जानिए क्या है जल्लीकट्टू प्रथा

- तमिलनाडु में मकर संक्रांति का पर्व पोंगल के रूप में मनाया जाता है। इस खास बैल दौड़ का आयोजन पोंगल के मौके पर किया जाता है।


- बैलों की लड़ाई के खेल को जल्लीकट्टू के नाम से जाना जाता है।


- पोंगल पर कई प्रथाएं प्रचलित हैं उन्हीं में से एक है जल्लीकट्टू प्रथा I


- भले ही विदेशों में बुल फाइट का आयोजन एक प्रतिस्पर्धा के तौर किया जाता है, लेकिन हमारे देश में यह धार्मिक परंपरा का एक रूप है।


- पोंगल के त्योहार में मुख्य रूप से बैल की पूजा की जाती है क्योंकि बैल के माध्यम से किसान अपनी जमीन जोतता है। इसी के चलते बैल दौड़ का आयोजन किया जाता है।


- चेन्नई के दक्षिण में 575 किमी दूर पालामेडू में पोंगल के मौके पर ऐसा ही खेल खेला गया। इस समारोह को जल्लीकट्टू प्रथा नाम से जानते हैं।


Note:- सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु और महाराष्ट्र में होने वाले जल्लीकट्टू और देश के दूसरे हिस्सों में आयोजित होने वाली बैलगाड़ी दौड़ पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया हुआ है।


- अदालत ने ऐसे आयोजनों को जानवरों के प्रति क्रूरता करार देते हुए टिप्पणी की कि पशुओं को भी सम्मान के साथ जीने का हक है। इसके साथ ही कोर्ट ने कुछ नियम शर्तों के साथ जल्लीकट्टू को मंजूरी देने वाला तमिलनाडु का कानून निरस्त कर दिया था।


- वर्ष 2011 में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के पशु कल्याण विभाग ने एक नोटिफिकेशन जारी करके पशुओं पर क्रूरता रोकथाम कानून 1960 के उपबंध 22 के तहत बैलों के प्रदर्शन केंद्रित कार्यों में इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी थी।


=>"अंग्रेजी का वर्चस्व और हिंदी का संघर्ष "
- हिंदी को लेकर पिछले पांच दशकों में कई तरह के आंदोलन हुए। वह समय अब बीत गया है। हिंदी को लेकर जो पक्ष-विपक्ष में बातें थीं, वे मूलतः भावना पर टिकी थीं। उनके पीछे बहुत ठोस कारण और सोच नहीं थी। धीरे-धीरे वे भावनाएं और आंदोलन भी ठंडे पड़ गए। दशकों पहले समाज में अंग्रेजी उच्च वर्ग की भाषा के रूप में पहचानी जाती थी। उसको लेकर हिंदीभाषियों के मन में उपेक्षा और हीन भावना दोनों का मेल पनपता था।
- 1990 के बाद वैश्वीकरण के साथ ही स्थितियां बदलने लगीं। मध्य वर्ग का तेज विकास हुआ। 2-4 करोड़ का मध्य वर्ग 25 करोड़ के सक्षम-सशक्त वर्ग में बदल गया, अंग्रेजी जिसकी भाषा बनी। कम से कम नौकरी में सफलता के लिए तो बनी ही। समाजशास्त्री और राजनीतिक विश्लेषक अनुमान नहीं लगा पाए कि समाज में कुछ और भी हो रहा है। यह मान-सा लिया गया कि भाषा का सवाल हल न भी हुआ हो तो खत्म तो हो ही गया है। अच्छा लगे या बुरा भारत के तंत्र में मुख्य हैसियत अंग्रेजी की है।
- परंतु सामाजिक सच अपनी तरह से काम करते हैं। भारतीय समाज जटिल, बड़ा और बहुस्तरीय है और बदलाव की हर प्रक्रिया विविध तरीके से इसे प्रभावित करेगी। यही हिंदुस्तान की जीवंतता और शक्ति भी है। भाषा को लेकर वर्षों पुराने असंतोष नए रूप में उभर रहे हैं। मध्यवर्ग के ही महानगरीय और नगरीय पृष्ठभूमि से अलग पृष्ठभूमि वाले तबकों को स्पष्ट होता जा रहा है कि अंग्रेजी का वर्चस्व उनकी सामाजिक प्रगति में बाधा बन रहा है। यह भी स्पष्ट हो रहा है कि सिर्फ भाषा के कारण बहुतायत प्रतिभा कुंठित हो रही है। योग्यता तिरस्कार पा रही है, पराजित हो रही है। यह अहसास हिंदी क्षेत्र के छात्रों को पहली बार सामूहिक रूप से हो रहा है कि अंग्रेजी जानने के बावजूद अंग्रेजी के अधिक ऊंचे स्तर की वर्गीय पृष्ठभूमि के लोग उन्हें पीछे छोड़ रहे हैं।
- यह सारी स्थिति दुखद है। भाषा की खोज करता आहत सभ्यता वाला भारत अब कुछ नई तरह की सामाजिक सच्चाइयों से रू-ब-रू होगा। साफ है कि एक दशक बीतते-बीतते भाषा का यह सवाल अपना संपूर्ण निराकरण चाहेगा ही चाहेगा। अब इस सवाल के पीछे चंद हिंदी भक्तों की हिंदी-निष्ठा या भाषा के जरिये अवसरवाद साधने की प्रेरणा नहीं, करोड़ों युवाओं के भविष्य और जीवन के सपने दांव पर लगे हैं।
- यह उम्मीद करनी चाहिए कि यह युवा जागरूकता सिर्फ आईएएस के सीसैट तक नहीं सिमटी रहेगी। और यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि मुख्य मुद्दा पूरे भारत में हिंदी के लागू होने का नहीं है, हिंदी के झूठे भावनात्मक सम्मान का नहीं है, हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा या विश्व भाषा बनाने का भी नहीं है और किसी भी तरह के अंग्रेजी विरोध का भी नहीं है।


- मुद्दा सिर्फ हिंदी प्रांतों के करोड़ों हिंदी भाषियों के कॅरियर, जीवन, सम्मान और सामाजिक प्रगति का है, जो हिंदी के जरिये ही हो सकती है, होनी चाहिए और इसमें अंग्रेजी का कोई रोड़ा सामने नहीं आना चाहिए। 4-5 दशक पहले किसने सोचा था कि 21 वीं सदी के दूसरे दशक में हिंदी के संघर्ष को अपनी ठीक धुरी मिलनी शुरू होगी।
 

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