रोमन लिपि की बजाय देवनागरी लिपि क्यों

भाषा चुने हुए ध्वनि-प्रतीकों का उपयोग करते हुए पारस्परिक संवाद को संभव बनाती है। संवाद में ही भाषा का जीवन बसता है। ध्वनियां शब्द रचती हैं और लिपि चिह्नों की ऐसी व्यवस्था होती है, जो ध्वनियों की जगह लेती है। इस तरह लिपि भाषा को एक मूर्त आकार देती है और वाचिक व्यवहार को एक खास तरह की व्यवस्था और अनुशासन में ले आती है। लिपि की सहायता से ही भाषा अंकित तथा दृश्य रूप में हमारे सामने वक्ता से स्वतंत्र रूप में भी उपस्थित हो पाती है। लिपि के होने पर भाषा के लिए किसी के साथ साक्षात संवाद की दरकार नहीं रह जाती।


इस तरह भाषा को एक प्रत्यक्ष और प्रकट रूप देने के साथ-साथ लिपि वक्ता की अनुपस्थिति में भी भाषा के अस्तित्व और निरंतरता को अक्षुण्ण बनाए रखती है। अत: भाषा के दीर्घ जीवन के लिए लिपि अनिवार्य रूप से जरूरी है।


भाषा का लिखित रूप हमारे समक्ष नई सृजनात्मक दुनिया की संभावनाओं का द्वार खोलता है। भाषाओं का इतिहास इस बात का गवाह है कि जिन भाषाओं की लिपि नहीं थी या नहीं है, वे समाप्त हो चुकी हैं या समाप्तप्राय हैं। लिपि के बिना भाषा का जीवन खतरे में पड़ जाता है। चूंकि भाषा में ही हमारी ज्ञानराशि का अधिकांश भाग बसता है, इसलिए लिपि ज्ञान को सीमित देश और काल की सीमाओं से मुक्त कर उसे देश-देशांतर में उपलब्ध कराने के लिए एक आवश्यक उपकरण बन जाती है। भाषा, ज्ञान और लिपि का आपस में बड़ा गहरा रिश्ता है। छोटे बच्चों को शुरू में लिपि के ही सहारे भाषा-ज्ञान में प्रवेश कराया जाता है।


आज रोमन लिपि का अनेक देशों में प्रचार दिखता है। मूलत: ग्रीक-लैटिन भाषा की लिपि रोमन थी, जो यूरोप, अफ्रीका और एशिया के कुछ देशों की भाषाओं की लिपि बन गई। ऐसा मुख्यत: अंग्रेजी उपनिवेश वाले देशों में हुआ।


मध्य एशिया के देशों में अरबी लिपि आगे बढ़ी।


भारत में ब्राह्मी लिपि से देवनागरी लिपि का जन्म हुआ। इस लिपि में व्यापक समुदाय की ध्वनियों का प्रतिनिधित्व करने के साथ-साथ लिखने, पढ़ने और उच्चारण की एकरूपता है, फिर भी समय-समय पर रोमन लिपि के वर्चस्व को देखकर यह प्रस्ताव किया जाता रहा है कि हिंदी को आगे बढ़ाने के लिए उसे रोमन लिपि में लिखा जाए।


हिंदी भाषा स्वभावत: देवनागरी लिपि में निबद्ध है। इस लिपि में स्वर और व्यंजन के बीच स्पष्ट अंतर है, जो रोमन लिपि में नहीं पाया जाता। निस्संदेह देवनागरी रोमन की तुलना में अधिक वैज्ञानिक है। हिंदी का ककहरा देवनागरी लिपि में सीखा जाता है। इसमें 11 स्वर और 35 व्यंजन हैं। प्रत्येक स्वर के लिए बारहखड़ी की एक निश्चित मात्रा है। व्यंजनों को कंठ से उद्भूत होने वाले और ऐसे ही दन्त्य, तालव्य, मूर्धन्य, ओष्ठ्य जैसे वर्गों में रखा गया है। हर एक वर्ग में पांच-पांच व्यंजन हैं।


