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ग्रीस में फिर आर्थिक संकट की आहट से यूरोप में आर्थिक अस्थिरता का खतरा

<p> <strong>ग्रीस में फिर आर्थिक संकट की आहट से यूरोप में आर्थिक अस्थिरता का खतरा (सुबीर गोकर्: आरबीआई के पूर्व डिप्टी गवर्नर)</strong></p> <p> ग्रीस में नई सरकार के कमान संभालने के बाद उसके यूरोक्षेत्र से बाहर निकलने की संभावनाओं से जुड़ी थी। अपनी कायाकल्प की योजना को सिरे चढ़ाने में इस देश के सामने आ रही मुश्किलों को मद्देनजर रखते हुए यह बमुश्किल ही हैरान करने वाला है। हैरानी हो या नहीं लेकिन यूरोक्षेत्र से बाहर निकलने का संभावित खतरा कुछ दिनों तक वैश्विक वित्तीय बाजारों में व्यापक उथलपुथल के लिए काफी था। मगर जैसे-जैसे चीजें कुछ साफ हुईं तो कुछ राहत सी नजर आई लेकिन हमें किसी भी सूरत में यह नहीं सोचना चाहिए कि मामला यहीं रफादफा हो गया। वर्ष 2010 में वैश्विक स्तर पर बड़ी अस्थिरता पैदा करने के बाद एक बार फिर सभी की नजरें ग्रीक अर्थव्यवस्था पर टिक गई हैं।</p> <p> <br /> इन चिंताओं को अगर एक दृष्टि&iuml;कोण का रूप दें तो हमें पिछले कुछ वर्षों में ग्रीक अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन का जायजा लेना होगा। इस अवधि में कुछ दौरान यह यूरोपीय संघ, यूरोपीय केंद्रीय बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की तिकड़ी द्वारा तैयार योजना के तहत चली। वर्ष 2010 में जीडीपी में 5.4 फीसदी की गिरावट आई, वर्ष 2011 में 8.9 फीसदी की कमी आई, 2012 में 6.6 फीसदी की गिरावट आई तो वर्ष 2013 में जीडीपी में गिरावट की दर 3.3 फीसदी रही।</p> <p> <br /> वर्ष 2014 में जीडीपी में कोई बदलाव आने का अनुमान नहीं है जो पिछले कुछ वर्षों में गिरावट के आंकड़ों को देखते हुए शायद एक तरह से अर्थव्यवस्था में सुधार का सूचक हो। क्या इसका अर्थ यही है कि अर्थव्यवस्था सुधार की डगर पर है? शायद ऐसा हो लेकिन जब आप इस तथ्य पर गौर करते हैं कि अब जीडीपी का आकार वर्ष 2009 की तुलना में एक चौथाई कम हो गया हो तो ग्रीक नागरिकों का अपनी आर्थिक स्थिति और संभावनाओं को लेकर हुआ मोहभंग आसानी से समझा आता है।</p> <p> <br /> अर्थव्यवस्था के नाजुक पहलू दूसरे कई पैमानों पर भी नमूदार होते हैं। बेरोजगारी की दर लगभग 26 फीसदी है। युवाओं में बेरोजगारी तकरीबन 50 फीसदी है। कामकाजी वर्ग का लगभग 20 फीसदी दीर्घावधिक बेरोजगारी के तहत आता है, जिन्हें एक साल से ज्यादा से काम नहीं मिला। राजकोषीय घाटा जीडीपी के 12 फीसदी से अधिक है तो वहीं कर्ज-जीडीपी अनुपात भी 175 फीसदी है। ग्रीक नागरिकों के नजरिये से ये ऐसे हालात नजर आते हैं जहां जीवन स्तर में कोई वास्तविक सुधार आने में, यहां तक कि वर्ष 2010 से पहले की स्थिति तक आने की रफ्तार काफी सुस्त होगी और अनिश्चित होने के साथ ही उसका वितरण भी अनिश्चित होगा। ऐसे में मौजूदा आर्थिक ढांचे की प्रतिबद्घता बहुत कमजोर होगी। वास्तविकता से उलट दावे, जिसमें यूरोक्षेत्र से बाहर निकलने के वैकल्पिक परिदृश्य में हालात और बदतर होने की आशंका जताई जा रही है, उनमें संभवत: बहुत दम नजर नहीं आता।</p> <p> &nbsp;</p> <p> आखिर दो वैकल्पिक चक्रों की तुलना कैसे की जा सकती है? यहां तक कि गूढ़ पैमानों के आधार पर भी नतीजों और समयावधि का अनुमान लगाना जोखिम भरा है लेकिन व्यापक रुझान देखे जा सकते हैं। यूरो व्यवस्था में बने रहने की कुंजी सॉवरिन कर्ज को काबू में रखने की क्षमता है, जिसमें कर्ज-जीडीपी अनुपात में एक सतत कमी की राह तलाशनी होगी। इसे हासिल करने का सीधा सादा रास्ता यही है कि जीडीपी की वृद्घि दर निश्चित रूप से वास्तविक ब्याज दरों की तुलना में तेज होनी चाहिए।