भारत में विलुप्तप्राय प्रजातियां और कारण

भारत अपनी सम्‍पन्‍न जैव विविधता के लिए जाना जाता है। देश के दस भौगोलिक क्षेत्रों में 91,000 से ज्यादा पशुओं की प्रजातियां और 46,000 पादप प्राजातियां पहले से दर्ज है। करीब 65,000 देशीय पौधे अभी तक स्वास्थ्य की देखभाल से संबध्द स्वदेशी प्रणालियों में इस्तेमाल किए जाते हैं। हमारे यहां उगाए जाने वाले पौधों के 300 वन्य पूर्वज और उनसे मिलते-जुलते पौधे प्राकृतिक परिस्थितियों में अब तक विकसित हो रहे हैं। इसके साथ ही हम फिर विविध कारणों से कुछ खास किस्म की प्रजातियों को या तो खोते जा रहे हैं या उनकी संख्या कम हो रही है।

 

विलुप्तप्राय: प्रजातियां ऐसी प्रजातियां होती हैं जिन पर निकट भविष्य में विलुप्त हो जाने का खतरा मंडरा रहा होता है। विलुप्तप्राय: प्रजातियों के संबंध में अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर आईयूसीएन) प्रमुख प्राधिकरण है और यह विलुप्तप्राय: प्रजातियों को उन पर मंडराते विलुप्तता के खतरे के आधार पर एक श्रेणी में नहीं बल्कि तीन श्रेणियों के समूह में बांटता है :असुरक्षित, विलुप्तप्राय: और अत्यधिक विलुप्तप्राय:।

 

अत्यधिक विलुप्तप्राय: (सीआर), वन्य प्रजातियों के लिए आईयूसीएन द्वारा दी जाने वाली सर्वाधिक खतरे वाली श्रेणी है। अत्यधिक विलुप्तप्राय: प्रजातियों का आशय ऐसी प्रजातियों से है जिनकी संख्या घट चुकी है या फिर तीन पीढ़ियों के भीतर जिनकी संख्या 80 फीसदी घट जाएगी। इसलिए उन्हें दुनिया की सबसे ज्यादा विलुप्तता के खतरे का सामना करने वाली प्रजाति माना जाता है।

 

विलुप्तप्राय: प्रजातियां ऐसे जीवों की आबादी होती है जिन पर संख्या में कम होने की वजह से या बदलते पर्यावरण या परभक्षण मापदंडों की वजह से विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा होता है। इसका आशय यह भी है कि वनों की कटाई के कारण, भोजन या पानी की कमी हो सकती है। इसलिए इन्हें ऐसी प्रजातियां माना जाता है जिन पर दुनिया से विलुप्त होने का अत्यधिक खतरा मंडरा रहा है।

 

असुरक्षित (वीयू) प्रजातियां वे प्रजातियां होती हैं, जिन्हें आईयूसीएन ने ऐसी प्रजातियों की श्रेणी में रखा है जिनके तब तक विलुप्त हो जाने का खतरा होता है, जब तक उनके अस्तित्व और पुनरुत्पादन के लिए खतरा बन रही परिस्थितियों को सुधारा नहीं जाता। इसलिए इन्हें ऐसी प्रजातियां माना जाता है जिन पर दुनिया से विलुप्त होने का अत्यधिक खतरा मंडरा रहा है।

 

 कोई प्रजाति उस समय विलुप्त हो जाती है, जब उसके अंतिम विद्यमान सदस्य भी मर जाते हैं। ऐसे में पुनरुत्पादन और नई पीढ़ी की रचना करने में सक्षम जीवित सदस्यों के न होने पर विलुप्तता अनिवार्य बन जाती है। प्रजाति क्रियात्मक तौर पर उस समय भी विलुप्त हो सकती है, जब उसके ऐसे मुट्ठी भर सदस्य ही विद्यमान हों, जो खराब स्वास्थ्य, आयु, बड़े दायरे में अपर्याप्त वितरण, दोनों लिंगों के सदस्यों (लैंगिक प्रजनन प्रजातियों में ) की कमी या अन्य कारणों से पुनरुत्पादन की स्थिति में न हों।

 

 वर्तमान में विलुप्तता का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू विलुप्तता के अत्यधिक संकट वाली प्रजातियों के संरक्षण में मानव द्वारा किए जाने वाले प्रयास हैं, जो संरक्षण दर्जे एक्सटिंक्ट इन द वाइल्ड (ईडब्ल्यू) के गठन से परिलक्षित होते हैं। आईयूसीएन द्वारा इस दर्जे में सूचीबध्द प्रजातियों का इस दुनिया में कोई भी ज्ञात सजीव प्रतिरूप नहीं है और उन्हें सिर्फ चिड़ियाघरों या अन्य कृत्रिम पर्यावरणों में रखा जाता है। इनमें कुछ प्रजातियां क्रियात्मक तौर पर विलुप्त हैं, क्योंकि वे अब अपने प्राकृतिक पर्यावास का हिस्सा नहीं रही हैं और इसकी संभावना नहीं है कि उन्हें कभी भी वन में लौटाया जा सकेगा।

 

विलुप्तता के मुख्य कारण या तो प्राकृतिक हैं या मानव निर्मित।
- क्रमिक विकास के माध्यम से, नई प्रजातियां विकास की प्रक्रिया से उत्पन्न होती हैं और वे उस समय विलुप्त हो जाती हैं, जब वे बदलती परिस्थितियों या अपने से श्रेष्ठ से स्पध्र्दा में जीवित नहीं रह पातीं। कोई विशिष्ट प्रजाति अपने अस्तित्व में आने के एक करोड़ साल बाद विलुप्त हो जाती है, हालांकि कुछ प्रजातियां, जिन्हें जीवित जीवाश्म कहा जाता है, बच जाती हैं और करोड़ों बरस बीतने पर भी अपरिवर्तित रहती हैं। विलुप्तता, हालांकि एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, अनुमान है कि कभी भी अस्तित्व में रहीं 99.9 प्रतिशत प्रजातियां अब विलुप्त हो चुकी हैं।

 

- विलुप्तता का सबब बन रही विभिन्न मानवजनित गतिविधियां मानवीय कारणों से हैं। हाल ही में वैज्ञानिक विभिन्न मानवजनित गतिविधियों की वजह से हाल ही में हो रही विलुप्तता की उच्च दर के प्रति सतर्क हो गए हैं।

 

- इन मानवजनित गतिविधियों में जानबूझकर या दुर्घटनावश शामिल की गई तेजी से फैलने वाली विजातीय प्रजातियां, क्षमता से अधिक दोहन और औषधीय पौधे जैसे गैर-काष्ठ वन उत्पाद (एनटीएफपी) का अवैज्ञानिक संग्रहण, जलवायु परिवर्तन, अनियमित पर्यटन, पर्यावास का नष्ट होना, अतिक्रमण आदि शामिल हैं।

 

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