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भारत में बढ़ता वायु प्रदूषण: वायु प्रदूषण से नुकसान और उससे निपटने के सुझाव

<p> &raquo;&nbsp; इस तथ्य की ओर लोगों का ध्यान गया है कि यदि भारत अपनी आर्थिक संवृद्धि की रफ्तार को निरंतर बढ़ाता जाय तो प्रदूषण का खतरा बढ़ेगा। इसलिए हमें दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना होगा।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; विशेष रूप से सर्दियों के दिनों में प्रदूषण बहुत बढ़ जाता है और जिन लोगों को सांस की बीमारी है उनका घर से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में दूर तक केवल धुंध ही धुंध दिखता है। पैदल चलने वाले और यातायात नियंत्रित करने वाले मुंह पर पट्टी बांधे रहते हैं कि प्रदूषित वायु से बचें। सुबह स्कूल जाने वाले छात्रों को अपनी कक्षाओं में भी सांस लेने में दिक्कत होती है। आज से दो वर्ष पहले चीन की राजधानी बीजिंग में यही स्थिति थी किन्तु वहां की सरकार ने उसे नियंत्रित करने की दिशा में कदम उठाए और आज वायु-प्रदूषण काफी घट गया है। लंदन से प्रकाशित होने वाली साप्ताहिक पत्रिका &#39;&#39;दी इकॉनमिस्ट&quot; के अनुसार, भारत की राजधानी दिल्ली आज संसार का सबसे प्रदूषित शहर बन गया है।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; भारत सरकार का इरादा है कि अगले तीस वर्षों के दौरान भारतीय आर्थिक संवृद्धि की रफ्तार को चीन के बराबर कर दिया जाय मगर इससे बड़ा खतरा प्रदूषण बढऩे का है। डीजल इंजिन से निकलने वाला गंधकयुक्त धुआं सारे वातावरण को दूषित करता है। सर्दियों के दौरान वह धुआं ऊपर नहीं जा पाता क्योंकि हवा का दबाव नीचे की ओर होता है।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; स्पष्ट है कि मोटर गाडिय़ों, स्कूटरों और मोटरसाइकिलों की अपेक्षा ट्रकों और बसों में निकलने वाला धुआं काफी खतरनाक होता है क्योंकि वे डीजल का इस्तेमाल करती हैं। अन्य वाहन पेट्रोल और प्राकृतिक गैसों से संचालित होते हैं। बीजिंग की तुलना में दिल्ली कहीं अधिक प्रदूषित है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, उनसे यानी ट्रकों और बसों से निकलने वाला प्रदूषण सांस के जरिए फेफड़ों में जाकर धीरे-धीरे लोगों को रोगग्रस्त बना देता है।&nbsp;<br /> <br /> &raquo;&nbsp; विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार बीजिंग की तुलना में पिछले कुछ वर्षों के दौरान दिल्ली की हवा 45 प्रतिशत से अधिक प्रदूषित हो गई है और निरंतर प्रदूषण बढ़ता ही जा रहा है। अब तक सरकार की ओर से उस पर लगाम लगाने के लिए कोई प्रभावकारी कदम नहीं उठाए गए हैं।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; पिछले वर्ष विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया के 1622 शहरों का अध्ययन किया था और पी.