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स्टीफेन कारबोनियर:-कार्टूनिस्ट, जो था अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे बड़ा

<p> आतंकी हमले में शार्ली एब्दो के संपादक और ख्यात कार्टूनिस्ट स्टीफेन कारबोनियर की मौत हो गई। दरअसल, आतंकियों के निशाने पर सबसे पहले स्टीफेन ही थे।</p> <p> <br /> कारण भी साफ है। स्टीफेन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सबसे बड़े पैरोकार थे। वे अपनी लकीरों के माध्यम से धर्म और राजनीति समेत समाज के हर पहलू पर निशाना साधते थे। इसके चलते उन्हें कई बार धमकियां भी मिलीं, लेकिन तमाम खतरों के बावजूद वे मैग्जीन की रीति-नीति बदलने के लिए तैयार नहीं हुए।</p> <p> <br /> उन्होंने कहा था कि घुटनों के बल जीने के बजाय खड़े रहकर मरना पसंद करुंगा...और आखिरी में ऐसा हुआ।</p> <p> <br /> कथिततौर पर इस्लाम विरोधी कार्टून बनाने पर मिली धमकियों के बाद उन्होंने 2012 में एसोसिएट प्रेस से साफ कहा था, मैं फ्रांसीसी कानून के तहत रहता हूं, न कि कुरान के कानून के तहत। स्टीफेन कई चरमपंथी गुटों के साथ-साथ अलकायदा के भी निशाने पर भी थे। अलकायदा की हिट लिस्ट में वह नौवें नंबर पर थे। यह लिस्ट इस संगठन की मैग्जीन में उनके फोटो के साथ छपी थी।</p> <p> <br /> हमले के समय 47 वर्षीय स्टीफेन मैग्जीन के दफ्तर में ही थे और अपने साथी कर्मचारियों के साथ बैठक कर रहे थे। धमकियों के बाद उनकी सुरक्षा में एक पुलिसकर्मी नियुक्त किया गया था। आतंकियों ने उसे भी अपना निशाना बना दिया।</p> <p> <br /> <strong><u>2012 में बने थे संपादक:-</u></strong></p> <p> स्टीफेन बीस वर्षों से शार्ली एब्दो मैग्जीन से जुड़े थे। उन्हें 2012 में इसका संपादक बनाया गया था। उससे पहले मई 2009 तक उन्होंने बतौर निदेशक सेवाएं दी थीं। 1960 से राजनीतिक और धार्मिक मसलों पर व्यंग्य करने वाले स्टीफेन ने 2011 के हमले के बाद ले मोंडे अखबार को बताया था, मेरी पत्नी नहीं है, बच्चे नहीं हैं, कार नहीं है, किसी का उधार भी नहीं है। चाहे जो जाए, लेकिन मैं घुटने टेकने के बजाए अपने पैरों पर खड़ा होकर मरना पसंद करूंगा।<br /> &nbsp;</p>

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