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कंपनियों का सामाजिक उत्तरदायित्व

<p> &bull;&nbsp;ईश्वर पैसे कमाने की बुद्धि और कला, हरेक को नहीं देता। अधिकतर तो पैसा ही पैसे को खींचता है और धनवान और अधिक धनवान बनता चला जाता है। उस समय उसका मनोविज्ञान भी बदल जाता है। लखपति, करोड़पति बनने के लिये जी-जान से लग जाता है, और करोड़पति, अरबपति। एक कम्पनी कई कम्पनियों में बदल जाती है, और भाई-भतीजों की हिस्सेदारी से वह एक अमरबेल की भांति निगलने की कुव्वत भी रखती है।<br /> <br /> &bull;&nbsp;दूसरी ओर, कहीं परिवारों को विरासत में घोर गरीबी मिलती है। घोर गरीबी उस परिस्थिति का नाम है, जिसमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी निरक्षरता, सम्पत्तिहीनता, शारीरिक कमजोरी, बीमारी, क्षेत्र का पिछड़ापन और उसकी क्षीण अधोसंरचना, और जनसमुदाय में व्याप्त नशे की आदतें भी मिलती हंै। समय के साथ ऐसे लोगों की परिस्थिति और भी बिगड़ती जाती है, जब उन्हें अपनी रही-सही सम्पत्ति और ताकत भी &#39;विकास&#39; की बाढ़ के प्रवाह में झोंकनी पड़ती है।&nbsp;<br /> <br /> &bull;&nbsp;यह &#39;विकास&#39; विशेषत: उन परिस्थितियों का द्योतक है, जिनमें निजी कम्पनियां, सार्वजनिक-अद्र्धसार्वजनिक उपक्रम, अपना उद्योग व कार्यालय स्थापित करने के लिए, उनकी जमीन, पेयजल के स्रोत, आवागमन के रास्तों पर अपना कब्जा जमा लेते हैं। ऐसे में दो पंक्तियां हमेशा ध्यान में आती है:-</p> <div style="margin-left: 40px;"> <span style="color:#800000;">&quot;जब-जब भूखा इनसान रहेगा,</span></div> <div style="margin-left: 40px;"> <span style="color:#800000;">धरती पर तूफान रहेगा।&quot;</span></div> <br /> <br /> <p> &bull;&nbsp;इस तूफान का अनुभव भारत में होता आया है, और दर्द देने वाली कम्पनियों से ही दवा मांगने का बन्दोबस्त कॉर्पोरेट सोशल रेस्पांसिबिलिटी (सी.एस.आर.) अथवा &#39;निगमित सामाजिक उत्तरदायित्य&#39; की धारणा के अन्तर्गत वर्ष 1965 से ही विचारित होने लगा था। पहले पहल इस धारणा के तहत क्या किया जा सकता है, इसके बारे में बहुत स्पष्टता नहीं थी।<br /> <br /> &bull;&nbsp;इतना अवश्य स्पष्ट होता था कि मुनाफा कमाने वाली कम्पनियों को, उनकी बदौलत जमीन औ रोजगार खोलने वाले लोगों के भले के लिये बहुत से कल्याण के काम करने चाहिये- जैसे स्कूल, दवाखाना, बस स्टैण्ड, पेयजल आदि की व्यवस्था करना, आदि। परन्तु कम्पनियों ने भले ही दिखावे के लिये इसके तहत थोड़ा-कुछ कर दिया हो, उनका मन इसमें नहीं था। उनकी मानसिकता यही चली आती थी, कि उनका मुख्य ध्येय मुनाफा कमाना है। यदि कोई समाजसेवी संस्था बीच में पड़कर कुछ काम संभालना चाहे, तो वे उसे थोड़ा बहुत पैसा दे सकते हैं, अन्यथा उनके पास इसके लिये कोई नजरिया नहीं था न ही कोई स्टॉफ इस विषय का जानकार होता था।<br /> <br /> &bull;&nbsp;इधर पंचवर्षीय योजनाओं में भारत के संविधान के व्यापक लक्ष्य- लोगों की आर्थिक विषमता दूर करने संबंधी प्रावधान के तहत सभी विभागों को अपने कार्यक्रम नियोजित करने थे।<br /> <br /> सार्वजनिक उपक्रमों की गतिविधियों में मानव संसाधन व जनकल्याण से ताल्लुक रखने वाली नीतियों व कार्याक्रमों में एकरूपता रहे इसे सुनिश्चित करने के लिये भारत सरकार का सार्वजनिक उपक्रम विभाग 70-80 के दशक से अस्तित्व में आ चुका था।&nbsp;<br /> <br /> &bull;&nbsp;वह केन्द्र सरकार के उपक्रमों को तो दिशा-निर्देश देता ही था- राज्य सरकारों के नियम भी उसके सामान्य निर्देशों के अनुरूप चलते थे। यह बात अलग है कि राज्यों के निगमित निकायों में बहुत लाभ कमाना संभव नहीं हो पाता था- जब कि केन्द्र के उपक्रम विशालकाय होते आए हैं- जैसे भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स, ओ.एन.जी.सी., एन.टी.पी.