डायरेक्ट कैश ट्रांसफर: खाते में पैसा तो गरीबों की बेहतरी

• सरकार चंडीगढ़ व पुडुचेरी में राशन की दुकानों के मार्फत वितरित किए जाने वाले सबसिडीयुक्त खाद्य पदार्थों में कैश ट्रांसफर्स की प्रक्रिया का समावेश करने की योजना बना रही है। 

• यह खाद्य-आर्थिकी के प्रबंधन और सबसिडी पर होने वाले खर्च पर अंकुश, दोनों ही अर्थों में एक महत्वपूर्ण कदम होगा। गौरतलब है कि वित्त वर्ष 2015-16 में सबसिडी पर होने वाला खर्च एक लाख 24 हजार 419 करोड़ रुपया बताया जा रहा है।

• कैश ट्रांसफर दो तरह से फायदेमंद होगा। 

1. अव्वल तो इससे सबसिडी राशि के लीकेज की समस्या से निजात मिल सकेगी, जो कि एक अनुमान के मुताबिक कुल राशि का 50 फीसद है! 
2. दूसरे इससे सबसिडी पर होने वाले खर्च पर भी अंकुश लगेगा और इससे विभिन्न् अनुमानों के मुताबिक सालाना 25 से 30 हजार करोड़ रुपए बचाए जा सकेंगे।


• डायरेक्ट कैश ट्रांसफर यह सुनिश्चित करेगा कि सबसिडी का पैसा सीधे हितग्राहियों के बैंक खातों तक पहुंचे, जैसा कि एलपीजी सबसिडी की पहल योजना के तहत किया गया है। इससे खाद्यान्न् के राशन की दुकानों से बाजार में पहुंच जाने का खतरा भी समाप्त होगा।

कैश ट्रांसफर से सबसिडी-व्यय में कमी कैसे आएगी? 
सबसिडी के तहत न केवल किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रदान किया जाता है, बल्कि खाद्यान्न् के अधिग्रहण और वितरण (मालभाड़ा, संग्रहण, रखरखाव, ब्याज इत्यादि) पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत गेहूं और चावल पर सरकार द्वारा व्यय की जाने वाली राशि का 32 प्रतिशत खर्च हो जाता है! एक रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के मुताबिक सरकार हितग्राहियों तक सबसिडीयुक्त अनाज पहुंचाने में जितना खर्च करती है, वह उसी गुणवत्ता के खाद्यान्न् की बाजार दरों से भी अधिक है। कैश ट्रांसफर से यह 32 प्रतिशत व्यय समाप्त हो जाएगा।

सरकार ने कैश ट्रांसफर को संपूर्ण रूप से अमल में लाने में दो महत्वपूर्ण समस्याओं को भी रेखांकित किया। 

1. पहली यह कि अगर लोग सीधे बाजार से जाकर खाद्यान्न् खरीदने लगेंगे तो फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (एफसीआई) के अधिग्रहीत खाद्य भंडारों का क्या होगा? 
2. क्या इससे खाद्यान्न् का न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी अधिग्रहण बंद हो जाएगा? उस स्थिति में किसानों का क्या होगा?


• शांता कुमार, जिन्होंने एफसीआई के ढांचे में बदलाव लाने के लिए गठित एक समिति की अध्यक्षता की थी और जिन्होंने अपनी रिपोर्ट में धीरे-धीरे कैश ट्रांसफर पर शिफ्ट होने की अनुशंसा की थी, के पास इस सवाल का जवाब है। वे कहते हैं कि किसानों की मदद और खाद्य सुरक्षा के लिए खाद्यान्न्ों का भंडार, दोनों मकसदों से अधिग्रहण जारी रहना चाहिए। और जितना भी अतिरिक्त खाद्यान्न् अधिग्रहीत हो, उसे बाजार के विनियमन के लिए समय-समय पर तब-तब बाजार में जारी किया जाता रहे, जब-जब कीमतों में उछाल आए या कालाबाजारी के जरिये कीमतों में उछाल की स्थिति निर्मित की जाए। शायद यह इतना आसान साबित न हो, जैसा कि सुनने में लग रहा है, फिर भी इस सुझाव पर एक बार गंभीरता से विचार जरूर किया जा सकता है।

• दूसरी समस्या यह है कि कैश ट्रांसफर के हितग्राही बाजार से जो खाद्यान्न् खरीदेंगे, उसकी गुणवत्ता और मात्रा को कैसे सुनिश्चित किया जाए। 

• कैश ट्रांसफर के विरोधी अकसर यह तर्क देते रहे हैं कि लोग इस पैसे का शराब इत्यादि में दुरुपयोग कर सकते हैं। 

• खैर, यह तो कोई समस्या नहीं होनी चाहिए, क्योंकि शायद हम गरीबों की समझ-बूझ को कम करके आंकते हैं। लेकिन जहां तक खाद्यान्न् की गुणवत्ता का सवाल है तो यह अकेले सरकार का काम नहीं है कि वह उच्च गुणवत्ता के खाद्यान्नों की उपलब्धता सुनिश्चित कराए। 

• पीडीएस के तहत मुहैया कराए जाने वाले गेहूं और चावल उच्च गुणवत्ता के नहीं होते और हितग्राहियों को सीधे पैसा देने का एक मकसद यह भी है कि वे बाजार में जाकर बेहतर गुणवत्ता का खाद्यान्न् खरीद सकें। अभी तो यह स्थिति है कि उनके सामने कोई विकल्प ही नहीं होता और राशन की दुकानों पर जो मिल रहा है, उन्हें मजबूरन वही लेना होता है।

**खाद्यान्न् की मात्रा को लेकर ..... पीडीएस के तहत पांच लोगों के एक परिवार को प्रति व्यक्ति पांच किलो के हिसाब से प्रतिमाह 35 किलो खाद्यान्न् मुहैया कराया जाता है। लेकिन आखिर गरीबों को यह तय करने का भी तो अधिकार होना चाहिए कि वे कितनी मात्रा में खाद्यान्न् का उपभोग करना चाहते हैं। यदि गरीब प्रति व्यक्ति पांच किलो चावल नहीं लेना चाहते और उसके बदले कुछ और लेना चाहते हैं तो इसमें कोई हर्ज क्यों होना चाहिए?

• पीडीएस के तहत सबसिडीयुक्त खाद्यान्न् मुहैया कराए जाने से गरीब परिवार अपने बजट में बदलाव कर दूसरी चीजों पर भी खर्च कर सकते हैं। डायरेक्ट कैश ट्रांसफर से भी यही किया जा सकता है और इसमें भ्रष्टाचार की गुंजाइश भी कम होगी। यह देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ा एक ऐसा विचार है, जिसे एक अवसर जरूर दिया जाना

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