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देश को चाहिए नवजागरण

<p> भारत का रूपांतरण सरकार के सर्वोच्च एजेंडे पर है। धुरी आर्थिक विकास है। बीसवीं सदी की शुरुआत में अमेरिका, मध्य में सोवियत रूस और सदी के उत्तरार्द्ध में चीन ने विकास की मिसाल कायम की। विकास-यात्रा में तीनों ही महादेशों ने सामान्य मानव जीवन और सामाजिक संबंधों को जर्जर किया। विशाल आबादियों का उत्पीड़न किया।</p> <p> <br /> तीनों देश भले ही विकास के शीर्ष पर पहुंचे हों, पर मानव-जीवन के लिए कोई मिसाल कायम नहीं कर सके। सोवियत रूस ने अपने करोड़ों श्रमिकों की हत्या की, अमेरिका ने विश्वभर में युद्ध थोपे, अपने देश में काली आबादी का भयावह उत्पीड़न किया और जिस दिन चीन से हत्याओं और उत्पीड़न के वास्तविक आंकड़े सामने आ सकेंगे, संसार स्तब्ध रह जाएगा। पूरे विश्व में संचरित होती पूंजी का चक्र अमेरिका और चीन के विकास को धराशायी करेगा ही, पूर्ववर्ती सोवियत संघ को वह कर चुका है।</p> <p> <br /> सारी दुनिया के अर्थशास्त्री इन संकेतों को साफ देख रहे हैं। बेशक, भारत को विकास करना चाहिए पर यह सजगता जरूरी है कि रूपांतरण के लिए आधारभूत पूंजी कुछ और होती है। आर्थिक-विकास से देशों का रूपांतरण नहीं हो सकता। हां, यदि देश का रूपांतरण हो तो विकास जरूर होगा। इतिहास रूपांतरण की इन्हीं मिसालों से भरा पड़ा है। कुछ सदी पहले यूरोप ने जो महाविकास किया, वह पुनर्जागरण काल में हुए यूरोप के सामाजिक-वैचारिक रूपांतरण का परिणाम था। भारत विकास को रूपांतरण समझने की भूल दूसरी बार करने जा रहा है।</p> <p> <br /> आजादी के बाद नेहरू ने अकेले नहीं, समूचे भारतीय सत्ता-तंत्र ने, यह मान लिया था कि भारी उद्योगों और पंचवर्षीय योजनाओं के जरिये देश विकसित हो कर रूपांतरित भी हो सकेगा। सदियों की बेहिसाब औपनिवेशिक लूट, गरीबी, अकाल, विभाजन की अतिजटिल पृष्ठभूमि के बीच इस तर्क का ऐतिहासिक औचित्य भी था और इसने भारत को अपने पैरों पर काफी हद तक खड़ा भी किया, उसे निर्मित किया, पर देश का रूपांतरण यह नहीं कर सका।</p> <p> <br /> दरअसल भारत को रूपांतरण की नहीं नवजागरण की जरूरत है। भारत, धार्मिक गुलामी, औपनिवेशिक मानस, अमानवीय वर्णव्यवस्था, स्त्री-पराधीनता, रूढ़िवाद, कुप्रथाओं का विशाल आगार है। यह ग्रामीण और पिछड़े भारत की ही नहीं, हमारे विकसित, शहरी, समृद्ध भारत की भी वास्तविकता है। सरकारों को राज्य-व्यवस्था गतिशील रखनी होती है और विकास ही इस गतिशीलता को बनाए रखने वाला सबसे कारगर ईंधन होता है। नवजागरण समाज की आवश्यकता है।</p> <p> <br /> &nbsp;समाज ही इसे अपने भीतर से पैदा कर सकता है। भारत में भी सदी भर पहले नवजागरण की हवाएं बही थीं। राजा राममोहन राय, दयानंद, विवेकानंद, रवींद्रनाथ, गांधी ने भारतीय मानस को रूपांतरित किया था। इतिहास कभी खुद को नहीं दोहराता। हमें विवेकानंद और गांधी की न पुनरावृत्ति की प्रतीक्षा करनी चाहिए और न यह आवश्यक है। आवश्यक तो सिर्फ एक बात है कि हम यह जानें कि हम कैसे व्यक्ति हैं? हम स्वयं सरकारी विकास का प्रचार-तंत्र हैं या नवजागरण की जरूरत महसूस करने वाला समाज?<br /> &nbsp;</p>

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