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ताप बिजली घर: ऊर्जा सुरक्षा, प्रदूषण और पर्यावरण

<p> &raquo; बिजली उत्पादन के लिए कोयले का इस्तेमाल जलवायु परिवर्तन के कारण हो रही दिक्कतों की एक बड़ी वजह है। इसी कारण दुनिया भर के सामाजिक संगठनों ने कोयला इस्तेमाल न करने की अपील की है। नागरिक समाज की इच्छा है कि इसके बजाय नवीकरण्ीय ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाए। फिलहाल स्वच्छ गैस और जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल किया जा सकता है। ऐसे में कोयले से कम नुकसानदेह स्वच्छ ऊर्जा हासिल करने की बात करने का ही कोई अर्थ नहीं है।&nbsp;<br /> <br /> &raquo;&nbsp; लेकिन भारत में ऐसा करना कारगर नहीं होगा। भारत को बड़ी मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता है। आज भी लाखों घर ऐसे हैं जिनको खाना पकाने या रोशनी तक के लिए पर्याप्त ऊर्जा नहीं मिल पा रही है। हमें ऊर्जा तक पहुंच भी सुनिश्चित करनी है और अस्वच्छ ऊर्जा के कारण उत्पन्न पर्यावरण समस्याओं से भी निपटना है।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; भारत को नवीकरणीय ऊर्जा पर भी जोर देना होगा। इसलिए नहीं कि हम कोयले से इतर ऊर्जा से काम चला सकते हैं बल्कि इसलिए क्योंकि ऊर्जा का यह स्रोत हमें विकेंद्रीकरण और बिना ग्रिड की बिजली का विकल्प देता है।&nbsp;<br /> <br /> &raquo;&nbsp; लेकिन कोयले से उत्पन्न ईंधन को स्वच्छ बनाना भी उतना ही अहम है। अगर ऐसा किया जा सकता तो न केवल पर्यावरण को नुकसान कम होगा बल्कि बहुमूल्य इंसानी जिंदगियां भी बचेंगी।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वॉयरनमेंट (सीएसई) ने देश के विभिन्न ताप बिजली घरों का संयंत्र दर संयंत्र अध्ययन कर यह पता लगाया कि उनकी किफायत की दर क्या है, प्रदूषण भार कितना है, कचरे का प्रबंधन किस तरह किया जा रहा है और पर्यावरण मानकों के प्रति उनकी अनुकूलता कैसी है? उनके निष्कर्षों को हीट ऑन पॉवर: ग्रीन रेटिंग ऑफ कोल बेस्ड थर्मल पॉवर प्लांट्स नामक रिपोर्ट में प्रकाशित किया गया।&nbsp;<br /> <br /> &raquo;&nbsp; उनके मुताबिक प्रदर्शन के मामले में हमारे ताप बिजली घर वैश्विक मानकों से बहुत पीछे हैं। इससे भी अधिक अहम बात यह है कि इसमें बिजली क्षेत्र के गंभीर नतीजों की बात कही गई है। भारत में अधिकाधिक संयंत्र लगाने पर जोर दिया जाता है बजाय कि सभी को सस्ती बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित करने के।&nbsp;<br /> <br /> &raquo;&nbsp; जिन 47 संयंत्रों का सर्वे किया गया उनमें से केवल 12 का किफायत स्तर 36 फीसदी से अधिक था जो चीन के औसत के बराबर है। भारत के लिए यह औसत 33 फीसदी था। इसके लिए पुरानी प्रौद्योगिकी और खराब संसाधन प्रबंधन को वजह माना जा सकता है।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; बुरी बात यह है कि पिछले कुछ सालों के दौरान प्लांट लोड फैक्टर में गिरावट देखने को मिली है और वर्ष 2013-14 में यह घटकर 65 फीसदी पर आ गया जबकि वर्ष 2007-08 में यह 79 फीसदी था। इससे मांग और आपूर्ति के बीच अंतर साफ तौर पर नजर आता है। राज्यों की बिजली कंपनियां बिजली खरीदने के लिए संघर्ष कर रही हैं, यहां तक कि सस्ती बिजली खरीदने के लिए भी। इससे संयंत्रों में कार्बन उत्सर्जन प्रभावित होता है।