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संदेह और सराहना के बीच राष्ट्रीय आय के नए आंकड़े

<p> &raquo;&nbsp;केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) ने राष्ट&iuml;्रीय आय के जो नए आंकड़े जारी किए हैं। इसमें एक स्तर पर सीएसओ के आंकड़ों का दायरा बढ़ाने के प्रयासों और देश की सांख्यिकीय आंकड़ों की व्यवस्था (मिसाल के तौर पर सकल घरेलू उत्पाद या जीडीपी) को अन्य देशों के मानकों के करीब लाने को लेकर सराहना का भाव है। लेकिन दूसरी ओर नए आंकड़ों की विश्वसनीयता पर संदेह जताया जा रहा है। यह आलोचना जीडीपी के नए आंकड़ों और आर्थिक गतिविधियों के अन्य संकेतकों के बीच अंतर के कारण उत्पन्न हुई।<br /> <br /> &raquo;&nbsp;देश की अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वाले वैश्विक सलाहकार और यहां तक कि देश के संस्थानों ने भी उन क्षेत्रों की पहचान करने की कोशिश की है जहां नए आंकड़ों और जमीनी हकीकत में विसंगति देखने को मिली है। उदाहरण के लिए इमर्जिंग एडवाइजर्स ग्रुप ने 12 आर्थिक संकेतकों को सूचीबद्घ किया और वर्ष 2005-2006 के उच्च विकास वाले दौर में उनकी हलचल की तुलना वर्ष 2014 की दूसरी छमाही में उनके हालात से की। इन संकेतकों में कृषि और औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े, ऋण विकास, बिजली उत्पादन, सीमेंट उत्पादन, वाहनों की बिक्री, माल ढुलाई में इजाफा, निर्यात, कॉर्पोरेट बिक्री और सूचीबद्घ कंपनियों और सरकार का राजस्व आदि शामिल है। इस तुलना से चौंकाने वाली बातें सामने आईं। अधिकांश संकेतकों पर बाद वाली अवधि यानी 2014 की दूसरी छमाही के आंकड़े वर्ष 2005-2006 के मुकाबले कमजोर रहे।<br /> <br /> &raquo;&nbsp;दलील यह है कि अगर नए सीएसओ आंकड़ों के तहत विकास के आंकड़े बेहतर हैं तो फिर इन आर्थिक संकेतकों की स्थिति में 2005-06 की तर्ज पर सुधार नजर आना चाहिए था। ऐसे में मौजूदा अंतर एक किस्म की पहेली को जन्म देता है। हालांकि कुछ अंतर के लिए तो इस बात को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है कि आर्थिक संकेतक आकार पर निर्भर होते हैं जबकि सीएसओ के आंकड़े मूल्य वर्धन पर आधारित हैं और अब इस काम को और अधिक व्यापक ढंग से अंजाम दिया जा रहा है। इसके बावजूद अंतर को पूरी तरह व्याख्यायित नहीं किया जा रहा है और नए आंकड़ों पर संदेह बना हुआ है।<br /> कुछ घरेलू संस्थानों ने भी इन आंकड़ों को लेकर शंका जताई है। विनिर्माण क्षेत्र की वृद्घि को लेकर तीव्र विचलन जांच के दायरे में है।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; पुराने आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2012-13 में विनिर्माण की वृद्घि दर 1.3 फीसदी थी जबकि वर्ष 2013-14 में इस क्षेत्र में 0.8 फीसदी की कमी आई। अप्रैल-दिसंबर 2014 में इसमें कुछ सुधार हुआ और इसमें 1.2 फीसदी की दर से वृद्धि हुई। लेकिन नए आंकड़ों के हिसाब से देखा जाए तो वर्ष 2012-13 में इस क्षेत्र की वृद्धि दर 6.2 फीसदी रही। वर्ष 2013-14 में यह दर 5.3 फीसदी जबकि 2014-15 के पहले नौ महीनों के दौरान 6.8 फीसदी रही। अगर यह अंतर इस वजह से आया है कि नए आंकड़ों में कारोबारी परिणामों के अधिक व्यापक आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है तो फिर सवाल यह है कि क्या संशोधित आंकड़ों की भलीभांति जांच परख की गई थी।<br /> <br /> &raquo;&nbsp;कुछ और क्षेत्र हैं जिनमें नए आंकड़ों को लेकर असहजता है। उदाहरण के लिए संशोधित आंकड़े बताते हैं कि वित्त, अचल संपत्ति और पेशेवर सेवाओं के क्षेत्र में वर्ष 2014-15 की पहली तीन तिमाहियों में 14 फीसदी की दर से वृद्धि हुई है। सवाल यह है कि अचल संपत्ति क्षेत्र में इतना धीमापन है और पेशेवर सेवाओं में भी अपेक्षित वृद्घि देखने को नहीं मिली है तो फिर इन आंकड़ों में तेजी कहां से नजर आ रही है।<br /> <br /> &raquo;&nbsp;जीडीपी के आकलन के नए तरीके पर भी संदेह जताया गया क्योंकि इसमें वृद्घि दर के आकलन में सकल मूल्यवर्धित आंकड़ों को शामिल करने पर जोर दिया गया। लेकिन अब भी स्पष्ट&iuml; नहीं है कि कीमतों, मूल्यों और आकार में अंतर को नए जीडीपी आंकड़े में कैसे सन्निहित किया जा रहा है।<br /> <br /> &raquo;&nbsp;राजनीतिक रूप से देखा जाए तो जीडीपी के नए आंकड़े सरकार को विकास की स्थिति में सुधार की तस्वीर पेश करने में मदद कर सकते हैं। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पहले ही नए आंकड़ों का इस्तेमाल कर यह दावा कर चुकी है कि देश की अर्थव्यवस्था फिलहाल चीन के मुकाबले तेज गति से विकसित हो रही है। संभव है कि भारत चीन के मुकाबले तीव्र गति से विकसित हो रहा हो लेकिन इस बात पर संदेह करना उचित है कि क्या चालू वर्ष में भारत की विकास दर 7.4 फीसदी से अधिक है।<br /> <br /> &raquo;&nbsp;सीएसओ द्वारा नए आंकड़ों की घोषणा किए छह सप्ताह से अधिक वक्त बीत चुका है। अनेक संदेहों और सवालों के बाद सरकार को अभी भी संतोषजनक स्पष्ट&iuml;ीकरण देना है। सरकार ने नए आंकड़ों को लेकर जिस व्याख्यायित करने वाले नोट की बात कही थी वह अभी भी फलीभूत होना है।<br /> <br /> &raquo;&nbsp;चूंकि पेश किए गए आंकड़ों को लेकर कोई विकल्प नहीं है इसलिए देसी और अंतराष्ट्रीय संस्थान उनको जस का तस मान लेंगे। अगर यह सच होता है तो दुर्भाग्यपूर्ण होगा और देश -विदेश में भारत की विश्वसनीयता को ठेस पहुंचेगी।<br /> &nbsp;</p>

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