसर अनेक लोगों का काम कर सकता है। वह ऑनलाइन कोर्स को विकसित कर अमेरिका में बैठे हुए देश-विदेश के छात्रों को शिक्षा दे सकता है। इसी तरह चिकित्सा के क्षेत्र में डॉक्टर एक जगह बैठकर मरीजों की बात सुनकर और उनके रोगों का निदान मशीनों की सहायता से कर उचित इलाज सुझाने में समर्थ हैं जिससे इस पूरी प्रक्रिया के ऊपर पहले की अपेक्षा काफी कम खर्च आ रहा है। निरंतर गंभीर बीमारियों से पीडि़त मरीजों को भी सही सलाह दूर बैठे डॉक्टर देने में सक्षम है।<br/><br/> &bull;&nbsp;विकसित देशों में प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हो रहे परिवर्तनों से सबसे अधिक मजदूर प्रभावित हुए हैं। उनके पुराने पेशे समाप्त होते जा रहे हैं और यह वहां के सरकारों का दायित्व है कि वे इन विस्थापित मजदूरों को अन्यत्र उचित प्रशिक्षण के बाद लगाएं। मगर ऐसा सरकारें शायद ही करती हैं यदि सरकारें उचित कदम नहीं उठातीं तो मजदूरों के सामने हमेशा बेरोजगारी का खतरा बना रहेगा। जैसा कि हम पिछले दिनों इंगित कर चुके हैं कि वर्ष 2011 से ऐसी कारों को लाने की दिशा में जोर-शोर से काम चल रहा है जिनमें ड्राइवरों की जरूरत न हो। कहना न होगा कि ड्राइवर के पेशे में लगे हजारों-लाखों लोग बेरोजगार हो सकते हैं।&nbsp;<br/><br/> &bull;&nbsp;टैक्सियों, ट्रकों, बसों आदि के परिचालन में लगे लोगों को न उच्च शिक्षा की और न ही लंबे प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। देर-सबेर ड्राइवर रहित कारों, बसों, टैक्सियों, ट्रकों आदि के आते ही ड्राइवर के पेशे में लगे लोग पटरियों पर आ जाएंगे। एक जमाना था जब बग्घियां चलती थीं किन्तु मोटर गाडिय़ों और बसों के आते ही उनके चलाने वाले तथा घोड़ों की देखभाल में लगे लोग बेरोजगार हो गए और वे तब तक बेरोजगार रहे जब तक मोटर गाडिय़ों और बसों के लिए ड्राइवरों की मांग ने जोर नहीं पकड़ी।<br/><br/> &bull;&nbsp;कहना नहीं होगा कि कोई भी प्रौद्योगिक परिवर्तन हो उससे पहले मजदूर प्रभावित होते हैं। उन्हें बेरोजगारी और आय में गिरावट का सामना करना पड़ता है। पिछले 30 वर्षों के दौरान तृतीय औद्योगिक क्रांति के क्रम में हो रहे प्रौद्योगिक परिवर्तनों से मजदूर वर्ग सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। विकसित देश हों या विकासशील देश, सर्वत्र, मजदूरों को प्राप्त होने वाली सकल घरेलू उत्पाद में हिस्सेदारी घटी है। एक आकलन के अनुसार 1980 के दशक के आरंभिक वर्षों से लेकर अब तक मजदूर वर्ग की हिस्सेदारी तकरीबन पांच प्रतिशत घटी है। वर्ष 2000 से 2011 के बीच अमेरिकी ब्यूरो ऑफ लेबर स्टाटिस्टिक्स के अनुसार प्रति मजदूर वास्तविक उत्पादन 2.5 प्रतिशत प्रति वर्ष की दरन से बढ़ा जबकि वास्तविक मजदूरी में वृद्धि प्रति वर्ष एक प्रतिशत दर भी कम हुई।&nbsp;<br/><br/> &bull;&nbsp;स्पष्टतया सकल घरेलू उत्पाद का वितरण पूंजी के पक्ष में रहा। कम दक्षता, कम उत्पादकता और कम मजदूरी वाले मजदूरों की मांग में जरूर इजाफा देखा गया है। इस क्षेत्र में मजदूरों के बीच प्रतिद्वंद्विता बढऩे से मजदूरी में बहुत कम वृद्धि देखी गई है। प्रौद्योगिक परिवर्तनों के कारण कम प्रशिक्षित मजदूरों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। इनकी उन कार्यों से बाहर फेंका जा रहा है जहां स्वयंचालित प्रौद्योगिकी को अपनाया जा रहा है। एक ओर तो मजदूरों के बीच में प्रतिद्वंद्विता हो रही है वहीं मशीनों से भी प्रतिस्पर्धा है क्योंकि वे दिखलाने की कोशिश कर रहे हैं कि वर्तमान प्रौद्योगिकी के सहारे अधिक उत्पादन कर सकते हैं। कहना न होगा कि विकसित देश हों या विकासशील मजदूरों की हिस्सेदारी घट रही है।

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