एम. 2.5 प्रदूषण की दृष्टि से पाया गया कि 20 अत्यंत प्रदूषित शहरों में से 13 भारत में ही हैं। चीन की तुलना में भारतीय शहर कहीं अधिक प्रदूषित हैं। यहां प्रदूषण का स्तर काफी अधिक है। गाडिय़ों से निकलने वाले प्रदूषण और ईंधन से निकलने वाले धुएं पर कारगर नियंत्रण नहीं किया जा सका है। गांवों की स्थिति बेहतर नहीं है यद्यपि वहां ट्रकों, बसों और गाडिय़ों से प्रदूषण नहीं होता फिर भी वहां उपलों, मिट्टी तेल के स्टोवों तथा केरोसिन के प्रकाश के लिए इस्तेमाल से वायु प्रदूषण बढ़ता है। कहना न होगा कि वहां सांस से जुड़ी बीमारियां बढ़ रही हैं। अनुमान है कि हर वर्ष करीब दस लाख लोग इन बीमारियों से मौत के घाट उतरने को मजबूर होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार दमे की बीमारी न सिर्फ प्रौढ़ों में, बल्कि बच्चों में भी बढ़ती जा रही है। साथ ही कैंसर, हृदय रोग और लकवे का प्रकोप भी बढ़ता जा रहा है। जैसे-जैसे लोगों की उम्र बढ़ती जाती है वे इन बीमारियों के चंगुल में फंसते जाते हैं। घर के अंदर और बाहर हर जगह प्रदूषित वायु ही सांस लेने को मिलती है जिससे हर वर्ष 16 लाख लोग मरते हैं।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; शिकागो विश्वविद्यालय के प्रो. माइकल ग्रीनस्टोन ने चीन में जीवन-अवधि पर प्रदूषित हवा में सांस लेने का अध्ययन किया है। उनके अनुसार, औसतन जीवन अवधि साढ़े पांच वर्ष छोटी हो जाती है। उनके द्वारा भारत के ऊपर प्रकाशित होने वाले लेख में रेखांकित किया गया है कि 66 करोड़ भारतीय विषैली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। यदि तुरंत कदम नहीं उठाए गए तो उनकी जीवन अवधि औसतन तीन से अधिक वर्ष घट जाएगी। संयुक्त राष्ट्र से कभी जुड़े एक विशेषज्ञ का मानना है कि भारत को अपना औद्योगीकरण करते समय इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि वायु प्रदूषित न हो। उन्होंने 1980 से लेकर 2010 तक भारतीय कृषि का अध्ययन प्रकाशित किया है जिसमें बतलाया गया है कि उर्वरकों तथा अन्य रसायनों के इस्तेमाल से ओजोन और अन्य प्रदूषण फैलाने वाले तत्व वायु को प्रदूषित कर लोगों की जीवन-अवधि तो घटाते ही हैं गेहूं जैसी फसलों की औसत पैदावार को एक तिहाई कम कर देते हैं।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; भारत सरकार ने 17 ऐसे उद्योगों को चिन्हित किया है जो सबसे अधिक प्रदूषण फैलाते हैं। वहां उनकी चिमनियों के साथ प्रदूषण संबंधी आंकड़ों को इकट्ठा करने के लिए यंत्र लगाए गए हैं। अब तक केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और अधिकतर शहर इस दिशा में अपेक्षा के अनुकूल सक्रिय नहीं रहे हैं।&nbsp;<br /> <br /> वायु की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए पटना के पास ईंट की भठ्ठियों के साथ उनमें से निकलने वाले धुएं को कम करने के लिए यंत्र लगाए गए हैं। यह प्रयोग यदि सफल होता है तो ऐसा हर भठ्ठी में लगाया जाएगा।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; यह कोशिश होनी चाहिए कि लोग सार्वजनिक यातायात का इस्तेमाल करें मगर उनके समय पर आने और जाने की गारंटी होनी चाहिए। बस, ट्रेन और मेट्रो को आरामदायक बनाना होगा। कहते हैं, कि पूरे भारत में ऐसे पांच प्रतिशत परिवार हैं जिनके पास अपनी मोटर गाड़ी है। अब भी समय है कि सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को विश्वसनीय, आरामदेह और आकर्षक बनाकर लोगों को अपनी गाडिय़ां खरीदने से रोका जाय। भारत में 14 ऐसे शहर हैं जहां मेट्रो रेल का निर्माण आरंभ हो चुका है या जल्द ही होने वाला है।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; यदि लोगों को सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की ओर आकर्षित करने में सफलता मिलती है तो शहरों में भीड़-भाड़ कम होगी और पार्किंग को लेकर झगड़ा-फसाद काफी घटेगा। साथ ही प्रदूषण में कमी आएगी और सर्दियों में सांस की बीमारी से निजात मिलेगी।