&nbsp;<br /> <br /> &raquo;&nbsp; देश में प्रति मेगावॉट कार्बनडॉयऑक्साइड का औसत 1.08 टन रहा जो कि वैश्विक स्तर पर सर्वश्रेष्ठ&iuml; मानकों की तुलना में 45 फीसदी अधिक था जबकि चीन की तुलना में भी यह 14 फीसदी अधिक था।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; भारत के लिए अवसर है कि वह अपने संयंत्रों को किफायती बनाए और नए संयंत्रों का निर्माण करने के बजाय बेहतरीन तकनीक की मदद से पुराने संयंत्रों को उन्नत बनाए। यह अकेली चुनौती नहीं है। तथ्य यह है कि बिजली संयंत्र हवा को प्रदूषित करते हैं, पानी की खपत करते हैं और भारी मात्रा में कचरा उत्पन्न करते हैं।&nbsp;<br /> <br /> &raquo;&nbsp; भारतीय संयंत्रों को अभी इन सारी कमियों को दूर करने के मामले में लंबी दूरी तय करनी है। यह कोई छोटी मोटी समस्या नहीं है। सभी उद्योगों द्वारा होने वाली कुल स्वच्छ जल निकासी का 70 फीसदी से अधिक इसी क्षेत्र द्वारा इस्तेमाल किया जाता है।&nbsp;<br /> <br /> &raquo;&nbsp; कणों के रूप में होने वाले प्रदूषकों के उत्सर्जन में 60 फीसदी के लिए यह जिम्मेदार है। जबकि सल्फर डायऑक्साइड का 50 फीसदी और पारे के 80 फीसदी उत्सर्जन के लिए यह क्षेत्र जिम्मेदार है। ऐसे में अगर हमें इस क्षेत्र को साफ करना है तो हमें देश के औद्योगिक क्षेत्र के प्रदूषण में तेजी से कमी करनी होगी।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; इसके लिए पहले ऐसे मानक तय करने होंगे जो सख्त हों और जिनमें बेहतर तकनीक और प्रबंधन का इस्तेमाल किया जा सके। इसके बाद निगरानी प्रक्रिया बनानी होगी। सीएसई ने पाया कि अधिकांश संयंत्रों ने या तो प्रदूषण की निगरानी का काम तीसरे पक्ष वाली प्रयोगशालाओं के हवाले कर रखा है या फिर ऑनलाइन उत्सर्जन निगरानी व्यवस्था कायम कर रखी है। लेकिन दोनों मामलों में आंकड़े कमजोर हैं और व्यवस्था का अंकेक्षण तक नहीं हुआ है। यह बात अहम है क्योंकि किसी भी प्रदूषण बोर्ड में यह क्षमता नहीं है कि वह स्पष्ट&iuml; वजहें होने पर भी किसी संयंत्र को बंद कर सके।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; चूंकि हमारे यहां कोयला अच्छी गुणवत्ता वाला नहीं होता है इसलिए सबसे बड़ा मसला है इन संयंत्रों से निकलने वाली राख का लाभप्रद इस्तेमाल। प्रति टन कोयला जलने पर करीब 35-40 फीसदी तो कचरे के रूप में ही निकल जाता है। जरा सोचिए कि बिजली संयंत्र का 40 फीसदी हिस्सा तो राख को एकत्रित करने के लिए ही चाहिए। फिलहाल देश में करीब एक अरब टन राख बगैर इस्तेमाल के पड़ी है और हर साल इसमें 16 करोड़ टन का इजाफा होता है। आज तक हमने जो भी उपाय अपनाए, जैसे सीमेंट-ईंट बनाने में इस्तेमाल आदि, लेकिन इससे खास फायदा नहीं हुआ।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; जाहिर है कि सफाई बहुत आवश्यक है। लेकिन इसके लिए देश के विद्युत क्षेत्र को भी सफाई से पेश आना होगा।</p>

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