कन्या भ्रूणहत्या रोकेगी आईआईटी की पहल

•  गर्भावस्था के दौरान मां और उसके बच्चे की सेहत का हाल बताने वाली अल्ट्रासाउंड मशीन का दुरुपयोग यह पता करने के लिए हो रहा है कि गर्भ में पल रहा बच्चा लड़का है या लड़की।


•  अल्ट्रासाउंड मशीन के इस दुरुपयोग को रोकने के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) हैदराबाद की सहायक प्रोफेसर पी. राजलक्ष्मी ने आधुनिक तकनीक पर आधारित नई व्यवस्था विकसित की है। इसकी मदद से पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीनों के दुरुपयोग पर भी रोक लगाई जा सकेगी। अभी बड़ी तादाद में ऐसी मशीनों का दुरुपयोग लिंग जांच के लिए हो रहा है, लेकिन सरकारी अधिकारी उनका पता नहीं लगा पाते।


•  आईआईटी, हैदराबाद के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग में सहायक प्रोफेसर पी. राजलक्ष्मी कहती हैं कि इस मशीन के प्रोटोटाइप को व्यावसायिक रूप से तैयार करने के लिए एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने दिलचस्पी दिखाई है।


•  अगर ऐसी मशीनें उपलब्ध हो जाती हैं तो देशभर में सिर्फ ऐसी ही अल्ट्रासाउंड मशीनों के उपयोग को अनिवार्य किया जाना चाहिए। इसमें बहुत सामान्य तकनीक और मामूली धन की जरूरत होगी, लेकिन इसके जरिये बड़ी सामाजिक बुराई को दूर किया जा सकता है।


•  इस तकनीकी व्यवस्था के तहत सामान्य अल्ट्रासाउंड मशीनों के साथ ही पोर्टेबल या हेंडहेल्ड मशीनों पर अंकुश लगाना मुमकिन हो सकेगा। इसके तहत मशीन के अंदर मौजूद बायोमीट्रिक ऑथेंटिकेशन व्यवस्था की वजह से इसका उपयोग वही व्यक्ति कर सकेगा, जो अपनी पहचान सुनिश्चित कर सके। इसी तरह उपयोग के दौरान मशीन से ली गई सभी तस्वीरें सीधे मुख्य सर्वर तक पहुंच जाएंगी। मशीन को जीपीएस से भी लैस किया गया है ताकि उसे जहां-जहां ले जाया जाए, उसकी सूचना भी मुख्य सर्वर में दर्ज हो सके।


•  अल्ट्रासाउंड मशीनों के दुरुपयोग को रोकने के लिए कई स्तरों पर तकनीकी का उपयोग देश में पहले भी होता रहा है। कुछ राज्यों में "साइलेंट आब्जर्वर" नाम की तकनीक का उपयोग किया जा रहा है, जो स्थायी रूप से लगाई गई मशीनों पर नजर रखती है। जबकि, कुछ जगहों पर "एक्टिव आब्जर्वर" तकनीक का उपयोग शुरू हुआ है, जिसमें उपयोग संबंधी आंकड़े मोबाइल संदेश के तौर पर मुख्यालय में पहुंच जाते हैं।
 

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