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कृषि और कृषक दोनों की समस्याएं

&bull;&nbsp;खेती की मूलभूत जरूरतों को नजरअंदाज करना किसानों पर भारी पड़ने लगा है। खाद्य सुरक्षा के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाने वाले किसान खुद सरकारी मदद को मोहताज हैं। लाखों की लागत वाली जमीन (पूंजी) के बावजूद खेतिहर पेट भरने को दिनरात खट रहे है।&nbsp;<br/><br/> &bull;&nbsp;जलवायु विशेष (क्लाइमेटिक जोन) के हिसाब से नीतियां बनाने के बजाए देशव्यापी नीतियों की वजह से सभी किसानों को इसका फायदा नहीं मिल पाता है। अलग-अलग जलवायु क्षेत्र के अनुकूल नीतियां ही कामयाब होंगी। इन्हीं नीतिगत खामियों के चलते भूजल की कमी वाले पंजाब और हरियाणा में गेहूं, चावल और गन्ना जैसी अधिक पानी की जरूरत वाली फसलों की खेती की जाती है।&nbsp;<br/><br/> &bull;&nbsp;मिट्टी की उर्वरा क्षमता में गिरावट आने से गेहूं व चावल की उत्पादकता नीचे खिसकने लगी है, जो खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा है।<br/><br/> &bull;&nbsp;खेती के साथ बागवानी, डेयरी, पशुधन व मत्स्य पालन को उचित प्रोत्साहन नहीं दिया गया।<br/><br/> &bull;&nbsp;छह दशक बाद भी दो तिहाई खेती इंद्रदेव के भरोसे यानी बारिश पर आधारित है। सिंचाई जैसी मूलभूत जरूरतें लगातार नजरअंदाज हुई है। वीभत्स नतीजा सामने है।<br/><br/> &bull;&nbsp;मानसून में थोड़ी सी कमी भी देश की अर्थव्यवस्था डांवाडोल कर देती है।<br/><br/> &bull;&nbsp;समूची दुनिया में जब खेती में आधुनिक प्रौद्योगिकी का उपयोग कर उत्पादकता कई गुना तक बढ़ा लिया गया है। लेकिन भारत में जैव प्रौद्योगिकी जैसी वैज्ञानिक खोजों से दूरी बनाई गई है। अमेरिका और चीन की खेती से तुलना करने वाले भारत में जैव प्रौद्योगिकी से परहेज औचित्य से परे है।<br/><br/> &bull;&nbsp;फर्टिलाइजर को लेकर सरकार की ढुलमुल नीतियों का खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है। सरकारी कृषि आंकड़े कभी सटीक नहीं रहे।<br/><br/> &bull;&nbsp;मौसम की भविष्यवाणी, पैदावार के आंकड़े, उपज के मूल्य संबंधी ताजा जानकारी और खाद्यान्न की मांग व आपूर्ति के हालात संबंधी आंकड़ों की जानकारियां किसानों को सही समय पर नहीं मिल पाती है, जो एक बड़ी समस्या है। इन जोखिमों के बीच किसान लगातार पिसता रहा है।<br/><br/> &bull;&nbsp;लागत घटाने और उपज के उचित मूल्य दिलाने की कृषि नीतियों का सर्वथा अभाव है। घाटे से निकालकर लाभ में तब्दील करने की घोषणाएं कभी नीति नहीं बन पाई। खेती की दशा सुधारने की रणनीति केंद्र व राज्यों के बीच इस कदर उलझी हुई है कि बदहाल किसानों को सही दिशा नहीं मिल पा रही है। तभी तो घाटे व मुश्किलों से जूझते किसान खुदकुशी की हद को छूने लगे हैैं।<br/><br/> &bull;&nbsp;कृषि उपज की बिक्री के लिए जितनी मंडियां उतने कानूनों के होने से हालात और गंभीर हैं। किसान से उपभोक्ता तक कृषि उपज के पहुंचने में बिचौलियों की लंबी शृंखला ने महंगाई तो बढ़ा दी है, लेकिन फायदा किसानों को नहीं मिल पाता है।<br/><br/> &bull;&nbsp;इसी समस्या के समाधान के लिए सरकार ने आम बजट में राष्ट्रीय कृषि बाजार का प्रावधान किया है। लेकिन इसका हश्र भी मॉडल मंडी कानून का हो सकता है, जिस पर डेढ़ दशक बाद भी राज्यों ने अमल नहीं किया है।<br/><br/> &bull;&nbsp; राज्य का विषय होने के नाते समस्या और उलझ गई है। घाटे का सौदा बन चुकी खेती से विपन्न होते किसानों की गुहार सुनने वाला कोई नहीं रहा। तभी तो घाटे की चपत से खुदकुशी करना उसकी नियति बन गई है।<br/><br/> &bull;&nbsp;किसानों को सरकारी मदद के नाम पर दी जाने वाली तरह-तरह की सब्सिडी की बहुत जरूरत नहीं है। उसे चाहिए तो सिर्फ समय पर उन्नत बीज, पर्याप्त खाद, सिंचाई के लिए बिजली, डीजल की आपूर्ति और उपज बेचने के लिए एक अदद बिचौलियों से मुक्त मंडी।<br/><br/> &bull;&nbsp;उसे हर सीजन में नकली बीज, नकली कीटनाशक और ब्लैक में खाद व डीजल खरीदने के लिए बाध्य होना पड़ता है, जिससे वह तंग आ चुका है।<br/><br/> <span style="color:#800000;"><strong><u>Few Facts</u></strong></span></div> <div> &nbsp;</div> <div style="margin-left: 40px;"> <span style="color:#696969;">70% किसानों को सीधे खाते में नकदी जमा (डीबीटी) योजना की जानकारी नहीं।</span></div> <div style="margin-left: 40px;"> <span style="color:#696969;">74% किसानों ने माना कि खेती संबंधी कोई जानकारी कृषि विभाग से उन्हें नहीं मिली।</span></div> <div style="margin-left: 40px;"> <span style="color:#696969;">70% किसानों ने कभी किसान कॉल सेंटर से संपर्क नहीं किया।</span></div> <div style="margin-left: 40px;"> <span style="color:#696969;">19% किसान ही खेती पर सब्सिडी को जारी रखने के पक्ष में।</span></div> <div style="margin-left: 40px;"> <span style="color:#696969;">27% किसानों ने ही भूमि अधिग्रहण कानून के बारे में सुना है।</span></div> <div style="margin-left: 40px;"> <span style="color:#696969;">62% किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य से अनभिज्ञ।</span></div>

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