कुट्टीअट्टम

•  कुट्टीअट्टम अथवा कुटियाट्टम केरल के शास्त्रीय रंगमंच का अद्वितीय रूप है जो अत्यंत मनमोहक है।


•  यह 2000 वर्ष पहले के समय से किया जाता था और यह संस्कृत के नाटकों का अभिनय है और यह भारत का सबसे पुराना रंगमंच है, जिसे निरंतर प्रदर्शित किया जाता है।


•  जटिल हाव भाव की भाषा, मंत्रोच्चार, चेहरे और आंखों की अतिशय अभिव्यक्ति विस्तृत मुकुट और चेहरे की सज्जा के साथ मिलकर कुटियाट्टम का अभिनय बनाते हैं।


•  इसमें मिझावू ड्रमों द्वारा, छोटी घंटियों और इडक्का (एक सीधे गिलास के आकार का ड्रम) से तथा कुझाल (फूंक कर बजाने वाला एक वाद्य) और शंख से संगीत दिया जाता है।


•  प्रदर्शन आम तौर पर कई दिनों तक चलते हैं, इनमें से कुछ चरित्रों के परिचय और उनके जीवन की घटनाओं को समर्पित किए जाते हैं। इस पूरे प्रदर्शन में शुरुआत से अंत तक इसे अंतिम दिन तक चलाया जाता है।


•  जबकि इसका अनिवार्य रूप से अर्थ नहीं है कि नाटक के संपूर्ण लिखित पाठ को अभिनय में ढाला जाए। कुटियाट्टम की एक शाम रात 9 बजे शुरू होती है जब मंदिर के मुख्य गर्भ गृह के रीति रिवाज पूरे हो जाते हैं तथा यह अर्धरात्रि तक, कभी कभार सुबह 3 बजे तक चलता है, जब तक सुबह के रीति रिवाज आरंभ हों।
 

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