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नए साल में सोशल मीडिया की चुनौतियां

<p> &bull;&nbsp; भारत में सोशल मीडिया के विस्तार में 2014 का अहम योगदान रहा। &lsquo;फेसबुक&rsquo; के उपयोक्ता भारत में ही 11 करोड़ से अधिक हो गए, जबकि &lsquo;टि्वटर&#39; से बहती सूचनाओं और ख़बरों ने मुख्यधारा के मीडिया पर जमकर चर्चा बटोरी।</p> <p> <br /> &bull;&nbsp; प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोशल मीडिया पर न केवल खासे सक्रिय रहे बल्कि उन्होंने आम चुनावों में सोशल मीडिया का जैसा इस्तेमाल किया, उसने बाकी दलों के बड़े राजनेताओं को सोचने के लिए विवश कर दिया कि कहीं सोशल मीडिया पर पिछड़ना भी तो उनकी हार की बड़ी वजह नहीं रहा?</p> <p> <br /> &bull;&nbsp; लेकिन, सवाल 2014 का नहीं 2015 का है। नरेंद्र मोदी सोशल मीडिया का बेहतरीन इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन क्या हाशिए पर पड़े लोग सोशल मीडिया के मंचों के जरिये प्रधानमंत्री और आला नेताओं तक अपनी बात पहुंचा पा रहे हैं? नए वर्ष में इस पर बहस होनी चाहिए कि कैसे हाशिये पर पड़े लोग भी सूचना-तकनीक के जरिये अपनी बात मुख्यधारा में ला सकें। सोशल मीडिया के जरिये परवान चढ़ने वाले सामाजिक सरोकारों की बात होनी चाहिए। अच्छी बात यह कि &lsquo;आइस बकेट चैलेंज&rsquo; की तर्ज पर भारत में &lsquo;राइस बकेट चैलेंज&rsquo; शुरू हुआ, जिसे सीमित कामयाबी भी मिली। नए साल में इस तरह के नए प्रयोग जमकर होने चाहिए ताकि सोशल मीडिया सिर्फ सूचनाएं देने-लेने या मनोरंजन से आगे निकल सके।</p> <p> <br /> &bull;&nbsp; नए साल में सबसे बड़ी चुनौती है सोशल मीडिया आतंकवाद। बीते वर्ष ने जाते-जाते सोशल मीडिया का आतंकवाद से जिस तरह सिरा जोड़ा है, वो न सिर्फ डराने वाला है बल्कि सोचने को मजबूर करता है कि क्या हम सोशल मीडिया आतंकवाद से निपटने को तैयार हैं? बेंगलुरू का मेहदी मसरुर बिस्वास इस्लामिक स्टेट यानी आईएस का टि्वटर खाता संचालित करता दिखा।</p> <p> <br /> &bull;&nbsp; भारत में आभासी दुनिया में आतंक की यह नई कहानी थी। अगर मेहदी मसरुर ने ब्रिटेन के चैनल फोर को इंटरव्यू देकर खुद झंझट मोल न ली होती तो भारतीय खुफिया एजेंसियों को शायद उसकी भनक नहीं लगती। बेंगलुरू में बीते रविवार को कोकोनट ग्रोव रेस्तरां के बाहर विस्फोट हुआ तो उसकी जिम्मेदारी आतंवादियों ने ट्विटर पर ली।</p> <p> <br /> &bull;&nbsp; आईएस ने क्रूरता की नई हदें पार करते हुए ट्विटर का इस्तेमाल कर जॉर्डन के बंधक पायलट की हत्या करने के तरीकों पर सुझाव मांगे। उसके समर्थकों ने अरबी भाषा में लिखे गए एक पोस्ट को हजारों बार री-ट्वीट भी किया।</p> <p> <br /> &bull;&nbsp; सोशल मीडिया आतंकवाद एक नया &lsquo;फिनोमिना&rsquo; है और सच यही है कि अभी हम इसकी न गंभीरता समझ पाए हैं और न निपटने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।<br /> &nbsp;</p>

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