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अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा कीजिये।

<p> <span style="color:#800000;">अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा कीजिये।</span></p> <p> &raquo;&nbsp; अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की यह यात्रा लंबे समय तक याद रहेगी, क्योंकि इसमें अनेक ऐतिहासिक आयाम जुड़े। ऐसा पहली बार हुआ जब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारतीय गणतंत्र दिवस परेड में मुख्य अतिथि के तौर पर भाग लिया।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; पहली बार यह भी हुआ कि व्हाइट हाउस से किसी व्यक्ति ने अपने कार्यकाल में दो बार भारत की यात्रा की। इस यात्रा का संदर्भ कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। एक वर्ष पहले 2014 की शुरुआत में दोनों देशों के बीच न्यूयार्क में एक भारतीय महिला राजनयिक देवयानी खोबरागड़े के साथ चिंताजनक व्यवहार किए जाने के कारण द्विपक्षीय रिश्तों में बहुत कड़वाहट आ गई थी।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; यदि ओबामा की यात्रा की समीक्षा करें तो हम बहुत ही मिले-जुले राजनीतिक और कूटनीतिक संकेत देख सकते हैं, जिसमें प्रतीकवाद भी है और यथार्थ के धरातल पर कुछ ठोस प्रगति भी। ओबामा की इस यात्रा से भारत-अमेरिकी रिश्तों में नई ऊर्जा का प्रसार हुआ है।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; ओबामा की यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण बात रही कई वषरें से रुके पड़े नागरिक नाभिकीय करार पर दोनों देशों के बीच परस्पर सहमति बनने की घोषणा। यह समझौता 2008 के उत्तरार्ध से ही लटका हुआ था। भारत द्वारा जवाबदेही वाले प्रावधान और अमेरिका की तरफ से परमाणु संयत्रों की निगरानी की व्यवस्था की मांग इस समझौते को अंतिम रूप देने में बाधक बनी हुई थी, लेकिन ये दोनों ही मसले उच्च स्तर पर दोनों शासनाध्यक्षों के राजनीतिक हस्तक्षेप से सुलझा लिए गए।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; इसके साथ ही दोनों देशों के आगे बढ़ने की राह में बाधा बनी बातें तो दूर हो गई हैं, लेकिन आगे का रास्ता अभी भी अनिश्चित है। ऐसा इसलिए, क्योंकि दोनों देशों के बीच नागरिक परमाणु व्यापार को अर्थपूर्ण बनाने के लिए अभी भी बहुत काम किया जाना शेष है।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; इस समझौते का एक सकारात्मक असर दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय सहयोग और अन्य संभावनापूर्ण क्षेत्रों में भी पड़ना तय है।<br /> &raquo;&nbsp; संयुक्त रूप से तीन अन्य दस्तावेजों अथवा घोषणापत्रों को भी जारी किया गया है। इनमें मित्रता का दिल्ली घोषणापत्र, एशिया-प्रशांत क्षेत्र के लिए संयुक्त सामरिक विजन और हिन्द महासागर क्षेत्र से जुडे़ घोषणापत्र शामिल हैं।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; संभावनाओं वाले दो अन्य क्षेत्रों पर भी ध्यान केंद्रित किया गया, जिनमें स्वच्छ ऊर्जा के लिए परस्पर सहयोग को लिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त वैकल्पिक ऊर्जा स्नोतों जैसे सौर ऊर्जा, जैव ईंधन आदि के लिए अमेरिका नई तकनीक मुहैया कराएगा ताकि भारत इस क्षेत्र में आगे बढ़ सके।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; इसी तरह रक्षा व्यापार और तकनीक के क्षेत्र में भी अमेरिका भारत को सहयोग करेगा।भारत को नवोन्मेषी तकनीकों के साथ-साथ निवेश की तात्कालिक आवश्यकता है।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; यदि भारतीय पक्ष मेक इन इंडिया पर बल दे रहा है तो राष्ट्रपति ओबामा अमेरिकी आर्थिक और सामरिक हितों की संभावनाओं को तलाश रहे हैं।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; संक्षेप में कहें तो सामाजिक-आर्थिक और मानव सुरक्षा में सुधार के लिहाज से भारत का बल लाखों लोगों की जीवनदशा में सुधार करना है और इसके लिए पर्यावरणीय दृष्टि से स्वच्छ ऊर्जा विकल्प सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। भारत में ऊर्जा समस्याएं गहन हैं।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; भारत के रक्षा और सैन्य साजो-सामानों के आधुनिकीकरण की अत्यधिक आवश्यकता है। इसके कारण विदेशी सैन्य हथियारों के आयात पर हमारी निर्भरता अत्यधिक है। इस दिशा में जो व्यापक संकेत हैं वे यही बताते हैं कि आगामी दशक में भारत अपने रक्षा खर्च के लिए 600-700 अरब डॉलर आवंटित करेगा।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; इसमें से 40 फीसद हिस्सा अधिग्रहण और आधुनिकीकरण पर खर्च होगा। मोदी सरकार ने भी इस बात के संकेत दिए हैं कि वह स्वदेशी उत्पादन पर पर्याप्त ध्यान देगी और भारत का जोर डिजाइन क्षमता हासिल करने पर भी होगा। हालांकि परंपरागत रूप से भारत का रूस के साथ मजबूत रक्षा संबंध रहा है, लेकिन अमेरिका के निजी क्षेत्र के साथ तालमेल बनने से भारतीय निर्माण क्षेत्र को बल मिलेगा और साइबर, अंतरिक्ष और समुद्री मामलों में नई संभावनाओं का आयाम खुलेगा।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; ओबामा की यात्रा के दौरान जिस बात पर सर्वाधिक ध्यान दिया गया वह एशिया-प्रशांत और भारतीय महासागर क्षेत्र को लेकर संयुक्त सामरिक विजन दस्तावेज है। सामरिक दृष्टि से यह बहुत ही महत्वपूर्ण घटनाक्त्रम है। जहां तक इस मसले की बात है तो विगत समय में समिति स्तर पर काफी काम किया गया था, जिस कारण भारत और अमेरिका के बीच सहभागिता का नया स्वरूप बनाने में मदद मिली और इसे मूर्त रूप दिया जा सका।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; इससे भारत और अमेरिका 21वीं शताब्दी के शुरुआती दशकों की अनिश्चितताओं का प्रबंधन कर सकेंगे। चीन का उभार एक वैश्रि्वक चिंता की वजह है।<br /> &nbsp;</p>

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