Current Details

बांध / बहु उद्देशीय परियोजनाएं और विस्थापन

<p> &raquo;&nbsp; बांध विकास की दृष्टि से कड़वी ही सही, लेकिन एक हकीकत है। यह सवाल भी हकीकत है कि बांध के निर्माण से कितनी मानवीय हानि होती है और कितने पर्यावरणीय नुकसान के बाद वह अस्तित्व में आता है। पर्यावरणविद् चेता रहे हैं कि बांधों से नदियां सूखने लगती हैं, इसके पारिस्थितिकीय खतरे भी हैं। सरकार इसे गैर वैज्ञानिक करार देती है। लेकिन जब चीन ब्रह्मपुत्र पर अपने क्षेत्र में बांध बनाता है तो सरकार चीन को वही तर्क देती है जो पर्यावरणविद् सरकार को देते हैं।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; असल में देश में भाखड़ा नंगल, गांधी सागर, सरदार सरोवर, नर्मदा सागर आदि दशकों पुराने दर्जन भर से भी ज्यादा ऐसे बांध हैं, जिनके विस्थापितों की समस्या आज तक अनुसलझी है। यही नहीं, बांधों के निर्माण में पर्यावरण की रक्षा हेतु जो मापदण्ड निर्धारित किए गए हैं, उनकी भी लगातार अनदेखी की जाती रही है। विश्व बांध आयोग की रिपोर्ट इसका जीता-जागता सबूत है। दरअसल बड़े-बड़े बांधों से होने वाली मानवीय और पर्यावरणीय क्षति का आकलन करने वाले विश्व बांध आयोग की रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ है कि देश में बड़े-बड़े बांधों मे से आधे से ज्यादा ऐसे हैं, जिनमें अनुमानित विस्थापितों की संख्या दुगुनी से भी ज्यादा है।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; बांधों से होने वाली पर्यावरणीय और मानवीय क्षति के आकलन के लिए समूचे विश्व के 125 बड़े बांधों में से भारत के छह बांध हैं, जिनमें भाखड़ा नंगल और गांधी सागर आदि बांध भी शामिल हैं।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; बांधों के मामले में भारत का स्थान दुनिया में तीसरा है। सबसे ज्यादा बांध अमेरिका में और उसके बाद चीन में हं। अकेले भारत में सवा पांच करोड़ के करीब बांध विस्थापित हैं। हमारे यहां भाखड़ा से लेकर विस्थापितों की समस्या का जो सिलसिला शुरू हुआ है, वह नर्मदा तक आज भी थमा नहीं है।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; सब जानते बूझते हुए भी हमारी सरकार पूर्वोत्तर में बांधों का जाल बिछाने जा रही है। देखा जाये तो देश में जनता सरकार के कार्यकाल में सन् 1979 में पहली बार विस्थापितों की समस्या सुलझाने की दिशा में एक ट्रिब्यूनल का गठन किया गया। विस्थापन की भयावहता का इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि गुजरात में सरदार सरोवर परियोजना से मध्य प्रदेश के 193 गांव प्रभावित हैं और इनके लगभग एक लाख साठ हजार से अधिक लोग व मध्य प्रदेश में ही निर्मित इंदिरा सागर परियोजना के 152 गांव प्रभावित हैं, जिनके लगभग एक लाख पचास हजार से अधिक लोग विस्थापित हैं।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; इनके हितों को मद्देनजर रखते हुए चलाये जा रहे आंदोलनों के कर्ता-धर्ता भी इस दर्द को समझ पाने में नाकाम रहे हैं क्योंकि उन्होंने और सरकार ने उनके अंतर्मन की पीड़ा और संवेदनशील पक्ष को कभी समझने का प्रयास ही नहीं किया। उनके लिए विस्थापितों को भौतिक सुविधाएं दिला देना ही उनके कर्तव्य की इतिश्री है।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; दरअसल सरकार यह समझती है कि कानून के अनुसार सार्वजनिक हित में किसी की भी अचल सम्पत्ति का मुआवजा देकर अधिग्रहण किया जा सकता है। उसी तरह विस्थापितों के हितों के लिए काम करने वाली संस्थाएं और लोगों की भी यह धारणा है कि यदि विस्थापितों को सरकार से ज्यादा से ज्यादा मुआवजा, अनुदान, राहत और सुविधाएं दिला दी जाती हैं, तो प्रभावितों को न तो अपनी जमीन छोड़ने का दुख रहेगा और न उन्हें नए पुनर्वास स्थल पर बसने में कोई असुविधा-परेशानी होगी। उनके विस्थापन को देश व समाज की खुशहाली की खातिर कुर्बानी की भावना के तहत प्रमुखता दी जाये तभी विस्थापितों का अपनी जगह से, धरती से कटने का दर्द किसी हद तक कम किया जा सकता है। उस स्थिति में पुनर्वास उनके लिए वनवास नहीं पुन:स्थापन होगा।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; यह भी सच है कि बांधों का निर्माण भी जारी रहेगा। यह भी सच है कि उनसे जितनी बिजली उत्पादन और सिंचाई की अपेक्षा की गई थी, वह भी अधूरी ही रही। एक चौथाई बांध ही अपनी तय सीमा तक पीने का पानी मुहैया करा पाये। जहां बाढ़ नियंत्रण हेतु बांध बनाये गये थे, वे भी डेढ़ फीसदी से ज्यादा कामयाब नहीं हुए। देश में जारी और पूर्वोत्तर में बांध परियोजनाओं के जाल की संभावनाओं को देखें तो विस्थापन की समस्या सुरसा के मुंह की भांति और बढ़ेगी।<br /> <br /> &raquo;&nbsp; विकास का मॉडल बदले बिना बदलाव की उम्मीद बेमानी लगती है।</p> <p> &nbsp;</p>

Back to Top