सी. आदि। इनमें करोड़ों तथा अरबों रुपये का लाभ भी होता आया है। इसका अर्थ यह भी है कि इन्हें बड़े पैमाने पर लोगों का भला करना चाहिये, और यह मनमाने ढंग से नहीं, बल्कि सुविचारित उद्देश्यों के लिये साफ-सुथरी, निष्पक्ष व्यवस्था प्रणाली, व प्रक्रिया के तहत। उदाहरण के लिये यदि एक तिमंजिला भवन जनकल्याण के लिए बनाना है, तो किन उद्देश्यों के लिए वह कम्पनियों दान से बन सकता है तथा उसके लिये चरणबद्ध गति से, इंजीनियरों के स्थल परीक्षण के बाद, अनुशंसा के आधार पर ही पैसा दिया जायेगा।<br /> <br /> &bull;&nbsp;इस बात की चर्चा भी जरूरी है कि निगमित कम्पनियां की खुद की कानूनी बाध्यताएं कौन तय करता है। वस्तुत: ये कम्पनी अधिनियम 1956 के तहत कार्य करती हैं। पहले इस अधिनियम में छ: सौ से अधिक धारायें थीं और यह सुगठित नहीं था। किन्तु वर्ष 2013 में इसमें व्यापक सुधार किए गए। इसके नियम 2014 में ही लागू हुए हैं।<br /> <br /> - अब इसकी धारा 134 तथा 135 के अनुसार रुपये 500 करोड़ की नेटवर्थ की अथवा 1000 करोड़ की कुल व्यवसाय वाली हर कम्पनी को सीएसआर के तहत प्रतिवर्ष न्यूनतम 5 करोड़ रुपये व्यय करने चाहिये। नियमों के शेड्यूल के अनुसार निम्नांकित गतिविधियों के तहत ही कम्पनियों को जनकल्याण करने हैं:-<br /> <br /> &bull;&nbsp;घोर भुखमरी, गरीबी व कुपोषण दूर करने के लिये, तथा स्वास्थ्य व स्वच्छता तथा पेयजल की उपलब्धता के लिए।<br /> <br /> &bull;&nbsp;शिक्षा के विकास, जिसमें ऐसी विशेष शिक्षा भी शामिल हैं। जिससे कोई व्यावसायिक हुनर मिल सके- बच्चों, बूढ़ों, महिलाओं व विकलांगों के रोजगार के अवसर पढ़ सकें।<br /> <br /> &bull;&nbsp;स्त्री-पुरुषों के आर्थिक-सामाजिक जीवन में व्याप्त विषमताओं को दूर करने के लिए प्रयास, महिला सशक्तिकरण, महिलाओं तथा अनाथ लोगों के लिए आवास स्थापित करना, वृद्धाश्रम खोलना, अथवा वृद्धों के लिए दिन के समय देखभाल की व्यवस्था करना, सामाजिक तथा आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के हित में ऐसी व्यवस्थाएं करना जिससे उनका पिछड़ापन दूर हो सके।<br /> <br /> &bull;&nbsp;पर्यावरण को स्वच्छ बनाये रखने के प्रयास, तथा प्रकृति व प्राणियों में संतुलन बनाए रखने की दृष्टि से उठाए गए कदम, पशु-कल्याण, कृषि-वानिकी, प्राकृतिक साधनों का सदुपयोग भूमि, जल एवं वायु को सुधारने के लिए करना।<br /> <br /> &bull;&nbsp;राष्ट्रीय धरोहरों, कला तथा संस्कृति की सुरक्षा, जिनमें शामिल हैं इमारतों तथा ऐतिहासिक महत्व के स्थलों की मरम्मत, सार्वजनिक पुस्तकालयों को निर्माण, पारम्परिक कला-कौशल की वस्तुओं तथा शिल्पों को प्रोत्साहन।<br /> <br /> &bull;&nbsp;भूतपूर्व सैनिकों, युद्ध में शहीद सैनिकों की विधवाओं को तथा उन पर निर्भर लोगों की सहायता के उपाय।<br /> <br /> &bull;&nbsp;गांव में लोकप्रिय खेलों में लोगों को प्रशिक्षित करना तथा उनका प्रोत्साहन, साथ ही ओलम्पिक तथा अद्र्ध-ओलम्पिक खेलों के अन्तर्गत प्रशिक्षण की व्यवस्था करना।<br /> <br /> &bull;&nbsp;प्रधानमंत्री सहायता कोष तथा राज्यों में स्थापित आर्थिक-सामाजिक प्रयोजनों के लिए स्थापित अन्य सहायता कोषों में योगदान देना, पिछड़े वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अल्पसंख्यकों के सामाजिक-आर्थिक विकास व कल्याण के लिये योगदान देना।<br /> <br /> &bull;&nbsp;भारत सरकार के लिये अध्ययनरत संस्थाओं, अकादमियों को अनुदान देना।<br /> <br /> &bull;&nbsp;ग्रामीण विकास के लिये परियोजनाएं। इस बारे में कम्पनियों को अपने बोर्ड के कम से कम 3 संचालकों की समिति से अनुमोदन प्राप्त करना होगा।<br /> <br /> &bull;&nbsp;इस प्रकार से स्पष्ट है, कि कई क्षेत्रों में जन कल्याण के लिये सी.एस.आर. के अन्तर्गत संभावनाएं छिपी हुई है। अब भारत सरकार ने यह भी तय कर दिया है कि टैक्स भरने के बाद प्राप्त विशुद्ध मुनाफे का न्यूनतम 2 प्रतिशत हर वर्ष कम्पनियों को जनकल्याण के लिये खर्च करना ही चाहिये।</p> <div style="margin-left: 40px;"> <span style="color:#696969;">हजारों साल रोती है अपनी बेनूरी पे नर्गिस,</span></div> <div style="margin-left: 40px;"> <span style="color:#696969;">तब जाके होता है चमन में इक दीदावर पैदा।</span></div> <div> &nbsp;</div>

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