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भारतीय शिक्षा प्रणाली गुणवत्ता विहीन और कमजोर:असर (एनुअल स्टेटस आफ एजुकेशन)रिपोर्ट और वस्तुस्थि

<p> &bull;&nbsp; गैर-सरकारी एजेंसी असर (एनुअल स्टेटस आफ एजुकेशन) रिपोर्ट बताती है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले पांचवीं स्तर के केवल 48.1 फीसदी विद्यार्थी और आठवीं स्तर के केवल 75 फीसदी विद्यार्थी ही कक्षा दो की किताबें पढ़ पाते हैं।</p> <p> <br /> &bull;&nbsp; शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद से स्कूली बच्चों के नामांकन में खासा वृद्धि हुयी है, परन्तु सरकारी स्कूलों की तुलना में प्राइवेट स्कूलों में बच्चों का नामांकन लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 2013 में जहां 49 फीसदी बच्चे निजी स्कूलों में जा रहे थे। वहीं 2014 में इनकी संख्या बढ़कर 51.7 फीसदी हो गयी है।</p> <p> <br /> &bull;&nbsp; उत्तर प्रदेश, बिहार, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, जम्मू कश्मीर, उत्तराखण्ड जैसे राज्यों में निजी स्कूलों में प्रवेश लेने वाले बच्चों की संख्या में 35 से 40 प्रतिशत बढ़ोतरी हुयी है।</p> <p> <br /> &bull;&nbsp; यदि दक्षिण के कुछ राज्यों को छोड़ दिया जाये तो अन्य सभी राज्यों में सरकारी स्कूलों की दशा निराशाजनक है। ग्रामीण क्षेत्रों के भी अभिभावक भी मानने लगे हैं कि प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाई अच्छी होती है। इस बदहाली के लिए सरकारी रीति-नीति ही जिम्मेदार है। राजनीतिक दखल व भ्रष्टाचार के चलते योग्य शिक्षक नहीं चुने जाते। शिक्षा मित्र योजना के तहत भर्ती का अधिकार जब से पंचायतों के हवाले किया गया है, उसमें सिर्फ और सिर्फ जोड़-तोड़ को ही बढ़ावा मिला है।</p> <p> <br /> &bull;&nbsp; उत्तर भारत के राज्यों में पंचायती राज व्यवस्था में नागालैण्ड की तरह परिपक्वता नहीं आ पायी है, जहां पंचायती राज्य बेहतर शिक्षा को भावी पीढ़ी के लिए जरूरी मानती है। बेहतर शिक्षक की नियुक्ति एवं पढ़ाने की शैली के साथ-साथ अनुशासन पर भी जोर देती है। यही वजह है कि पिछले कुछ सालों से नागालैण्ड में निजी स्कूलो के भी बच्चे सरकारी स्कूलों की तरफ आ रहे हैं।</p> <p> <br /> &bull;&nbsp;उत्तर भारत के सरकारी स्कूलों की खस्ता हालत की वजह भर्ती की प्रक्रिया और स्कूली शिक्षा पर पंचायतों का प्रभुत्व को माना जाता है। केन्द्र सरकार ने स्कूली शिक्षा की बदतर स्थिति को देखते हुये राज्य सरकारों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया और उन्हें कड़े मानदंड अपनाने की हिदायत दी।<br /> शिक्षा के अधिकार कानून के प्रभावी होने के तकरीबन 3 से अधिक साल बाद भी राज्य सरकारें गम्भीर नहीं हैं। राज्यों में बड़ी संख्या में शिक्षकों के पद आज भी रिक्त पड़े हैं। ऐसी परिस्थितियों में देश की प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता का अनुमान स्वत: ही लगाया जा सकता है।</p> <p> <br /> &bull;&nbsp; देश में प्राथमिक शिक्षा की बढ़ी मांग के अनुरूप अनुमानित बजट का प्रावधान नहीं किया जाता है। राज्य सरकारें सदैव ही बजट की कमी बताते हुए अल्प वेतन अथवा ठेके पर शिक्षा कर्मियों की भर्ती करके प्राथमिक शिक्षण की खानापूर्ति करती है।</p> <p> <br /> &bull;&nbsp;देश की आजादी के बाद राष्ट्रीय विकास के लिए जिस विदेशी माडल का अनुकरण किया गया, उसने हमारी मातृभाषा से जुड़ी प्राथमिक शिक्षा की पृष्ठभूमि को गर्त में धकेल दिया। यदि सरकार ध्यान दे और शिक्षकों का सही ढंग से चयन करे तो वर्तमान स्थिति को निश्चित ही सुधारा जा सकता है। देश में शिक्षा की सूरत में सुधार के लिए जितनी भी कवायदें की गयीं, उनमें सबसे ज्यादा जोर दाखिलों पर दिया गया। इसके लिए विशेष अभियान भी चलाये गये। इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि माध्याह्न भोजन, यूनिफार्म, साइकिल, छात्रवृत्ति के लालच से सरकारी स्कूलों में प्रवेश बढ़े है। यहां सवाल यह उठता है कि क्या प्राथमिक शिक्षा का उद्देश्य मात्र स्कूलों में प्रवेश वृद्धि तक ही सीमित रहना चाहिए? देश की प्राथमिक शिक्षा में योग्य व प्रतिबद्ध शिक्षकों और इसके बुनयादी तंत्र को श्रेष्ठता के आधार पर विकसित करने की जरूरत है।</p> <p> <br /> &bull;&nbsp; प्राथमिक शिक्षा देश की रीढ़ है, माध्यमिक शिक्षा उस विकास की रीढ़ को स्तंभित करने का माध्यम है और उच्च शिक्षा राष्ट्र के विकास को उत्कृष्टता की ओर ले जाने वाली संस्था है। उच्च शिक्षा के स्तर में भी भारत की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। आखिर प्राथमिक शिक्षा के बगैर सुधरे उच्च शिक्षा की स्थिति अच्छी कैसे हो सकती है? शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने के लिए सबसे पहले प्रारम्भिक शिक्षा के मुख्य घटक&mdash;विद्यार्थी, विद्यालय, अध्यापक एवं शिक्षा प्रबंध प्रणाली को समझना चाहिए।</p> <p> <br /> &bull;&nbsp; शिक्षा प्रबंध प्रणाली शिक्षा के विभिन्न नीतियों और कार्यक्रमों को संचालित करती है। गुणवत्ता के लिए इन सभी घटकों पर समग्र रूप से प्रयास करने होंगे। इसमें सबसे महत्वपूर्ण घटक है शिक्षा प्रबंध प्रणाली, चूंकि यह शिक्षा की संरचना एवं मानव संसाधन पर सीधा प्रभाव डालती है। प्रबंध प्रणाली का रोल विद्यालयों के निरीक्षण एवं पर्यवेक्षण में भी महत्वपूर्ण है।</p> <p> <br /> &bull;&nbsp; एक अन्य एवं महत्वपूर्ण आयाम आकादमिक सपोर्ट का होता है, जहां शिक्षक को सीखने-सिखाने के विभिन्न अभिनव प्रयोगों से अवगत कराया जाता है। यह प्रयोग विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर किये जाते हैं, जिससे पढ़ने सीखने की प्रक्रिया त्वरित एवं प्रभावी हो सके।<br /> &nbsp;</p>

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