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सेहत को अधिकार बनाने की आवश्यकता

<p> &bull;&nbsp; हर देश चाहता है कि उसके सब नागरिक सेहतमंद व कार्यशील हों। अक्सर ऐसा हो नहीं पाता, क्योंकि कई देशों की काफी बड़ी आबादी न्यूनतम जरूरी सुविधाओं के अभाव में जीती है।</p> <p> <br /> &bull;&nbsp; ऐसी अभावग्रस्त आबादी के लिए रोटी, कपड़ा व मकान की जद्दोजहद और इनकी आपूर्ति के बीच हमेशा एक फासला बना रहता है। लोग इस न्यूनतम जिंदगी जीने की कशमकश में सेहत को खराब कर बैठते हैं। ऊपर से स्वास्थ्य सेवाओं के खुद बीमार होने से उनकी कार्यशीलता भी घटती चली जाती है।</p> <p> <br /> &bull;&nbsp; प्रस्तावित राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन का जो मसौदा सामने आया है, उसके बाद इन मुद्दों पर चर्चा जरूरी हो जाती है। इस मसौदे में शिक्षा के अधिकार की तर्ज पर स्वास्थ्य को भी लोगों का बुनियादी अधिकार बनाए जाने की मांग की गई है।</p> <p> <br /> &bull;&nbsp; यानी यदि कोई किसी को स्वास्थ्य के बुनियादी हक से वंचित करता है, तो वह दंड का पात्र बन सकता है। इस मसौदे में जन स्वास्थ्य खर्च को जीडीपी के मौजूदा 1.2 प्रतिशत से बढ़ाकर 2.5 प्रतिशत करने का प्रस्ताव है।</p> <p> <br /> &bull;&nbsp; वैसे, 2002 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में जीडीपी का दो प्रतिशत हेल्थकेयर पर खर्च करने की बात कही गई थी। पर वह लक्ष्य अभी तक प्राप्त नहीं हो सका है। वैश्विक स्तर के स्वास्थ्य से जुड़े आकड़ों से साफ है कि ब्रिटेन में स्वास्थ्य पर खर्च जीडीपी का 9.8 प्रतिशत, कनाडा में 11.4 प्रतिशत, जर्मनी में 11.7 प्रतिशत, फ्रांस में 11.9 प्रतिशत और अमेरिका में 17.6 प्रतिशत किया जाता है। इसका 40 प्रतिशत भार केंद्र सरकार वहन करेगी। इसमें निजी क्षेत्र को भी बड़ी भूमिका देने की बात है।</p> <p> <br /> &bull;&nbsp; आंकड़े बताते हैं कि स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च के हिसाब से दुनिया के 184 देशों की सूची में भारत का स्थान 178वां है। औसतन 2000 लोगों पर देश में मात्र एक ही डॉक्टर है। इस मामले में हम कई निम्न आय वाले देशों, जैसे बांग्लादेश, नेपाल व श्रीलंका से पीछे हैं। देश में अगर स्वास्थ्य सेवाएं बढ़ी भी हैं, तो उनमें 75 फीसदी हिस्सा निजी क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाओं का है।</p> <p> <br /> &bull;&nbsp; परंतु इनमें अधिकांश सेवाएं नगरों व महानगरों तक सीमित हैं। दूसरी ओर, देश की विशाल आबादी आज भी इलाज के लिए झोलाछाप डाक्टरों की शरण में जाने को मजबूर है।</p> <p> <br /> &bull;&nbsp; सरकारी प्राथमिक चिकित्सा केंद्र या तो बंद ही रहते हैं या वहां स्वास्थ्य सेवा देने के कोई व्यवस्था नहीं होती।</p> <p> <br /> &bull;&nbsp; दूसरी समस्या यह है कि चिकित्सा की पढ़ाई करने वाले नौजवान डॉक्टर शपथ लेने के बावजूद गांव की ओर रुख नहीं करते। आम आदमी की सेहत के लिए बनाई जाने वाली नई स्वास्थ्य नीति का लाभ तभी है, जब इसका लाभ समाज के आखिरी छोर तक पहुंचे। इसकी योजना बनाना आसान है, पर इसे हकीकत बनाना बहुत बड़ी चुनौती है।</p> <p> <br /> &bull;&nbsp; अगर सरकार ने इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने का एक अच्छा और प्रभावी तंत्र विकसित कर लिया, तो यह बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।<br /> &nbsp;</p>

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