आठवीं और नौवीं सदी में नागरी लिपि का प्रचलन मिलने का इतिहास है और हमारे संविधान ने इसे राजभाषा हिंदी की आधिकारिक लिपि का दर्जा भी दिया है। बीसवीं सदी के आरंभ में अनेक प्रबुद्ध भारतीयों ने देश की एकता के लिए एक लिपि अपनाने पर जोर दिया था। इनमें दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, शारदा चरण मित्र आदि का नाम प्रमुख है। विनोबा भावे ने अपने व्यापक अध्ययन से देवनागरी को भारतीय बोलियों की ध्वनियों के लिए वैज्ञानिक माना।


एक ध्वन्यात्मक लिपि के रूप में यह अद्वितीय है। इसमें हर वर्ण एक अक्षर व्यक्त करता है। चूंकि प्रत्येक वर्ण लेखन की इकाई होता है, उसे लेखिम भी कहते हैं। उसका एक निश्चित स्वनिक नियम भी होता है। इसका लाभ यह है कि सही उच्चारण जान लेने वाला उसे सही ढंग से लिख सकता है। लिखने और बोलने की समतुल्यता अद्भुत है। इसमें एक ध्वनि के लिए एक ही चिह्न है, परंतु रोमन लिपि में यह सुविधा नहीं है। वहां सी का उच्चारण क की ध्वनि के लिए (जैसे कैट) और स की ध्वनि (जैसे सिनेमा) दोनों के लिए किया जाता है। चूंकि रोमन में एक वर्ण एक स्वनिक का नियम लागू नहीं होता, अत: लिखे शब्द को जाने बिना शुद्ध उच्चारण असंभव हो जाता है। कट व पुट में यू की ध्वनि अलग है। कुछ ध्वनियां उच्चारित नहीं होतीं (जैसे, कैच, हाफ, बजट में)।


तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो रोमन और देवनागरी की भी भिन्न्ता उल्लेखनीय है। यह भी स्मरणीय है कि रोमन में मात्र 26 वर्ण हैं, जबकि देवनागरी में इसके दोगुने। मात्रा भी बड़े स्पष्ट ढंग से लगती है। ह्रस्व-दीर्घ का भेद स्पष्ट है। उच्चारण स्थान के आधार पर वर्गीकरण इसकी अपनी विशेषता है और उसी के आधार पर ध्वनियां वर्गीकृत हैं। संत विनोबा भावे ने इसे गुणवत्ता के आधार पर विश्वनागरी कहा था। लिप्यांतरण और प्रतिलेखन के लिए भी देवनागरी सर्वथा उचित है।


गुणवत्ता की दृष्टि से नागरी अधिक समृद्ध है। यह बात देश-विदेश के अनेक विद्वानों ने स्वीकार की है। इसमें मात्राओं, अनुस्वार, विसर्ग, हल, अनुनासिकता के स्पष्ट चिह्न दिए गए हैं। यह भी उल्लेख्य है कि संस्कृत, मराठी, डोंगरी, मैथिली, बोडो व नेपाली भाषाओं की भी यही लिपि है। प्रामाणिकता और स्पष्टता के कारण देवनागरी किसी भी भाषा की ध्वनियों को व्यक्त करने में समर्थ है।


देवनागरी की कंप्यूटर के लिए भी उपयुक्तता साबित हो रही है। इंटरनेट, लैपटॉप, टेबलेट तथा मोबाइल में इसका उपयोग बढ़ रहा है। याहू, गूगल, एमएसएन सब हिंदी में हैं। सूचना, व्यापार, मनोरंजन की दुनिया में इसका प्रवेश हो रहा है।


भाषा का लिखित रूप हमारे समक्ष नई सृजनात्मक दुनिया का मार्ग खोलता है। आक्षरिकता के कारण देवनागरी शब्दों को कम समय और स्थान में लिख लेना संभव बनाती है। इसकी शिरोरेखा की व्यवस्था भी इसे एक विशेष रूप देती है।


इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों के विकास के साथ हिंदी अनेक दृष्टियों से प्रभावी हो रही है। हिंदी का अस्तित्व देवनागरी लिपि के साथ अभिन्न् रूप से जुडा हुआ है। हिंदी देवनागरी में ही जीवित रह सकेगी।
 

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