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; देश के तीन बड़े औद्योगिक राज्यों गुजरात, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में यह प्रयास जारी है कि कारखाने कोयले पर अपनी निर्भरता कम करें और साथ ही प्रदूषण पर लगाम लगाएं। कारखानों को करों में छूट देकर प्रदूषण को कम करने के लिए प्रोत्साहित किया जा एकता है। यदि यह रास्ता प्रभावी नहीं हो पाता तो जुर्माने का रास्ता अख्तियार किया जा सकता है।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; ऐसा सोचना गलत है कि यदि आप आर्थिक विकास के रास्ते पर आगे बढ़ते हैं तो पर्यावण की रक्षा नहीं कर सकते। आर्थिक विकास के साथ-साथ पर्यावरण की गुणवत्ता को बनाए रखा जा सकता है। सरकार का दायित्व है कि वह लोगों को दीर्घकाल तक सुखी जीवन जीने में सहायक बने। शहरों में साफ सफाई की व्यवस्था होनी चाहिए। कहीं भी कूड़ों का अंबार नहीं हो और सड़कों पर घरों के कूड़ेे-कचरे न फेंके जाएं।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; सेंटर फॉर साईंस एंड एनवायरमेंट ने अभी-अभी अपना एक अध्ययन जारी किया है जिसमें कहा गया है कि दिल्ली में पैदल तथा बसों और ऑटो&bull;ा में चलने वाले भारी जोखिम उठा रहे हैं। उन्हें प्रदूषित वायु का सामना करना पड़ता है। दिल्ली में प्रदूषण का स्तर पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। उपर्युक्त संस्था की अध्यक्षा सुश्री सुनीता नारायण का मानना है कि अब तक वायु प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में कोई कारगर कदम नहीं उठाया गया है क्योंकि अफसरशाही ने उसे उलझा रखा है।<br /> <br /> <u><strong><span style="color:#800000;">सुझाव -:</span></strong></u>आए दिन सड़कों पर जाम लगता है जिससे प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है। अनेक सुझाव दिए गए हैं जैसे&nbsp;<br /> <br /> &raquo;&nbsp; डीजल से चलने वाली गाडिय़ों पर करों में वृद्धि की जाए,&nbsp;<br /> <br /> &raquo;&nbsp; सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को इतना कुशल बनाया जाए कि लोगों को बस बदलने के लिए काफी पैदल न चलना पड़े,&nbsp;<br /> <br /> &raquo;&nbsp; शहर में ग्यारह हजार बसों के लक्ष्य को पूरा किया जाय और&nbsp;<br /> <br /> &raquo;&nbsp;नई बसों की पार्किंग की व्यवस्था सुनिश्चित की जाय,<br /> <br /> &raquo;&nbsp; नई गाडिय़ों की बढ़ती संख्या पर रोक लगाने के लिए खरीदारों से पूछा जाय कि वे कहां पार्क करेंगे, फ्री पार्किंग की व्यवस्था समाप्त की जाय, कालोनियों में पार्क करने वालों से पैसे वसूले जाएं, फुटपाथों पर पार्किंग पर पाबन्दी लगे,&nbsp;<br /> <br /> &raquo;&nbsp; प्रदूषण नियंत्रण की जांच सख्त हो और पुराने वाहनों के लिए सख्त कानून बने।<br /> <br /> <span style="color:#696969;">कहते हैं कि भारतीय शासक आज से नहीं, बल्कि अशोक के जमाने से शुद्ध, स्वच्छ वायु को लेकर चिंतित रहे हैं। उनके शिलालेखों में प्राकृतिक परिवेश की रक्षा पर जोर दिया गया है। उदाहरण के लिए जंगलों को जलाकर उनमें बसने वाले जानवरों को नष्ट करने पर सख्त पाबंदी थी।&nbsp;</span></p>

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