Current Details

ई - कचरे से प्रदूषित होते जल, थल और वायु

<p> &raquo;&nbsp; इलेक्ट्रॉनिक कचरे (ई-कचरे) का निपटान आजकल एक प्रमुख समस्या बन गया है। इस प्रक्रिया का एक नजारा गुजरात के तट पर कुछ गांवों में देखा जा सकता है। इस क्षेत्र में कम से कम तीन हजार वर्कशॉप्स में हजारों महिलाएं ऐसे ही ई-कचरे को संभालने, छांटने और ठिकाने लगाने का काम करती हैं। देश में इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के उत्पादन और प्रयोग में जो उछाल आया है, उसके चलते वर्ष 2014 में वहां 70 लाख टन ई-कचरा पैदा हुआ था।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; इसके अलावा यूएसए, ऑस्ट्रेलिया और युरोप से जहाज भर-भरकर ई-कचरा भारत पहुंचता है। वैसे तो भारत में ई-कचरे के आयात पर प्रतिबंध है मगर चोरी-छिपे यह माल पहुंच ही जाता है।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; ई-कचरा कई बहुमूल्य धातुओं का खजाना होता है जिनमें तांबा, सोना, चांदी और सीसा प्रमुख हैं। इनके अलावा वे तत्व भी इस कचरे में खूब होते हैं जिन्हें दुर्लभ मृदा कहते हैं।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; यिट्रियम, युरोपियम, डिसप्रोसियम जैसे नाम वाले ये तत्व उतने दुर्लभ तो नहीं हैं मगर इनके भंडार कुछ ही इलाकों में सिमटे हैं - खास तौर पर चीन में ये बहुतायत से पाए जाते हैं।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; लेकिन इन बहुमूल्य तत्वों को कचरे में से अलग करने की प्रक्रिया पर्यावरण पर घातक असर डालती है। मसलन, इस ई-कचरे को जलाने पर जो प्लास्टिक वगैरह जलते हैं उनकी वजह से हवा प्रदूषित होती है। फिर इस कचरे को तेजाब में पकाया जाता है और यह तेजाब आसपास के नदी-नालों में बहा दिया जाता है।&nbsp;<br /> <br /> &raquo;&nbsp; आसपास के पानी की मछलियों में पोलीक्लोरीनेटेड बाईफिनाइल (पीसीबी) जैसे विषैले पदार्थ पाए गए हैं। इस क्षेत्र के बच्चों के खून में सीसे की भारी मात्रा पाई गई है।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; इन सब समस्याओं को देखते हुए राष्ट्र संघ ने एक कार्यक्रम शुरू किया है - साइकिलिंग ई-वेस्ट प्रॉबलम (स्टेप)। इसके अंतर्गत कोशिश की जा रही है कि ई-कचरे का ढेर कम किया जाए।&nbsp;<br /> <br /> &raquo;&nbsp; खास तौर से इलेक्ट्रॉनिक निर्माताओं से कहा जा रहा है कि वे अपने उत्पादों में हानिकारक रसायनों का उपयोग कम से कम करें। इसके अलावा उन्हें इस बात के लिए भी राजी किया जा रहा है कि वे बेकार हो जाने के बाद अपने उत्पाद के रीसाइकिलिंग को भी संभालें।</p>

Back to Top