कचरे से ऊर्जा समृद्धि की नयी राह

• शहरीकरण और औद्योगिकीकरण सभी विकासशील देशों के विकास का आधार बन रहें हैं और साथ ही भारत के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं । हालांकि इन दोनों पहलुओं की विकास में काफी महत्वपूर्ण भूमिका है लेकिन इसके कारण कचरे की समस्या भी पैदा हो रही है। वास्तव में यह समस्या बहुत ही बड़ा रूप ले रही है क्योंकि यह कचरा प्रदूषण का स्रोत बन रहे हैं।

•  ज़्यादातर कचरा जो पैदा होता है वह भूमि को समतल बनाने (लैंडफिल) तथा जल निकायों में चले जाते हैं। अत: इनका सही तरीके से निपटान नहीं होता है तथा यह मिथेन और कार्बन डायओक्साइड जैसी ग्रीन हाउस गैसों के स्रोत बनते हैं। कचरे का निपटान करने से पहले उनको सही ढंग से संसाधित करने तथा उनका ऊर्जा के उत्पादन में इस्तेमाल करने से इस समस्या में सुधार हो सकता है। इसमें दो स्तरीय दृष्टिकोण अपनाने की ज़रूरत है जिसमें न केवल अपशिष्ट का निपटान पर्यावरण के अनुकूल हो सकेगा बल्कि साथ ही साथ प्रदूषण कम करने और विकास की ज़रूरतों के लिए आवश्यक ऊर्जा का उत्पादन भी हो सकेगा। ऐसी कई पद्धतियां हैं जिससे कचरे के जरिए ऊर्जा का उत्पादन हो सकता है।

बायोमिथेनेशन

• सबसे पहला है अवायवीय (ऐनरोबिक) बायजेशन या बायोमिथनेशन। इस पक्रिया में जैविक कचरे को अलग किया जाता है तथा उसे बायो गैस डायजेस्टर में डाला जाता है। मिथेन से संपन्न बायोगैस का उत्पादन करने के लिए अवायवीय स्थितियों में इस कचरे का अपशिष्ट बायोडिग्रेडेशन होता है। इस तरह से पैदा हुर्इ बॉयोगैस का इस्तेमाल खाना पकाने, बिजली पैदा करने आदि में हो सकता है। इस प्रक्रिया के दौरान बने चिपचिपे पदार्थ का इस्तेमाल खाद के रूप में किया जा सकता है।

कम्बशन/ इन्सिनेरेशन

• अगली प्रक्रिया कम्बशन/इन्सिनेरेश है। इस पद्धति में उच्च तापमान पर ( लगभग 800 सी) कचरे को औक्सीजन की प्राचुर्य मात्रा में सीधे रूप से जलाया जाता है। इससे जैविक पदार्थ के ऊष्म तत्व 65-80 प्रतिशत तक गरम हवा, भाप तथा गरम पानी में तब्दील होते हैं। इसक जरिए पैदा हुई भाप का इस्तेमाल स्टीम टर्बाइन में बिजली पैदा करने के लिए हो सकता है।

पायरॉलिसिस/ गैसिफिकेशन

- पायरॉलिसिस/गैसिफिकेशन एक अन्य प्रक्रिया है जिसमें जैविक पदार्थों का ऊष्म के जरिए रायासनिक अपघटन होता है। जैविक पदार्थ को हवा की अनुपस्थिति या हवा की सीमित मात्रा में तब तक गरम किया जाता हे जब तक कि उनका गैस के छोटे मॉलिक्यूल में अपघटन न हो जाएं ( जिसे सम्मिलित रूप से सिनगैस कहते हैं )। 

• उत्पादित गैस को प्रोड़यूसर गैस कहते हैं जिसमें कार्बन मानोक्साइड (25 प्रतिशत), हाइड्रोजन तथा हाइड्रोकार्बन(15 प्रतिशत), कार्बन डायोक्साइड और नाइट्रोजन (15 प्रतिशत) गैस सम्मिलित होती हैं। बिजली पैदा करने के लिए प्रोड्यूसर गैस को इंटरनल कम्बशन जेनरेटर सेट या टर्बाइन में जलाया जाता है।

लैण्डफील गैस रिकवरी:-

• लैण्डफील गैस रिकवरी कचरे से गैस प्राप्त करने का एक अन्य उपाय है, जिसमें लैण्डफील गैस तैयार करने के लिए कचरा धीरे-धीरे सड़ता रहता है। इस गैस में मिथेन की अत्यधिक मात्रा (लगभग 50 प्रतिशत) होती है और इससे काफी गर्मी निकलती है, जो लगभग 4500 किलो कैलरी/प्रतिघन मीटर होती है। इसलिए इसका इस्तेमाल रसोई के लिए और बिजली तैयार करने में किया जा सकता है।

प्लाजमा आर्क :-

• विशेषकर खतरनाक और रेडियोसक्रियता वाले कचरे को निपटाने के लिए प्लाजा आर्क अपेक्षाकृत एक नई प्रौद्योगिकी है। चूंकि ऊर्जा का उत्पादन करते समय इस प्रक्रिया में कचरा लगभग पूरी तरह से नष्ट हो जाता है, इसलिए यह एक कम प्रदूषण वाली प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में नाइट्रोजन और सल्फा के ऑक्साईड नहीं बनते हैं और केवल जहरीला राख बच जाता है जिसे हटाना आसान होता है। हालाकि यह प्रौद्योगिकी महंगी है और भारत में इसके लिए कोई प्रयास नहीं किया गया।

" ऊर्जा के लिए कचरे के इस्तेमाल के लाभ:-

• ऊर्जा के लिए कचरे के इस्तेमाल एक अन्य महत्वपूर्ण लाभ यह है कि इससे उन महानगरो में लैंडफील के लिए मांग में कमी होती है, जहां भूमि की कमी है। 

•  इससे कचरे के परिवहन पर आने वाली लागत में भी कमी होती है। 

• कुछ मामलों में इससे एक सह-उत्पाद के रूप में उर्वरक का उत्पादन भी हो सकता है। किन्तु फिलहाल ये प्रौद्योगिकियां महंगी हैं। इसके बावजूद भी इनका आयात किया जा रहा है। विभिन्न प्रौद्योगिकियों के आधार पर कचरे से ऊर्जा तैयार करने की परियोजनाओं के लिए प्रति मेगावाट लागत अधिक होती है।

• एक अनुमान के अनुसार देश में शहरी, पालिका संबंधी और ओद्योगिकी कचरों से 3600 मेगावाट बिजली तैयार करने की संभावना है और वर्ष 2017 तक यह बढ़कर 5200 मेगावाट हो सकती है।

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