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भारत समेत चार देश करते विश्व के आधे भूजल का इस्तेमाल

&raquo;&nbsp; रिपोर्ट के अनुसार भारत, नेपाल, बांग्लादेश और चीन कृषि कार्यों के लिए विश्व के लगभग आधे भूजल का इस्तेमाल करते हैं।<br/><br/> &raquo;&nbsp; एशियाई देशों में सिंचाई के लिए कृषि के इस्तेमाल से अर्थव्यवस्था को 10 से 20 अरब डालर का फायदा होता है।&nbsp;<br/><br/> &raquo;&nbsp; भारत में भूमिगत जल का दोहन 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में बढ़ा है। भारत में 1960 में दस लाख ट्यूबवेल थे, जिनकी संख्या 2000 में बढ़कर 1.9 करोड़ हो गई।<br/><br/> &raquo;&nbsp; 22 मार्च को विश्व जल दिवस से ठीक पहले जारी हुई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में दुनियाभर में पानी की मांग वर्ष 2000 के मुकाबले 2050 में 400 प्रतिशत बढ़ जाएगी। इसलिए उद्योग जगत में भी पानी की खपत कम करने के उपाय करने की जरूरत है।<br/><br/> &raquo;&nbsp;विकासशील देश अगर जल संसाधनों के प्रबंधन में निवेश करे हैं तो उससे उन्हें सीधे रिटर्न प्राप्त होगा।&nbsp;<br/><br/> &raquo;&nbsp; रिपोर्ट के मुताबिक 15 से 30 अरब डालर के निवेश पर लगभग 60 अरब डालर तक रिटर्न मिलेगा।<br/><br/> <span style="color:#800000;">सरकार गंगा संरक्षण पर कर रही कार्य</span><br/> &raquo;&nbsp; भारतीय सभ्यता में जल को देवता के रूप में पूजा जाता है। राष्ट्रीय जल नीति में जल प्रबंधन के लिए समन्वित रीति अपनाई गई है। सरकार गंगा के संरक्षण के लिए कार्य कर रही है, जिस पर देश की 45 प्रतिशत आबादी निर्भर है।<br/><br/><span style="color:#800000;">पर्यावरण और विकास: पर्यावरण की चिंता नीतियों में भी दिखे</span><br/> &raquo;&nbsp; बाजारवाद के इस दौर में विकास का मतलब सरोकारहीन प्रगति है. इनसानी लालसाओं के सामने घटती जमीन के कारण, एक तरफ आसमान को छूनेवाली इमारतें बढ़ रही हैं, तो दूसरी ओर आदमी की निगाह भी धरती से दूर शून्य में कहीं भटक रही है. विकास की ऐसी लालसा मनुष्य को अपने समाज और अपने आसपास के पर्यावरण से विलगाव में डाल रही है. इसके खतरे जीवन में कई स्तरों पर दिखने लगे हैं.<br/><br/> &raquo;&nbsp; जिन्हें ये खतरे नहीं दिखते वो विकास के नाम पर रोज इनसानी सरोकारों की बलि दे रहे हैं. चिली के मशहूर कवि पाब्लो नेरुदा ने अपनी कविता &lsquo;कीपिंग क्वाइट&rsquo; में इस चिंताजनक स्थिति को बहुत गहराई से देखा है. वह कहते हैं :&nbsp;<br/> <div style="margin-left: 40px;"> दोज हू प्रीपेयर ग्रीन वार्स</div> <div style="margin-left: 40px;"> वार्स विद गैस,&nbsp;</div> <div style="margin-left: 40px;"> वार्स विद फायर</div> <div style="margin-left: 40px;"> विक्टरी विद नो सर्वाइवर.&nbsp;</div> <br/><br/> &raquo;&nbsp; यानी कि पर्यावरण के खिलाफ संग्राम छेड़नेवाले/ गैस और आग के शस्त्रों से लैस हो लड़ते हैं/ ऐसी लड़ाई में जीत का जश्न मनानेवाला कोई नहीं बचता.<br/><br/> &raquo;&nbsp; हमें विकास तो करना है, पर साथ ही पर्यावरण का संरक्षण भी करना है.&nbsp;<br/><br/> &raquo;&nbsp; विकास के नाम पर पर्यावरण की बलि के खतरे, उसके दूरगामी संदेश को तभी सुना जा सकता है जब विकास की नीतियों और योजनाओं के कार्यान्वयन में इस चिंता को जगह मिले.<br/><br/> &raquo;&nbsp; हाथी जंगल छोड़ इनसान के आवासीय क्षेत्रों में प्रवेश कर रहे हैं कल अन्य वन्य जीवों के आवास जोखिम में पड़ेंगे तो वे भी हमारे आवासीय इलाकों में ऊधम मचा सकते हैं.&nbsp;<br/><br/> &raquo;&nbsp; वन्य जीवों की रक्षा वन संरक्षण के बिना संभव नहीं. इससे वन संपदा का संरक्षण तो होगा ही, वन्य जीवों का जीवन भी असहज नहीं होगा. प्रकारांतर से मानव जीवन की शांति को खतरा नहीं होगा.&nbsp;<br/><br/> &raquo;&nbsp; कहीं न कहीं पर्यावरण संतुलन को नुकसान से भी बचाया जा सकता है.

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