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क्या हैं रेपो रेट रिवर्स रेपो रेट सीआरआर और उनकी अहमियत

<p> <strong><span style="color:#800000;">क्या हैं रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट सीआरआर और SLR और उनकी अहमियत ..?</span></strong><br /> <br /> &bull;&nbsp;भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India) द्वारा आर्थिक नीतियों की समीक्षा के दौरान प्रमुख ब्याज दरें घटाने या बढ़ाने की ख़बरें हम सब पढ़ते ही रहते हैं, ... तो आइए जानते हैं, हर बार इस तरह की ख़बरों में इस्तेमाल होने वाले शब्दों - रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट और सीआरआर - के अर्थ...<br /> <br /> <strong><span style="color:#800000;">रेपो रेट (Repurchase Rate or Repo Rate):-&nbsp;</span></strong><br /> &bull;&nbsp;रोजमर्रा के कामकाज के लिए बैंकों को भी बड़ी-बड़ी रकमों की ज़रूरत पड़ जाती है, और ऐसी स्थिति में उनके लिए देश के केंद्रीय बैंक, यानि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से ऋण लेना सबसे आसान विकल्प होता है... इस तरह के ओवरनाइट ऋण पर रिजर्व बैंक जिस दर से उनसे ब्याज वसूल करता है, उसे रेपो रेट कहते हैं...<br /> &bull;&nbsp;अब आप आसानी से समझ सकते हैं कि जब बैंकों को कम दर पर ऋण उपलब्ध होगा, वे भी ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए अपनी ब्याज दरों को कम कर सकते हैं, ताकि ऋण लेने वाले ग्राहकों में ज़्यादा से ज़्यादा बढ़ोतरी की जा सके, और ज़्यादा रकम ऋण पर दी जा सके... इसी तरह यदि रिजर्व बैंक रेपो रेट में बढ़ोतरी करेगा, तो बैंकों के लिए ऋण लेना महंगा हो जाएगा, और वे भी अपने ग्राहकों से वसूल की जाने वाली ब्याज दरों को बढ़ा देंगे...<br /> <br /> <strong><span style="color:#800000;">रिवर्स रेपो रेट (Reverse Repo Rate)&nbsp;</span></strong><br /> &bull;&nbsp;जैसा इसके नाम से ही साफ है, यह रेपो रेट से उलट होता है... जब कभी बैंकों के पास दिन-भर के कामकाज के बाद बड़ी रकमें बची रह जाती हैं, वे उस रकम को रिजर्व बैंक में रख दिया करते हैं, जिस पर आरबीआई उन्हें ब्याज दिया करता है... अब रिजर्व बैंक इस ओवरनाइट रकम पर जिस दर से ब्याज अदा करता है, उसे रिवर्स रेपो रेट कहते हैं...<br /> &bull;&nbsp;दरअसल, रिवर्स रेपो रेट बाज़ारों में नकदी की तरलता को नियंत्रित करने में काम आती है... जब भी बाज़ारों में बहुत ज्यादा नकदी दिखाई देती है, आरबीआई रिवर्स रेपो रेट बढ़ा देता है, ताकि बैंक ज़्यादा ब्याज कमाने के लिए अपनी रकमें उसके पास जमा करा दें, और इस तरह बैंकों के कब्जे में बाज़ार में छोड़ने के लिए कम रकम रह जाएगी...<br /> <br /> <strong><span style="color:#800000;">नकद आरक्षित अनुपात (Cash Reserve Ratio or CRR - सीआरआर)&nbsp;</span></strong><br /> &bull;&nbsp;देश में लागू बैंकिंग नियमों के तहत प्रत्येक बैंक को अपनी कुल कैश रिजर्व का एक निश्चित हिस्सा रिजर्व बैंक के पास रखना ही होता है, जिसे कैश रिजर्व रेशो अथवा नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) कहा जाता है<br /> &bull;&nbsp;ऐसे नियम इसलिए बनाए गए हैं, ताकि यदि किसी भी वक्त किसी भी बैंक में बहुत बड़ी तादाद में जमाकर्ताओं को रकम निकालने की ज़रूरत महसूस हो, तो बैंक पैसा चुकाने से इन्कार न कर सके... सीआरआर ऐसा साधन है, जिसकी सहायता से आरबीआई बिना रिवर्स रेपो रेट में बदलाव किए बाज़ार से नकदी की तरलता को कम कर सकता है...