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अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें तेजी से गिरावट के कारणों पर विश्लेषण कीजिये।

<p> &raquo;&nbsp; पिछले आठ माह में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें तेजी से गिरी हैं। जून 2014 में ब्रेंट क्रूड ऑयल की दर 115 डॉलर प्रति बैरल थी, जो अब 47 डॉलर से भी नीचे पहुंच गई है।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए यह गिरावट बड़ी राहत लेकर आई है। इससे अर्थव्यवस्था के संकेतकों में सुधार देखने को मिला है और उपभोक्ताओं को पेट्रोल व डीजल सस्ते दामों पर मिल रहा है।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; वहीँ ईरान और रूस जैसे बड़े तेल निर्यातक देशों के लिए यह गिरावट दु:स्वप्न साबित हो रही है, उनकी अर्थव्यवस्था चरमरा गई है।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; तेल की कीमतों में गिरावट एक हद तक अनपेक्षित ही थी। इसमें ओपेक का रवैया भी हमारे लिए आश्चर्य लेकर आया, खासतौर पर सऊदी अरब का रुख, जो तेल के उत्पादन में कटौती पर राजी नहीं हुआ।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; सऊदी अरब को मांग के मुताबिक तेल के उत्पादन में घटत-बढ़त करने वाले देश के रूप में जाना जाता है। जब तेल के दाम गिरते हैं तो यह उत्पादन घटा देता है, किंतु इस बार इसने ऐसा नहीं किया।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; कहा जा रहा है कि सऊदी अरब अपने दुश्मन ईरान की आर्थिक रीढ़ तोड़ना चाहता है।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; साथ ही अमेरिका के साथ मिलकर वह रूस को सबक सिखाना चाहता है।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; यह भी माना जा रहा है कि पिछली बार जब उसने तेल का उत्पादन घटाया था तो उसकी बाजार में हिस्सेदारी घट गई थी और हालात सामान्य होने के बाद भी वह उसकी भरपाई नहीं कर पाया था। इसीलिए इस बार वह कोई खतरा मोल नहीं ले रहा है।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; इसके अलावा चर्चा ऐसी भी है कि तेल के दाम कम करके वह अमेरिका के तेल उद्योग को हतोत्साहित करना चाहता है। अमेरिका कुछ ही वषरें में हाइड्रोकार्बन का विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक बनने की राह पर है।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; इस बार सऊदी अरब वेनेजुएला और ईरान जैसे ओपेक सदस्यों के दबाव में नहीं आया और उसने तेल का उत्पादन घटाने का प्रस्ताव पास नहीं होने दिया। अगली ओपेक बैठक मई माह में होगी। तभी पता चलेगा कि सऊदी अरब दूसरे राउंड में भी कामयाबी हासिल कर पाता है या नहीं।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp;इसके अलावा चीन की विकास दर में करीब डेढ़ प्रतिशत की कमी आ गई है और अनुमान है कि अब यह कुछ समय के लिए 7 से 7.25 के बीच रहेगी।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; 28 सदस्यीय यूरोपीय संघ में विकास कुंद हो गया है और इसकी सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था जर्मनी की विकास दर डेढ़ प्रतिशत पर सिमट गई है।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; अमेरिका ने जरूर दोबारा जोर पकड़ा है, किंतु साथ ही वहां तेल और गैस की आपूर्ति में खासा विस्तार हुआ है। आज अमेरिका क्रूड आयल का सबसे बड़ा उत्पादक बन चुका है। यह स्थिति कम से कम एक दशक तक बनी रहने वाली है।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; अमेरिका के अलावा गैर ओपेक समूह के अन्य देशों, जैसे कनाडा और इराक में उत्पादन बढ़ा है। लीबिया में आपूर्ति सुचारू हुई है। भारी पैमाने पर तेल का उपभोग करने वाले देशों के अलावा शेष तमाम अर्थव्यवस्थाएं अधिक ऊर्जा संपन्न हुई हैं, खासतौर पर उद्योग और परिवहन के क्षेत्र में।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; कुल मिलाकर यही लगता है कि जून 2014 से अब तक तेल के दामों में 60 प्रतिशत की गिरावट के पीछे संरचनात्मक पहलू हैं और ये कुछ समय तक ऐसे ही बने रहेंगे।<br /> &nbsp;</p>

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