मातृसत्तात्मक व्यवस्था बेहतर

क्या मातृसत्तात्मक व्यवस्था में विवाह-संस्था अधिक सुदृढ़ और समर्थ होती? यदि ऐसा होता, तब हमारा समाज भ्रूण हत्या, दहेज हत्या एवं बलात्कार जैसे अपराधों से कितना मुक्त होता?

हां. मानव-संस्कृति की शुरुआत मातृ-सत्तात्मक व्यवस्था से हुई थी, क्योंकि स्त्री के पास ही गर्भ-धारण करने का और एक नये जीव को इस पृथ्वी पर लाने का अधिकार है. किंतु जैसे-जैसे समय व्यतीत होता गया, पुरुष ने गौर किया कि स्त्री शारीरिक संरचना में कमतर और कोमल है. उसको मासिक-धर्म, जन्म देते समय कष्ट सहने पड़ते हैं और तब वह कमजोर हो जाती है. शिकार करते समय और दुश्मनों के साथ लड़ाई में भी उसका काम नहीं होता, तो उसका वर्चस्व क्यों?

पुरुष वर्चस्व का नशा इक्कीसवीं सदी तक ऐसा बढ़ गया है कि स्त्रियों का शिक्षित-सक्षम-आत्मनिर्भर होना, उनका बौद्धिक और आक्रामक होना, उनका दमन व अवमानना को नकारना पुरुष सत्ता को चुभने लगा है. ऐसी संस्थाएं येन-केन-प्रकारेण स्त्री को काबू करना चाहती है. और इसकी सबसे सटीक लाठी है स्त्री को अपमानित करना. बलात्कारी पुरुष प्रेमी, पति. सगा-संबंधी या अराजक तत्व भी हो सकता है, लेकिन निष्पात एक ही है- उसके निजत्व के सम्मान को चोट पहुंचाना. मातृ-सत्तात्मक समाज में ऐसे उदाहरण काफी कम मिलते हैं.
हमारे देश में ही केरल, पूर्वोत्तर के प्रदेश और कुछ कबीलाइ गुटों में यह व्यवस्था आज भी लागू है. चूंकि ऐसे समाज की स्त्रियां अपनी अस्मिता और आत्मनिर्भरता पर वर्चस्व करती है, इसलिए वे समाज की दूसरी स्त्रियों के प्रति अधिक संवेदनशील और उदार हैं. वे उनकी समस्याएं अधिक संवेदनशीलता से समझ सकती हैं और मददगार व उदार होती हैं. पुरुष अहमन्यता को नकारती वह स्त्री-भ्रूण-हत्या को तरजीह नहीं देकर स्त्री को अवसाद से बचा लेती हैं और ऐसा समाज एक बेहतर मानव-संस्कृति का उदाहरण पेश करता है, जो सराहनीय है.

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