</p> <p> &nbsp;</p> <p> पिछले कुछ वर्षों में ब्याज दरें जहां शून्य फीसदी के आसपास हैं और मुद्रास्फीति की दर नकारात्मक एक फीसदी हैं, जबकि वृद्घि दर का पहले ही जिक्र किया जा चुका है तो यह स्थिति संतोषजनक होने से काफी दूर है। हालांकि वर्ष 2014 में जहां मुद्रास्फीति और ब्याज दरों का परिदृश्य कमोबेश वैसा ही रहेगा, वृद्घि दर में तेजी आती दिख रही है, यहां तक कि पिछले चार वर्षों के रुझान को देखते हुए शून्य वृद्घि भी खासी उल्लेखनीय मानी जाएगी! अगर यह स्थिति कायम रहती है तो यूरोप के लिए अपेक्षित मुद्रास्फीति और मौद्रिक नीति चक्र को देखते हुए इसे सॉवरिन कर्ज बोझ पर लगाम लगानी चाहिए।</p> <p> <br /> &nbsp;हालांकि इस कायाकल्प के जीवन की गुणवत्ता के लिहाज से बहुत ज्यादा मायने नहीं हैं। भारी सरकारी कर्ज में कमी का एक फायदा यही मिल सकता है कि अर्थव्यवस्था कुछ सरकारी सेवाओं के जारी रखने की स्थिति में आ सकती है लेकिन निश्चित रूप से सेवाओं में यह बहाली संकट से पूर्व की स्थिति के स्तर पर नहीं की जा सकती। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो एक वृहद आर्थिक स्तर पर एक सकारात्मक रुझान शायद यथास्थिति के लिए राजनीतिक समर्थन जुटाने के लिहाज से संभव न हो।</p> <p> <br /> जहां तक यूरोक्षेत्र से बाहर निकालने का सवाल है ग्रीस को सबसे बड़ा फायदा तो यही होगा कि उसकी नई नवेली राष्ट&iuml;्रीय मुद्रा का यूरो के मुकाबले जबरदस्त अवमूल्यन होगा। जैसा कि अक्सर दर्शाया गया कि एक मुद्रा संघ में प्रवेश के साथ घरेलू वृहद आर्थिक स्थिति और विनिमय दरों के बीच संतुलन बिगडऩे का जोखिम बढ़ जाता है। ग्रीस के साथ ही यूरोक्षेत्र के कई देश पिछले कुछ वर्षों में इस असंतुलन से संघर्ष कर रहे हैं। इसके उलट पोलैंड, हंगरी और चेक गणराज्य जैसी अर्थव्यवस्थाएं हैं, जो यूरोपीय संघ का हिस्सा तो हैं लेकिन वे उससे मौद्रिक रूप से जुड़ी हुई नहीं हैं, उन्होंने संकट के बाद की स्थिति में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया है, इसकी एक अहम वजह यही रही कि उनकी मुद्रा यूरो के सापेक्ष चलती रही।</p> <p> <br /> ग्रीक विनिमय दरों में तेज गिरावट के स्पष्ट&iuml; विस्तारवादी प्रभाव होंगे क्योंकि इससे पर्यटन सहित ग्रीक निर्यात अचानक अधिक आकर्षक बन जाएंगे। हालांकि शेष यूरोप में अपेक्षाकृत सुस्त मांग के चलते यह प्रभाव हवा हो जाए क्योंकि किसी भी सूरत में शेष यूरोप ही ग्रीस का सबसे बड़ा व्यापार साझेदार होगा। हालांकि कमजोर विनिमयय दरें हमेशा फायदा नहीं देतीं। निश्चित रूप से इससे आयात महंगे हो जाते हैं, जिससे मुद्रास्फीति में तेजी आती है, जो कुछ समय के बाद अधिक प्रतिस्पर्धी विनिमय दर के कुछ फायदों को बराबर कर देंगे।</p> <p> <br /> एक संरचनात्मक दृष्टि&iuml;कोण से चार से अधिक वर्षों की गिरावट के साथ बेहद कम नया निवेश शायद विनिमय दरों के मोर्चे पर बने अवसर का लाभ उठाने में घरेलू उत्पादकों की संभावनाएं सीमित कर दे। ऐसे में लागत का असर तुरंत पड़ेगा जबकि फायदे न तो निश्चिंत हैं और न ही उनके तुरंत मिलने की संभावना। लब्बोलुआब यही है कि ग्रीक नागरिकों के सामने कोई स्वाभाविक विकल्प नहीं है। बहरहाल यूरोक्षेत्र से बाहर निकलने की संभावनाओं से वैश्विक बाजारों में मची हलचल शायद इसके किसी स्पष्ट&iuml; प्रभाव को लेकर बनी किसी सहमति के अभाव में पैदा हुए डर का प्रतिबिंब हो। यह तथ्य कि चीजें बेहद तेजी से स्थिर होती हैं, वे हिचकिचाहट के नजरिये को सहारा देती हैं।</p> <p> <br /> बाजार में निरंतर अस्थिरता व्यापार और निवेश पर बुरा असर डाल सकती है लेकिन वर्ष 2008 की तुलना में वित्तीय और जिंस बाजारों में अब ऐसे प्रभावों के लिहाज से संवेदनशीलता कम हो गई है। आखिरकार ग्रीक लोगों को उस विकल्प के बारे में सोचना होगा, जो उन्हें सबसे ज्यादा अपना हितकारी लगे। तीन पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के अनुभव के आधार पर सोचें तो ग्रीस और कुछ अन्य अर्थव्यवस्थाओं के लिए कस्टम यूनियन यानी सीमा शुल्क संघ का विचार सबसे बेहतर होगा। यह वैश्विक स्तर पर भी कम हलचल मचाएगा।<br /> &nbsp;</p>

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