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प्रवासी भारतीय दिवस और प्रवासियों की भारत से आशाएं

<p> गुजरात के गांधीनगर में 13वें प्रवासी भारतीय दिवस से जुड़ा समारोह आयोजित हुआ। तीन दिन तक चलने वाले इस समारोह में तीन हजार से भी अधिक प्रवासी प्रतिनिधियों ने अपनी हिस्सेदारी की। भारतीय मूल के लोगों को एक साझा मंच देने और उन्हें सम्मानित करने के लिए प्रत्येक वर्ष नौ जनवरी को प्रवासी भारतीय दिवस मनाया जाता है।</p> <p> <br /> इस बार यह समारोह ऐसे समय में आयोजित किया गया है जब महात्मा गांधी के 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के 100 साल पूरे हो रहे हैं।</p> <p> <br /> आंकड़े बताते हैं कि आज पूरी दुनिया के 200 देशों में लगभग ढाई करोड़ से अधिक प्रवासी भारतीय हैं। फिलहाल इनको तीन प्रकार की श्रेणियों में रखा जा सकता है।</p> <p style="margin-left: 40px;"> <br /> 1). एक तो वे हैं जिनकी पीढिय़ां भारत को छोड़कर फिजी, मारिशस, टिनिडाड, टोबैगो, मलेशिया, ट्यूनीशिया व दक्षिण अफ्रीका आदि देशों में बस गए हैं। इनके भारत छोड़ते समय इनकी काफी कमजोर स्थिति थी, परंतु आज वे सभी बेहतर स्थिति में हैं।<br /> 2). दूसरे वे लोग है जो नौकरी के सिलसिले में खाड़ी आदि के देशों में आते-जाते रहते हैं। ये भारत के ही मूल नागरिक हैं। ये लोग बड़ी मात्रा में अपनी बचत को भारत भेजते हैं।<br /> 3). तीसरी श्रेणी में वे लोग आते हैं जो अपेक्षाकृत बहुत संपन्न हैं। ये अमेरिका और आस्ट्रेलिया में बसे हैं। ये वे प्रवासी भारतीय हैं जिनके भारत में निवेश करने की बहुत उम्मीदें हैं। इन लोगों ने भारत को छोड़ा ही इसलिए था, क्योंकि इन्हें यहां काम करने का अच्छा माहौल नहीं मिला, परंतु अपने देश के प्रति कुछ करने की ललक इनमें आज भी मौजूद है।</p> <p> <br /> आज दुनिया के 200 देशों में भारतीय मूल के लोग रहते हैं। इनमें सबसे अधिक अमेरिका और खाड़ी के देशों में हैं। जहां तक विश्व में इनकी मूल संख्या का सवाल है तो अमेरिका में इनकी संख्या 22 लाख, ब्रिटेन में 15 लाख, दक्षिणी अफ्रीका में 12 लाख, कनाडा में 10 लाख, मारिशस में 9 लाख, यूरोप में 8 लाख तथा आस्ट्रेलिया में साढ़े चार लाख है। पिछले पांच वर्षों से अनिवासी भारतीयों द्वारा अपने मूल देश को पैसा भेजने के मामले में भारत आज दुनिया का अव्वल देश है। आंकड़े बताते हैं कि प्रवासी भारतीय जितना धन भेजते हैं वह भारत में कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से भी अधिक है।</p> <p> <br /> समाजशास्त्रीय शोध बताते हैं कि विदेशों में बसे भारतीय मूल के लोगों के हृदय में भारत की अस्मिता और राष्ट्रीयता का अहसास यहां के लोगों की तुलना में अधिक है। मोदी सरकार ने भारतवंशियों के यहांआने में जो अड़चनें आती हैं उनको कम करने का काम किया है। वाजपेयी सरकार के समय दो योजनाएं-पीआइओ यानी पर्सन ऑफ इंडियन ओरिजिन और ओसीआइ यानी ओवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया) शुरू हुई थीं। सरकार ने प्रवासी भारतीयों के सम्मेलन से एक दिन पहले ही इन दोनों योजनाओं का विलय करने का अध्यादेश जारी भी कर दिया है।</p> <p> <br /> प्रवासी भारतीयों की यह भी इच्छा है कि भारत में उनके लिए संपत्तियां खरीदने के नियमों का सरलीकरण हो। यहां उन्हें उद्योग लगाने में नौकरशाही की बाधाओं से छुटकारा मिलते हुए रियायतें भी मिलें। उनकी एक अन्य महत्वपूर्ण इच्छा दोहरी नागरिकता को लेकर भी है। उनका मतलब है कि जिस देश में वे रह रहे हैं उसके अलावा भारत में भी उन्हें मतदान का अधिकार हासिल हो। उन्हें भारत में अपनी समस्या सुलझाने के लिए अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार हो। वाजपेयी सरकार ने उन्हें दोहरी नागरिकता का अधिकार देने का वायदा भी किया था, परंतु भारत का संविधान अनुमति नहीं देता है। आज स्थिति यह है कि अगर किसी भारतीय ने किसी दूसरे देश की नागरिकता ले भी ली है तो उसे भारतीय नागरिकता छोडऩी होगी। आज दुनिया के चालीस देशों में ऐसे लोगों को दोहरी नागरिकता प्राप्त है।</p> <p> <br /> सच्चाई यह है कि ये भारतवंशी भारत के लिए आज बहुत बड़े संसाधन हैं। कई बार यह भी देखने में आया है कि भारतीय मूल के ये लोग अपने राष्ट्र और यहां की राष्ट्रीयता से सीधे जुडऩा ही नहीं चाहते, बल्कि भारत में भारी निवेश करने के इच्छुक भी हैं। देश को आशा है कि इस बार का यह प्रवासी भारतीय सम्मेलन विश्व में फैले भारतवंशियों को देश से जोडऩे और प्रधानमंत्री की राष्ट्रवादी रचनात्मक मुहिम को और अधिक सशक्त बनाने में एक नया आयाम जोड़ेगा।<br /> &nbsp;</p>

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