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कन्या भ्रूण हत्या की रोकथाम:- मानसिकता में बदलाव आवश्यक

<p> <span style="color:#800000;">&quot; आसमां छूने की है आस, गर मिल जाए थोड़ा-सा विश्वास।&quot;</span><br /> &raquo;&nbsp;हमारी संस्कृति में जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी को समाज ने किसी काल में आत्मसात किया होगा। पीढ़ी-दर-पीढ़ी जननी के महत्व को समाज मन में संजोता रहा। परंतु समय के किसी मोड़ पर कुछ सामाजिक कार्यों से ही बेटियां बोझ लगने लगीं।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; फिर बिना सोचे-समझे बेटियों को पैदा होने के बाद सौरगृह में ही नमक चटाकर मार देने का छिटपुट अभ्यास देखा-सुना गया।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; परंतु जब विज्ञान ने गर्भ में ही बेटा और बेटी का परीक्षण कर लेने का ईजाद ढूंढ़ लिया और समाज के पढ़े-लिखे उच्च वर्ग में एक बच्चा जनमाने का मन बना, तो गर्भ परीक्षण के बाद बेटियों की भ्रूण हत्याएं होने लगीं। एक बच्चा हो, तो बेटा चाहिए।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; आर्थिक दृष्टि से धनाढ्य व शैक्षणिक दृष्टि से उत्तम श्रेणी के लोगों के भाव और व्यवहार ग्रामीण जीवन तक पहुंच गए। समस्या और भयानक हो गई। निदान ढूंढ़ते नहीं मिलता। समाज, सरकार और परिवार कन्या भ्रूण हत्या रोकने की कोशिश करके भी सफल नहीं हो रहा है।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; दरअसल, स्वतंत्रता के बाद बेटा-बेटी को बराबरी के दंगल में खड़ा कर दिया गया है। हमारे समाज में बेटी को विशेष मानकर ही सारी सुविधाएं दी जाती थीं। विशेष इसलिए कि वह जननी है, समाज के लिए पुरुष से ज्यादा महत्वपूर्ण कार्य करती है। बराबरी के दंगल ने यह भाव मिटा दिए और समाज में बेटी असुरक्षित होती गई। फिर कौन और क्यों चाहे बेटी? समाज के मन में बेटी को विशेष मानकर प्रस्थापित करने की आवश्यकता है।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; वह विशेष थी, विशेष रहेगी। प्रकृति ने उसे विशेष बनाकर भेजा, संस्कृति ने उसे विशेष दायित्व दिए हैं। यदि समाज बेटी की विशेष शिक्षा, विशेष सुरक्षा, विशेष स्वास्थ्य व्यवस्था की गारंटी लेता है, तो निश्चित रूप से भ्रूण हत्याएं रुक जाएंगी।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; इसलिए बेटियों को विशेष मानकर नीतियां और कार्यक्रम बनें, समाज उनको आत्मसात करे, तो जननी जनमेगी ही, जन्मी बेटियां जी भी पाएंगी।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; गर्भ में बेटियों को पाल रही माताओं को यह विश्वास होना चाहिए कि उनकी बेटियों को घर से लेकर आसमां तक सुरक्षित परिवेश मिलेगा। फिर तो बेटियां जनमेंगी ही।</p> <p> <br /> &raquo;&nbsp; पुरुषों का एक पुरुषार्थ स्त्री की रक्षा करना भी है। आवश्यक है इनके पुरुषार्थ को जगाना।</p> <p> <br /> -<span style="color:#800000;">&quot; इसलिए बेटी का सम्मान करें हम, जन्में तो अभिमान करें हम।&quot;</span><br /> &nbsp;</p>

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