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पंचायत स्तर पर समस्याएं

<div> <strong><u><span style="color:#8b4513;">पंचायत स्तर पर समस्याएं</span></u></strong></div> <div> यह तो हुई अवधारणागत दिक्कत, लेकिन उपरोक्त गिनाई गई तीनों समस्याओं की जड़ें इस बात में हैं कि योजना के लिए जरूरी जिम्मेदारियां नहीं सुनिश्चित की जा सकीं और न ही काम का बंटवारा उचित तरीके से किया गया। ब्लॉक स्तर के इंजीनियरों की दक्षता का अभाव भी इसका एक कारण रहा। इसमें पंचायतों के दखल से मुसीबत और बढ़ जाती है, क्योंकि क्या काम करना है और किससे करवाना है, यह पंचायतें तय करती हैं और इसके पीछे आम तौर पर उनके सामाजिक पूर्वग्रह और स्थानीय राजनीति काम करती है। मनरेगा के लिए विभिन्न् कार्यों की वार्षिक योजना बनाने का काम पंचायतों का होता है। राज्यों द्वारा बनाई जाने वाली योजनाओं का आधार पंचायतों की ये योजनाएं ही होती हैं और इन्हीं के आधार पर केंद्र सरकार द्वारा राशि का आवंटन किया जाता है। समस्या यही है कि पंचायतें भला कैसे पूर्वानुमान लगा सकती हैं कि इस साल भारी बारिश होगी या फिर सूखा पड़ेगा, क्योंकि काम की मांग इन्हीं के आधार पर तय होती है। पंचायतों द्वारा तय किए जाने वाले &#39;हितकारी&quot; कार्य भी अमूमन वही होते हैं, जो सरपंच या उसके विश्वस्तों के लिए ज्यादा फायदेमंद साबित हों।</div> <div> &nbsp;</div> <div> &nbsp;</div> <div> <strong><u><span style="color:#800000;">प्रशासनिक स्तर पर समस्याएं:-</span></u></strong></div> <div> इसके बाद प्रशासनिक स्तर पर समस्याएं आती हैं। कुछ उत्साही जिला पंचायत सीईओ (आम तौर पर नए-नए आईएएस अधिकारियों को यह पद दे दिया जाता है) अग्रिम में ही कुछ काम मुहैया करा देते हैं, ताकि मांग के आधार पर रोजगार प्रदान किया जा सके। देश की ग्रामीण आबादी जिस तरह से नि:शक्त है, उसके मद्देनजर वास्तविक जरूरतमंद गरीब व्यक्ति यह रोजगार प्राप्त नहीं कर सकता।&nbsp;</div> <div> &nbsp;</div> <div> रोजगार कार्ड, उस पर छपा हेल्पलाइन नंबर और किए गए काम की एंट्री जैसी चीजें महज सोशल ऑडिट के काम आती हैं, क्योंकि बमुश्किल ही किसी कामगार के पास रोजगार कार्ड होता है और यदि रिपोर्टों पर भरोसा करें तो ये रोजगार कार्ड आम तौर पर सरपंचों के कब्जे में रहते हैं। इनका उपयोग तभी किया जाता है, जब कोई मूल्यांकनकर्ता फील्ड विजिट करता है। और चूंकि किए गए काम का कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाता, इसलिए काम की उपलब्धता और भुगतान की स्थिति अनियमित बनी रहती है। ऐसे में कोई भी समझदार व्यक्ति वही काम करना पसंद करेगा, जिसमें भले कम पैसा मिले, लेकिन हाथोंहाथ भुगतान हो जाए।</div> <div> &nbsp;</div> <div> ऐसे में यह उपलब्धि भी अपने आपमें कम नहीं है कि अनुमानत: 4.78 करोड़ लोगों को 46 दिनों का सालाना रोजगार सुनिश्चित किया जा सका। निश्चित ही, इसके बावजूद यह महत्वाकांक्षी योजना अपने लक्ष्यों को अर्जित करने में चूकी है।</div> <div> &nbsp;</div>

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