<br /> &bull;&nbsp;सीआरआर बढ़ाए जाने की स्थिति में बैंकों को ज़्यादा बड़ा हिस्सा रिजर्व बैंक के पास रखना होगा, और उनके पास ऋण के रूप में देने के लिए कम रकम रह जाएगी... इसी के विपरीत बाज़ार में नकदी बढ़ाने के लिए रिजर्व बैंक सीआरआर को घटाया करता है... लेकिन महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सीआरआर में बदलाव तभी किया जाता है, जब बाज़ार में नकदी की तरलता पर तुरन्त असर न डालना हो, क्योंकि रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट में बदलाव की तुलना में सीआरआर में किए गए बदलाव से बाज़ार पर असर ज़्यादा समय में पड़ता है.<br /> <br /> <strong><span style="color:#800000;">एसएलआर SLR</span></strong><br /> &bull;&nbsp;इसका पूरा मतलब होता है स्टैचुटरी लिक्विड रेश्यो। यह बैंकों में आवश्यक धन रखने से जुड़ा हुआ है। कमर्शियल बैंकों को रिजर्व बैंक के निर्देशानुसार एक निश्चित राशि नकदी, सोना या सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त बॉन्डों में निवेश करना होता है। इस पर रिजर्व बैंक नजर रखता है, ताकि बैंकों के उधार देने पर नियंत्रण रखा जा सके।</p> <br /> <div style="margin-left: 40px;"> - एसएलआर कुल मांग का प्रतिशत के रूप में निर्धारित किया जाता है</div> <div style="margin-left: 40px;"> - समय देयताएं उनके कभी भी मांग पर ग्राहकों को भुगतान करने के लिए एक वाणिज्यिक बैंक उत्तरदायी देनदारियों हैं .</div> <div style="margin-left: 40px;"> - एसएलआर मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने और प्रेरित करने के लिए प्रयोग किया जाता है</div> <div style="margin-left: 40px;"> - एसएलआर दर ट्यूनिंग के माध्यम से प्रणाली में मुद्रा की आपूर्ति कुशलता से नियंत्रित किया जा सकता है .</div> <br /> <br /> <p> <strong><span style="color:#800000;">सी.आर.आर और एस.एल.आर के प्रभाव का उदाहरण इस प्रकार है</span></strong><br /> &bull;&nbsp;मान लें, की लेना बैंक के पास एन.डी.टी.एल 100 रु. हैं वे यह राशि ऋण के रूप में आकांक्षित व्यक्ति को दे सकते हैं, इस प्रकार से 100 रु. बाज़ार में प्रवेश करेंगे (मंदी का कारणबन सकता है), अत: श्री मान बांड (भारतीय रिजर्व बैंक के राजन) ने कहा की 4 % (सी.आर.आर) अपने पास रखें और 22% सी.एल.आर को सरकारी ऋणपत्रों और सोने के रूप में(जिसे ऋण के रूप में न दिया जा सके) तो लेना बैंक के पास एन.डी.टी.एल का 74% [100 - (22 + 4)] शेष रहता है इस प्रकार ऋण के लिए कम राशि होने से अंतत: मंदी पर प्रभाव पड़ता है|<br /> &bull;&nbsp;एस.एल.आर को बनाये रखने का मुख्य उद्देश्य :</p> <div style="margin-left: 40px;"> i. बैंक ऋण के विस्तार को नियंत्रित करना| भारतीय रिजर्व बैंक एसएलआर के स्तर को बदलकर बैंक ऋण विस्तार में कमी या वृद्धि कर सकता हैं।</div> <div style="margin-left: 40px;"> ii. वाणिज्यिक बैंकों की शोधन क्षमता सुनिश्चित करना।</div> <div style="margin-left: 40px;"> iii. सरकारी बांड की तरह सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करने के लिए वाणिज्यिक बैंकों को मजबूर करना।</div> <div> <span style="color:#696969;">**DBT** जीएस मुख्य परीक्षा के पेपर 3 के सिलेबस से। अति महत्वपूर्ण विषय ! विषय की समस्या के साथ समाधान प्रस्तुत किया गया है।</span></div>

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