संस्कृति के जरिये बदलाव संभव

जॉर्ज बुश के जमाने में जब इराक में अमेरिकी फौज भेजी गई तो एक टीवी कार्यक्रम में पूर्व विदेशमंत्री हेनरी किसिंजर से पूछा गया कि अब किस देश में सेना भेजेंगे, क्योंकि बुश ने उत्तर कोरिया, लीबिया, ईरान आदि देशों को दुष्ट राष्ट्र बताया था। किसिंजर ने कहा, ‘हर देश में फौज भेजने की जरूरत नहीं होती। जिस देश में हमारे जीवन-मूल्यों को मानने वाला प्रभावशाली तबका है, वहां क्यों सेना भेजें?’ अलग संदर्भ में इसे हमारे देश में लागू किया जा सकता है।


समाज के सारे क्षेत्रों में अपने हितों की चिंता करने वाला तबका जो निर्माण कर सकता है, वह बिना अधिक विरोध के अपने मन मुताबिक राज चला सकता है।


जैसे भारत कई धर्मों, जातियों, वंश, नस्ल, पंथों व संस्कृतियों का देश है। हमारे संविधान में इन सभी को समान बताया है। अब यदि समाज के हर क्षेत्र में संविधान के इस विधान को मानने वाला प्रबल वर्ग होगा तो भारत धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्र के रूप में अपना अस्तित्व बनाए रख सकता है।
जब हम देश को विविधतापूर्ण मानते हैं तो यह भी जानते हैं कि इसके साथ विविध विचारों का कोलाहल होगा, लेकिन संवाद, चर्चा, सहमति जैसे तरीके लोकतांत्रिक व्यवस्था चलाने के तरीके भी हैं। यह विविधता कायम रखकर कानून के चौखटे में लोकतंत्र चलाने से हमारा देश सामाजिक व सांस्कृतिक रूप से बलवान बनेगा, इस पर सहमति होनी चाहिए।


दुर्भाग्य से पिछले 65 वर्षों में ऐसा नहीं हो सका। व्यवस्थाओं में अपने प्रभुत्व के लिए विविध समूह प्रयास में लगे रहते हैं। यह व्यवस्था पर प्रभुत्व हासिल करने का मुद्दा है। सारे प्रयास व्यवस्था को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के नहीं बल्कि उस पर प्रभुत्व हासिल करने का हैं।


डॉ. आंबेडकर ने कहा था, ‘शिक्षित बनो, संघर्ष करो और संगठित बनो।’ यहां संगठित होकर सत्ताधारी बनने का अर्थ लिया गया। सत्ता से उनका आशय था समाज के सारे वर्गों में प्रबलता हासिल करना था। इसके लिए ‘सांस्कृतिक पूंजी’ निर्मित करनी पड़ती है।
 

Back to Top